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Full text of "1274 Prsad Or Unka Sahitya; 1940"

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ग्रथम संस्करण 
३९४० ई० 


मुल्य दो रुपये । 


शोल एजेल्ट-- 
विद्याभास्कर चुकडियो, 
ज्ञानवापी, बताएल । 


१---दो बातें 
२--आरम्भिक प्रवेश 
३--शअसाद का जीवन 
४-- भ्रसाद के उपन्यास 
७५--असाद कौ कहानियाँ 
६--प्रसाद के नाटक 
७--पभ्रसाद के निवन्ध 
८--भाषा और शैली 
९--रहस्यवाद 
१०--प्रसाद्‌ का काव्य 


क्रम 


3७-१० 
११-१६ 
१७-४१ 

४२-११९ 
१९२०-१४७ 
१४८-१७४ 
१७५-१७९ 
१८०-१८८ 
१८९-२०० 
२०१-२७२ 





पिय प्रसाद जी के अससय स्वगवास के उप- 
रान्त कई बार उनके विषय में कुछ संस्मरण लिखने 
का इरादा हुआ ; पर जब जब लिखने बैठा, तब तब उस 
समय की प्रसाद-सम्बन्धी अनुभूतियों ने स्थृति-पट पर 
अकट होकर सुझे इतना अभिभूत कर दिया कि छेखनी 
जहाँ की तहाँ रख दी ओर उसी महापुरुष की स्वरृति 
में तड्लीन हो गया। आज ख्नेहभाजन मित्र विनोद्शझ्कर 
व्यास के अनुरोध से प्रसाद जी पर फिर छुछ पंक्तियों 
लिखने बैठा हूँ । इस समय भी वही दशा है । 
“ वास्तव सें साहित्यिक प्रसाद की अपेक्षा में तो 
मनुष्य प्रसाद को दी महतोमहीयान मानता हैं । 
साहित्यिक प्रसाद का परिचय तो अलेक छोग उसके 
साहित्य से प्राप्त कर चुके हैं. और आप्त करते रहेंगे । 
किन्तु मनुष्य प्रसाद का परिचय तो अच्छी तरह वे ही 
आप्त कर सके हैं, जो उनके सम्प्क में रहे हैं। बा० 


जयशंकर प्रसाद फेवछ कवि ही न थे; वह एक उदार 
और सहदय व्यक्ति थे। में इसी माने में उनकी महापुरुष 
मानता हूँ । मेरा और उनका साथ छगभग ५-६ चर्ष 
तक बराबर नित्य १८ से २० घंटे तक रहा। इस छंबे 
अवसर में उनमें अनेक विशेषताएँ मैंने पाई, जिनका पूरा 
विवरण देने के लिए १००-७० प्रष्ठ भी यथेष्ट न होंगे। 

पहली और सब से बड़ी विशेषता उनमें यह देखी 
कि वह अत्येक सहृदय साहित्यिक के साथ असाधारण 
प्रेम का व्यवहार करते थे। आजकल के अनेक 
लेखकों की तरह वह किसी प्रतिस्पर्द्धी से ईषो न रखते 
थे। उन्होने क्रमी किसी की निन्‍्दा नहीं की । उनके 
मुख से मैंने उस मनुष्य के प्रति भी कभी कोई बुरा 
सन्तव्य नहीं सुना, जो उन्हें घुरा कहता था या उनकी 
भ्रतिभा का कायछ न था। श्रसाद जी यथाशक्ति 
प्रत्येक साहित्यिक का सम्मान और सहायता करते 
थे। दूसरी विशेषता यह उनमें थी कि मेंने कभी 
उनको क्रोधित होते नहीं देखा । यहाँ तक कि उनके 
एक बंगाली नौकर के कारण यथेष्ट आर्थिक हानि 
उठानी पड़ी; परन्तु उन्होंने उसके लिए भी कभी 


८ 


ऋद्टक्ति नहीं की | तीसरी विशेषता यह पाई कि उनमें 
अभिमान नहीं था । आज के जाने में ऐसी अकृति 
दुलेभ ही है। 
जब प्रसाद जी के भांजे बा० अम्बिकाप्रसाद 
गुप्त ने, उन्हीं की अजुमति से इन्दु नाम का सासिक 
थत्र निकाछा था, उसी बीच मेरा और प्रसाद जी का 
प्रथम परिचय हुआ । बह अपने बैठके में बैठे तेछ की 
मालिश करा रहे थे | में अपरिचित था। शायद 
उन्होंने मेरा नाम सुन रक्खा था। नाम सुनते ही 
डठकर गले से छगा छिया और सादर अपने पास 
'बिठाया । कुछ साहित्यिक बातौछाप हुआ | उन्होंने 
इन्दु का संपादन मुझे सौंपने की इच्छा प्रकट की । 
मैंने भी उनके साहचये छाभ के छोभ से उसे स्वीकार 
कर लिया। उसी दिन से मे उनका अंतरंग मित्र बस 
गया और जीवन भर वह मुझे उसी तरह मानते रहे । 
अन्तिम दिनों में अ्रसाद जी नुमाइश के अवसर 
पर पुत्र सहित छूखनऊ गये थे। छखनऊ पहुँचते ही 
“चह मेरे घर पर गये। ठुरभाग्यवश उस दिन भेंट न हो 
सकी । वह फिर माधुरी आफिस में मिलने गये और 


९ 


३-४ घंटे तक मेरे पास बैठे बातचीत करते रहे। वही 
मेरी और उनकी अन्तिस सेंट थी। आज भी उनकी 
वह मूर्ति मेरी आँखों के आगे है। मूलती नहीं । 
मेरा खयाल है, प्रसाद जी एक विभूति थे । उन्होने 
अपनी रचनाओं से हिन्दी के भंडार को समृद्ध बनाया 
है। जब तक उनकी ये ऋृतियाँ हैं, तब तक वह 
अमर हैं। प्रिय सित्र पं० विनोदशक्ुर जी उनके 
अन्तरंग और घनिष्ठ मित्र थे। व्यास जी ने यह 
पुस्तक लिख कर प्रशंसनीय काय किया है । असाद जी 
पर व्यास जी की यह पुस्तक सर्वागपूण और प्रामा- 
णिक है। आशा है, इसका प्रचार और आदर यथेष्ट 
होगा और व्यास जी का परिश्रम सार्थक होगा। 
लीडर प्रेस वालों से मेरा यह अनुरोध है कि 
संपूर्ण प्रसाद-प्रन्थावछी का सटीक सुसम्पादित सुन्द्र 
सस्ता संस्करण निकालने का अवश्य आयोजन करें | 
प्रसाद जी की रचनाओं को घर-घर पहुँचाना ही 
उनका छक्ष्य होना चाहिए, टके कमाना नहीं । 
रूपनारायण पाण्डेय,. 
( माधुरी-सम्पादक ) 





यह सत्य है, यदि आधुनिक हिन्दी साहित्य 
से प्रेमचन्द्‌ और प्रसाद की समस्त रचनाएँ 


हंटा दी जायें तो उससे कुछ नहीं रह जायगा। प्रसाद 
' नें साहित्य के समस्त अंग नवीनता के ठोस सांचे में 
ढाछा है। प्रेमचन्द जी ने कथा-साहित्य को जीवन 
दिया है। दोनों ही लेखकों की छेखनी के सम्मुख्य 
हम नत मस्तक हैं, उनके चरित्र और जीवन का जो 
अध्ययन करने का सौभाग्य मुझे प्राप्त हुआ था, उससे 
आज तक जो अधिक उज्ज्वल रह सकी हैं, वह दोनो 
की हंसी थी । प्रसाद प्रायः मुस्कराते थे और कभी 
कभी उनकी बड़ी सुन्दर हंसी खिल उठती थी । प्रेम- 
चन्द जी भी बड़ी सरल हँसी हँसते थे। दोनो महार- 
थियो की वह हँसती हुई आकृति अब भी स्वप्न चित्र 
की तरह आंखों के सम्मुख आकर खड़ी हो जाती है । 


दूसरी ओर जब महाश्मशान पर इस नश्वर तन 
का घुआंधार अन्त, अन्त में दिखछा कर संकेत 
करता है कि जीवन का मूल्य एक बार खिलखिला 
कर हँस देना है। कभी सुख, कभी दुःख । सुख-दुःख 
की यह जटिल पहेली कभी न सुलझी है और न 
सुल्झेगी । दाशेनिक और बिठ्ानो की यह खुराक 
आलू की तरकारी की तरह भिन्न-भिन्न रूप और 
आवरण मे तक की थाली मे अस्तुत हुईं है । कहना 
न होगा कि इसी सुख-हुःख की गाथा द्वी से विश्व- 
साहित्य का निमोण होता है । 

इंगलेण्ड के सम्मानित उपन्यास छेखक आतोल्ड 
चैनेट ने साहित्य की विवेचना करते हुए लिखा है कि 
चाल्स लेम्ब अपने भाई की झत्यु के बाद यह 
सोचता था--यह्‌ सुन्द्र हे। दुःख सुन्दर है, 
निराशा और जीवन दोनों ही सुन्दर है। में उनसे 
अवश्य कहूँगा । और उन्हे यह समझाऊंगा ।! 

प्रसाद की बचपन से ही काव्य को ओर रुचि 
थीं। इसलिए पहले वह कवि हुए, फिर नाटककार, 
कहानी और उपन्यास छेखक और अन्त से निबन्ध 


५ हल 


लेखक । इस तरह प्रसाद ने साहित्य का जो ढांचा 
तैयार किया था, वह उनके जीवन में ही पूर्ण हुआ । 
अन्तिम समय में उन्हें जो सब से बड़ा सन्‍्तोष और 
शान्ति थी, वह इसी बात की कि उनका साहित्यिक 
कार्य क्रम पूरा हुआ था । हाँ, एक रहस्य यहां खोल 
देना आवश्यक प्रतीत होता हे। यह एक श्श्न उपस्थित 
होता है कि प्रसाद ने जब सब अंगों की पूर्ति की 
तो गद्यकाव्य की उनकी कोई पुस्तक क्‍यों नहीं प्रका- 
हित हुई ? इसके उत्तर में श्री राय कृष्णदास के अतीत 
शीषक लेख का यह अंश यहां देना अनुचित न होगा। 

(इन्हीं दिनों जयशंकर जी ने भी पहिले पहल 
साधना को देखा । उन्होंने भी उसे बहुत पसन्द 
किया केवल जबानी ही नहीं | एक द्नि आये, सुदामा 
की तरह कुछ छिपाये हुए | उसे बहुत छीना झपटी 
और हॉ-नहीं के बाद बड़े हाव भाव से उन्होंने 
दिखाया । उन दिनों उनकी ऐसी ही आदत थी कि 
अपनी रचनाएँ दिखाने में बड़ा तंग करते थे । वह 
एक साफ सुथरी छोटी सी कापी थी, जिसमें बीस' 
के छगभग गद्य गीत उनके लिखे हुए थे । मैंने कइयो' 


१३ 


को झांका सुन्दर थे । एक में का सन्ध्या वर्णन अभो 
तक नहीं भूछा। किन्तु मैं उन दिनों बावछा हो रहा 
था। मुझे अपनी शेली पर इतना ममत्व और आग्रह... 
था कि जरा भी उदार नहीं होना चाहता था। मैने 
छूठते ही कहा--'क्यों गुरु छुझी पर हाथ फेरना ।' 
ये भेरी संकीणता पहचान गये । कई द्नि बाद कोई 
गुनासिब बात कहकर उसे उठा ले गये और छत्त 
भावों में से कतिपय को छन्द्बद्ध कर डाछा । उनके 
झरना के प्रथम संस्करण का अधिकांश उन्हीं कबि- 
ताओं का संकलन है ।' 

इस अंश से प्रसाद का व्यक्तित्व कितना उज्ज्वल 
और त्यागमय प्रकट होता है, यह किसी से छिपा ल 
रहेगा । 

इस पुस्तक को उपस्थित्त करते हुए मुझे आज 
सुख और दुःख दोनों ही हो रहा है । सुख इसलिये 
कि वर्षों से अपने इस विचार को कार्य रूप में 
परिणत न कर सका था । अब उसे पूरा करते हुए 
वास्तविक सुख का अनुभव कर रहा हूँ, और दुःख इस 
लिए कि प्रसाद जी के सामने यह पुस्तक नहीं तैयार 


श्छ 


हो सकी, नहीं तो इसकी ज्ुटियाँ और अपूर्णता पर 
सन्देह न रहता । 

१४ वर्ष प्रसाद जी के साथ रहकर एक छात्र 
के रूप में जो कुछ मेने उनसे पाया, उसी के बल 
'पर इस पुस्तक को प्रस्तुत कर सका हैँ । 

इस पुस्तक के समाप्त करने से मुझे सब से बड़ी 
कठिनाई यही रही कि कहानी-उपन्यास को छोड़ कर 
अन्य सभी विषयों से में प्रायः उदासोन ही रहा | 
प्रसाद जी साहित्य सृष्टा थे । बहुधा वह मुझे नाटक 
और काव्य की ओर आकर्षित करते रहे; लेकिन मे 
कहानी-उपन्यास के क्षेत्र से आगे नहीं बढ़ सका । 
मेरा यह तक था कि पहले में इनका ही अध्ययन पूर्ण 
कर रू, तब दूसरी ओर साहस करू । उनके चले 
जाने पर अब तो सदेव के लिए यह श्रश्न सूखे हुए 
पुष्प की तरह पड़ा रहेगा । 

काव्यवाला अंश निराला जी ने लिखना स्वीकार 
किया था; किन्तु अस्वस्थता के कारण लिख न 
सके । बाध्य होकर मुझे ही उसका ढाँचा बनाना 
'पड़ा । कबि तो नहीं हुआ; किन्तु काव्य की आत्मा 


श्५ 


से कुछ स्लेह सा है। प्रसाद जब अपनी कविताएँ 
गुनगुनाते थे तो जैसे आनन्दमय लोक में वेदना कीः 
एक हलकी छाया छिप जाती थी । काव्य की ध्वनि 
और उनका वह स्वर कानों में भर जाता था । आज 
मैं अपने जीवन के निरस दिलों में उन्हें गुनगुनाकर 
स्वृति की रेखाएँ बटोरता हूँ । 

इस अंश में जितनी कविताएं संमहीत हैं, उनमें 
अधिकांश वे ही हैं, जो प्रायः वह सब को सुनाते थे। 
पं० केशवग्नसाद जी मिश्र के आदेश और पँं० पद्म- 
नारायण आचाय की सहायता से लेख अधूरा नही 
प्रतीत होता । 

नाटकों का कथाभाग में बना चुका था। भूमिका 
के रूप से ५-६ प्रष्टठ पं० रामविकास शर्मो और 
श्री० ज्ञानचन्द्‌ का लिखा है। दूसरे संस्करण से इस 
अधिक उछुन्दर बनाने का प्रयत्न करूँगा । 


मकर-संक्राति, १९९ ६ छं० मर 
सानसन्दिर,काशी। | विनोदशंकर व्यास | 





प्रसाद जी के पितामह बाबू शिवरत्न साहु बड़े दानी और 
उदार पुरुष थे । वह कान्यकुब्ज वैश्य जाति के थे, 
और सुंघनी साहु के नाम से विख्यात थे। प्रातःकाल गंगा 
स्नान से छौटते समय वह अपना कम्बल और छोटा तक दे 
डालते थे । वह गुप्त रूप से विद्यार्थियों, दीन-दुखियों और ज्ाह्मणों 
की बढ़ी सहायता करते थे ।' यह बात प्रसिद्ध थी कि उनके द्वार 
से कोई खाली हाथ नहीं छौटता । उन्होंने पहली बार सुर्ती गोली 
का अन्वेषण किया था और उन्हीं की आविष्कार की हुईं यह पान 
में खाने वाली सुर्ती गोी काशी की एक निजी चीज़ है। 
प्रसाद जी के पिता बाबू देवी प्रसाद जी भी व्यवसाय-कुशल 
ओर उदार थे। उस समय बाहर से आने वाले कवि, माट, 
बाजीगर, और विद्वान सभी काशीराज के द्रबार से छौट कर 
इनके यहाँ अवश्य आते थे। काशी में दो ही स्थानों में गुणियो 
ब्‌ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


का आदर था, एक काशी नरेश के यहाँ और दूसरे सुंघनी साहु 
के यहाँ । यही कारण था कि काशी नरेश के अभिवादन में छोग 
महादेव कहा करते थे और सुंधनी साहु के लिए भी वही सम्मान 
सूचक महादेव का अभिवादन होता था । मेने प्रसाद जी के साथ 
देखा है, बहुधा उन्हें छोग महादेव कह कर सम्मान प्रकट करते 
थे। काशी में यह सम्मान केवछ सहाराज बनारस और सुंघनी" 
साहु को ही प्राप्त था । 

सं० १९४६ में ऐसे ही कुछ में महाकवि प्रसाद का जन्म 
हुआ था। प्रसाद जी का बचपन बड़े छाड़ प्यार से बीता। 

सम्बत्‌ १९५७ में अपनी माता के साथ उन्होंने धाराक्षेत्र 
, ओऑंकारेश्वर, पुष्कर, उज्जेन; जयपुर, जज और अयोध्या आदि की 
यात्रा की । उस ससय उनकी अवस्था ११ ब्ष की थी। अमर- 
कन्टक पवेतमालछा के बीच, नसदा की नौका यात्रा उन्हें जीवन 
भर न भूली थी। वहीं के दृश्यों का उनके जीवन पर बड़ा प्रभाव 
पड़ा था । प्रकृति के अनुपम सौन्दर्य की छाया में प्रथम बार 
उनकी कविता ने विकास के आलोक सें पदापण किया | उसी 
के साथ ही कबि का ग्रादुभाव हुआ । 

यहाँ पर मैं यह भी प्रकट कर देना चाहता हूं कि प्रसाद जी 
को अपने जीवन में यात्रा करने का बहुत कम अवसर मिला था। 
एक बार कलकता, पुरी, छब्ननक और एक दो बार प्रयाग-बस 
यही उनकी यात्रा विवरण है। अनेक परिस्थितियों के कारण 


१८ 


प्रसाद का जीवन 


“जिम्मेदारी का बोझ छादे हुए प्रसाद जी भ्रमण नहीं कर सके। 
।११ बर्ष की अवस्था में जो यात्रा हुई थी, प्राकृतिक वर्णन में 
:उसका प्रभाव हम उनकी आरम्मिक कविताओं में ही देखते 
हैं; और पुरी के समुद्र तट पर बैठ कर ही उन्होंने जागरण शीर्षक 
(कविता १९.१२.३१ ई० को लिखी थी । 
कितनी सुन्दर पंक्तियां हैं-- 
“जहों सॉन्न-सी जीवन छाया 
ढीले अपनी कोमल काया 
नाछ नयन से ढुलकारती हो 
ताराओं की पॉति घनी रे ।?? 


पुरी से लौटने के बाद ही कामायनी का कथा-भाग आगे बढ़ने 
लगा । पुरी के समुद्र तट का प्रभाव कामायती में सरलता पूर्वक 
खोजा जा सकता है। मेरे कहने का तात्पय यही है. कि प्रसाद 
जी को कहीं विशेष भ्रमण करने की सुविधा भ्राप्त हुई होती तो 
सम्भव है, वह और भी अधिक पुष्ट और ठोस साहित्य का निमोण 
कर पाते । 

प्रसाद जी की एकेडेमिक-शिक्षा केवल सातवें दर्ज तक कीन्स 
कालेज में हुई | पिता के देहान्त के कारण बारह वर्ष की अवस्था 
में स्कूछ की पढ़ाई छोड़नी पड़ी, घर पर ही पंडित और मास्टर 
रख कर इनकी संस्कृत और अंगरेजी की पढ़ाई का प्रबन्ध इनके 


१९ 


असाद और उनका साहित्य 


बड़े भाई ने किया । श्री० दीनबन्धु बह्मचारी उन्हें संसक्षत और 
उपनिपद्‌ पढ़ाते थे। अह्यचारी जी सदाचारी पुरुष थे। वेद और 
उपनिषद्‌ का उनका अच्छा अध्ययन था। अतएव प्रसाद जी के 
जीवन पर उनके शिक्षण का विशेष प्रभाव पड़ा । पितामह और 
पिता के समय से ही समस्यापूर्ति करने वाले कवियों का जमघट 
रहता था। यही कारण है. कि आरम्भ सें प्रसाद जी त्रज भापा 
की कविताओं की ओर आकर्षित हुए। 


उनकी पन्‍्द्रह बष की अवस्था थी, जब माता का देहान्त हुआ | 

इन दिनों कसरत करने और पढ़ाई-छिखाई के अतिरिक्त 
प्रसाद जी को दूकान का काम भी देखना पड़ता था । वह दूकान 
पर बैठे वैठे बही खाते के रद्दी कागज पर कवितायें छिखते थे । 
एक दिल उनका यह रहस्य खुल गया । उनके बड़े भाई बाबू शस्भू- 
रल्ल जी को पता छूग गया कि प्रसाद जी दूकान पर बैठ कर कुछ 
काम तो करते नहीं हैं, केवछ कविता बनाया करते हैं । इस पर 
वह रुष्ट हुए | अव प्रसाद जी गुप्तरूप से ही यह काये करते, जिसमें 
किसी को प्रकट न हो । कुछ दिनों के बाद जब आने जाने वाले 
कवियों द्वारा प्रसाद जी की समस्या पूर्ति की प्रशंसा शम्भूरत्न 
जी के सम्मुख की गई तो प्रसाद जी के ऊपर से यह 
प्रतिवन्‍्ध हटा । 

सत्रह वर्ष की अवस्था में बड़े भाई बाबू शम्भूरत् का खर्गे- 
वास हुआ | 


२० 


प्रसाद का जीवन 


दोनों भाइयों में प्रगाढ़ स्नेह था। शम्भूरत्न जी बढ़े उदार और 
खर्चीले पुरुष थे। उनका रहन-सहन उच्चकोटि का था। सुन्दर 
बलिट्ट शरीर, प्रभावशाली व्यक्तित्व प्रकट करता था । 
ऐसी असामयिक दुघटना से प्रसाद जी अस्त-व्यस्त हो गये । 
वह यही न निश्चय कर पाते कि अब चह क्‍या करें। परिवार के 
सभी छोग चल बसे थे। केवछ एक भौजाई बच गई थीं। इस 
असार संसार में उनका कोई अपना न था। ऐसे समय में उनकी 
पैक सम्पत्ति पर कब्जा करने के लिए उनके कुटुम्बियों और 
सम्बन्धियों का षड़यन्त्र चछ रहा था, उनके जीवन मरण का 
प्रश्न उपस्थित था । 
मुझसे जब कभी वह अपनी जीवन कहानी सुनाते तो उनका 
चेहरा तमतमा उठता, आँखें भर आती और छलाट पर संसार 
की कठोरता की एक रेखा स्पष्ट खिच जाती थी। 
अनेक कठिनाइयों का सामना करते हुए भी प्रसाद जी ने 
पठन-पाठन को ही अपना ध्येय बना लिया था । उनका अधिकांश 
समय साहित्यिक वातावरण में ही व्यतीत होता था। 
प्रसाद जी के जीवन में एक और ध्यान देने वाली घटना है, 
उन्हें स्वयं अपना विवाह करना पड़ा । पहली पत्नी का देहान्त हम 
गया; फिर दूसरा विवाह किया। दूसरी स््री की मृत्यु के पश्चात्‌ 
उनके विचार गंभीर और ठोस हो गए थे। अब फिर से घर 
बसाने की उनकी छालसा न थी। कुछ समय बाद ढोगों के सम- 


२१ 


चसाद और उनका साहित्य 


झाने पर और सबसे अधिक अपनी भाभी के प्रतिदिन के शोक- 
भय जीवन को सुलझाने के लिए, उन्हें बाध्य हो कर तीसरा 
विवाह करना पड़ा । चिं० रत्नशंकर तीसरी पत्नी की सन्तान हैं । 

प्रसाद जी अनेक आपत्तियों और विशेषतः ऋण के कारण 
अधिक चिन्तित रहा करते थे। खानदानी दानशीछता और ढुम्बे 
खर्च के कारण वह अपनी स्थिति सुधारने में असमर्थ हो रहे थे। 
अन्त में छुछ सम्पत्ति बेंच कर वह ऋण भार से मुक्त हुए। 

१९१० ईं० तक हिन्दी का पुस्तक-प्रकाशन बाल्यावस्था में 
था। अच्छे साहित्य की न तो मांग ही थी और न ऐसे प्रकाशक 
ही थे। मासिक पतन्न-पत्रिकाओं में एक सात्र 'सरस्वती' का ही 
स्थान था। प्रसाद जी का आचाये हिवेदी जी से कुछ मत-भेद 
था। यही कारण था कि प्रतिभाशाली होने के कारण भी 'सर- 
खती” से उन्हें श्रोत्साहन नहीं मिला, जैसा कि श्री० मैथिली शरण 
गुप्त पं० रामचरित उपाध्याय और सनेही जी को मिला था । 
शायद इसीलिए ही प्रसाद जी ने एक साहित्यिक पत्र निकालने 
का निश्चय किया। 

उनके आदेशानुसार उनके भॉनजे श्री० अम्बिका प्रसाद गुप्त 
ने 'इन्दु” मासिक पत्र का प्रकाशन आरस्म किया इन्दु उच्चकोटि 
का साहित्यिक सासिक पन्न था । प्रसाद जी उसमें बराबर लिखते 
रहे। उनकी कविता, कहानी और लेखों से “इन्दु! सुशोमित रहता 
था। आधिक हानि के कारण मासिक पत्र चछाना उस समय 


रबर 


प्रसाद का जीवन 


बड़ा कठिन था; किन्तु प्रसाद जी “इन्दु! को आर्थिक सहायता देते 
हुए आगे बढ़ाते गए । “इन्दुः ने साहित्य की जो सेवा की है, वह 
हिन्दी साहित्य का इतिहास बनाने बालों से छिपी नहीं है। पं० 
रूपनारायण पाण्डेय भी उस समय इन्दु” के सम्पादकीय 
विभाग में थे । 

१९१० ई० में जिस साहित्य का निर्माण प्रसाद जी ने आरम्भ 
किया था; उसका विकास और प्रचार धीरे-धीरे बढ़ने लगा । 

नियमित रूप से प्रसाद जी लिखते रहे । अतएवं अन्य मासिक 
पत्र-पत्रिकाओं की उत्सुक्ता बढ़ी, और सम्पादकों का अनुरोध 
प्रसाद जी टा न सके । उन्हें सबके लिये कुछ न कुछ लिखना 
ही पड़ता था । इसमें सन्देह नहीं कि माधुरी” के जन्मकाल से ही 
प्रसाद जी की छेखनी वेग से चलने छगी। 

१९२३ ई० में प्रसाद जी से मेरा परिचय हुआ था। 

१९२३ ई० से १९२९ ई० तक प्रकाशित होने वाली प्रसाद जी 
की पुस्तकों की सूची इस तरह है--रकन्दगुप्त, चन्द्रगुप्त, कामना, 
आकशदीप) आँसू, कंकाछ और एक घूँट। १९२९ ई० से १९३७ 
तक आँघी, तितली, भुवस्वामिनी, इन्द्रजाछ, लहर, कामायनी, फुट- 
कर छेखों बाली पुस्तक&ओर अधूरा इरावती उपन्यास । 

मैंने देखा है, प्रसाद जी की दिनचय्योही साहित्यिक थी। प्रात:- 
काल से रात्रि तक वे या तो पढ़ते-लिखते अथवा लेखक और 
कवियों से साहित्यिक चचो होती रहती। उन्हें अवकाश ही न 


श्ड्े 


प्रसाद और उनका साहित्य 


मिलता कि चह अपने व्यवसाय की ओर ध्यान देते । अधिक से 
अधिक वह इतना ही करते थे कि कस्तूरी का व्यापारी आया तो 
कस्तूरी परख कर खरीद छेते। “भपका” चढ़ा तो गुलाबजल 
और इल्नों की देख-रेख कर छेते। प्रसाद जी अपने व्यवसाय के 
पूण ज्ञाता थे। वे सुर्ती, इत्र और हर तरह के टॉयलेट” का सामान 
बहुत सुन्दर बना लेते थे। छेकिन इस कार्यों में उतका मन ही 
न लगता । 

सन्ध्या समय नारियछ बाज़ार में उन्तकी दूकान के सामने 
चाले चबूतरे पर बैठक जमती । साहित्यिकों का नियमित जमघट 
होता। ६ से ९ बजे रात तक बातें होती रहतीं। कभी-कभी आने 
वाले छोगो में साहित्यिक प्रश्नों पर तक भी होने छगता। 
प्रसाद जी मौन होकर सुनते और अन्त सें कभी बहुत पूछने पर 
अपना मत प्रकट करते। 

बहुधा व्यर्थ समय नष्ट करने वाले मनुष्य भी आकर उनके 
यहाँ एकत्रित हो जाया करते थे। उनके चले जाने पर मैं उनसे 
कहता--पता नहीं आपको इन मूर्खो को बैठा रखने में क्या मज़ा 
मिलता है ९ 

तो वे व्यंग पूर्वक कहते--क्या तुम.यह चाहते हो कि ऐसे 
छोगों को मैं अपने यहाँ आने से मना करूं १ 

प्रसाद जी की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वह किसी को 
दुखी और अपमानित नहीं करना चाहते ये । 


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प्रसाद का जीवन 


कुछ लोगों की ऐसी धारणा है कि प्रसाद जी मौन गमस्भीरता 
का अभिनय कर अपना गौरव बनाये रखने की चेट्टा करते थे । 
मैंने अपने इतने दिनों के ढम्बे साथ में उन्हें सबेदा मढुभाषी, 
हँसमुख, मिलनसार, सहृदय और व्यवहार-कुझल पुरुष ही पाया । 
हाँ, वे “इन्टरव्यू सम्मति और विवादप्रस्त प्रश्नों के उत्तर देने से 
सदैव ही दूर रहते थे; क्योंकि इस बीसवीं शताब्दी के पत्रकारों की 
तिलछ का ताड़बना देने वाली आदत से वे भलीभांति परिचित थे । 

मैंने तो यहाँ तक देखा है कि जिन छोगों ने उनकी रचनाओं 
की तीत्र आलोचना लिखी है, उनके प्रति भी प्रसाद जी कोई दोष 
नहीं रखते थे। सामना होने पर मुस्करा कर सज्जनोचित रूप से 
पेश आना और उस आलोचना के सम्बन्ध सें भूछ से एक शब्द 
अपनी ज़बान पर न छाना उनकी विशेषता थी। 

यहाँ पर यह भी लिख देना अनुचित न होगा कि आरस्म 
में खर्गीय प्रेमचन्द जी भी प्रसाद जी के विरोधियों में थे। उन्होंने 
प्रसाद जी के नाटकों के सम्बन्ध सें लिखा था कि नाटकों में ऐसे 
प्लॉट का उपयोग करना गड़े मुर्दे उबाड़ना है। उनकी यह आडो- 
चता 'साधुरी' में प्रकाशित हुई थी। 

प्रेमचन्द और प्रसाद दो ही सम्मानित महारथी हिन्दी संसार 
में विशेष श्रद्धा के पात्र थे। प्रेमचन्द जी के इन शब्दों का प्रभाव 
प्रसाद जी के ऊपर अवश्य पड़ा था, किन्तु बाहर से चह प्रकट 
नहीं करना चाहते थे । 


र५्‌ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


हिन्दी के साहित्यिक--बाज़ार में उन दिनों दुलवन्दी की घूम 
थी। एक तरफ विख्यात प्रोपोगैन्डिस्ट पं० बनारसी दास चतुर्वेदी 
अपना बंगीय शंख फूंक रहे थे। दूसरी तरफ बाबू ढुलारे छाल 
भार्गव उदीयमान लेखकों का साँचा तैयार कर रहे थे। ये दोनों 
भहा पुरुष प्रसाद जी के विरोधियों में थे । 

एक दिन आवेश में आकर, मैंने प्रसाद जी से कहा--मैं इन 
छोगों का उत्तर देना चाहता हूं । 

उन्होंने कहा--लिखने दो; न मैं खुद उत्तर देना चाहता हूं 
और न तुम्हें ही सलाह दूंगा । 


उन दिलों नोबुल आइज विजेता स्ीस छेखक कोर्ल स्पिटलर 
की “लाफिंग द्रथस” पुस्तक सैं पद रहा था। उसमें एक स्थान 
पर लिखा थाः-- 


ध्यहों एक और सुन्दर दृश्य है। एक लेखक समूह दूसरे समूह को गये 
के साथ पशुवत आचरण करने वाला सिद्ध करके समाज से प्रथक करता है 
और दूसरा समूह भी उन्हें विरवास घातक तथा भ्रष्ट कह कर उनका परिचय 
लह्लियों की देता है और इस पर भी हम छोनों को श्रन्थकार की कला का 
सम्मान करने के लिये कहा जाता है। मैं नहीं जानता कि इसकी आरम्भ 
किसने किया, किन्तु मेरा सम्बन्ध इस बात की खोज करने से, कि इसका अन्त 
कौन करेगा, बहुत अधिक है ।' 


मैंने यह वर्णन प्रसाद जी को दिखलछाया। वह मुस्कराये, बोले-- 
रद 


प्रछखाद का जीवन 


ऐसे छोग सभी युग में और सभी साहित्य में रहे हैं और रहेंगे। 
उन पर ध्यान न देना चाहिये । 

मेरे यह लिखने का तातपय॑ यही है कि ऐसी बातों को ढ्ेष के 
रूप में प्रसाद जी अपने मस्तिष्क में स्थान नहीं देते थे | 

उस आछोचना के कई मास वाद प्रेमचन्द जी प्रसाद जी' 
के यहाँ आये और उन्होंने अपने लिखने पर खेद प्रकट 
किया । 

प्रसाद जी ने बढ़ी सरछृता से कहा--मुझे उसका कोई ख्याल 
नहीं है ! 

कंकाल” की आलोचना करते हुए उसी भाष को प्रेमचन्द जी 
ने स्वयं प्रकट किया था-- 

कंकाल! प्रसाद जी का पहला ही उपन्यास है, पर आज हिन्दी मे बहुत 
कम ऐसे उपन्यास हैं, जो इसके सामने रकक्‍्खे जा सके। मुझे अब तक आपसे 
यह क्षिकायत थीं, कि आप क्यों प्राचीन वैभव का राग अलापते हैं, ऐसी 
चौनें क्‍यों नहीं लिखते जिनमें चर्तमान समस्याओ की गुत्थियाँ सुलझायी गयी 
हों। न जाने क्यों मेरी यह धारणा हो गई है, कि हम आज से दो हज़ार 
वर्ष पूर्व की बातों ओर समस्याओं का चित्रण सफलता के साथ नहों कर 
सकते । मुझे यह असम्भव सा मालूम होता है। हमको उस जमाने के रहन- 
सहन, आचार-विचार का इतना अत्प ज्ञान है, कि फदम-कदस पर ठोकरें 
खाने की सम्तावना रहती है। हमकी बहुत कुछ कल्पना का आश्रय लेना 
पढता है, और कत्पना यथाथ का रूप खड़ा करने में बहुधा असफल होती 


२७ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


है। शायद यह भेरी श्रेरणा का फल है, कि प्रसाद जी ने इस उपन्यास में 
समकालीन सामाजिक समस्याओं को हल करने को चेश की है, और खूब की 
है। भेरी पहली शिकायत पर कुछ लोगों ने मुझे खूब आडे हाथों लिया था, 
पर अब मुझे बह कठोर बातें बहुत प्रिय रूग रही हैं, अगर ऐसी ही दस 
पांच लताडों के बाद ऐसी सुन्दर वस्तु निकल आए, तो मैं आज भी उनको 
सहन करने को तैयार हैँ । 

अन्त में घनिष्टता इतनी बढ़ी कि प्रति दिन प्रातःकारू जब 
प्रसाद जी टहलने के लिए विक्टोरिया-पा्क में जाते थे तो श्रेम- 
चन्द्‌ जी से उनकी मुछाकात बराबर होती । 

प्रसाद जी की अन्तरंग मण्डली बहुत बड़ी न थी। वह किसी 
के यहाँ जाने में हिचकते थे। जब कभी वह घर से बाहर निकलते 
तो उनके लिए दो ही स्थान थे, या तो श्री० राय कृष्णदास के 
यहाँ अथवा भेरे यहाँ। उनके मित्रों में राय कृष्णयास जी और 
पं० केशवप्रसाद मिश्र अग्युख थे । 

मित्रता के सम्बन्ध में प्रसाद का क्‍या सिद्धान्त था, इसका 
आभास “आधी” कहानी के इस अंश में झलकता है । 

'मिन्न मान लेने में मेरे मन को एक तरह की अढचन है। इसलिए मैं 
आय" अपने कहे जाने वाले मिन्नों को भी जब अपने मन में सम्बोधन करता 
हैं, तो परिचित ही कद कर, सो भी जब इतना माने बिना काम नहीं चछता। 
मित्र मान लेने पर मनुष्य उस से शिवि के समान आत्मत्याग, वोधिसत्व के 
सहश सर्वस्व समर्पण की जो आशा करता है और उसकी शक्ति की सीमा 


ब्८ 


प्रसाद का जीवन 


को तो प्राय अतिरंजित देखता है। वैसी स्थिति में अपने की डालना मुझे 
पसन्द नहों। क्योंकि जीवन का हिसाब-किताव किसी काल्पनिक गणित के 
आधार पर रखने का मेरा अभ्यास नही, जिसके द्वारा मनुष्य सबके ऊपर 
अपना पावना ही निकाल लिया करता है । 

कभी-कभी हमलछोग इक्के पर बेठ कर पं० केशवम्नसाद सिश्र 
और भाई वाचस्पति के थहाँ जाया करते थे । 

मुझे असी तक भूला नहीं है. कि एक तरफ ६ पैसे के इक्के पर 
मैं और प्रसाद जी जा रहे थे, और दूसरी ओर से) विश्वविद्यालय 
से आते हुए, स्व० छाछा भगवानदीन, पं० अयोध्यासिंह उपाध्याय 
“'हरिऔध” और पं० रामचन्द्र शुक्व एकही इक्के पर लदे चछे आ 
रहे थे । 

सहसा मैं प्रसाद जी से कह उठा--देखिए, यह हिन्दी साहित्य 
का कितना बड़ा दुभोग्य है कि उसके इतने बड़े-बड़े महारथी छोग 
छः पैसे के इक्के पर धूछ फॉकते चले जा रहे हैं । 

इस अवसर पर वह खिलखिला कर हँस पढ़े । 

प्रसाद जी बढ़े हास्य-प्रिय थे। वह बड़ा सुन्दर मजाक करते 
थे, किन्तु केवल अपने अन्तरंगों के साथ । 

श्री० मैथिलीशरण गुप्त, स्वर्गीय अजमेरी जी के साथ काशी आते 
तो कभी राय कृष्णदास जी अथवा प्रसाद जी के यहाँ मंडली एक- 


त्रित होती । खूब आनन्द आता था । स्व०अजमेरी जी तो हँसी के 
खज़ाना थे। 


श्९्‌ 


असाद और उनका साहित्य 


प्रसाद जी भोजन के बढ़े शौकीन थे। चह स्वयं अपने हाथ से 
अच्छा खाना बना छेते थे । एक बार बगीचे की सैछ थी | मंडी 
में २०-२० आदमी थे। भोजन और ठंडाई का पूरा प्रबन्ध था। 
दाल, चावल अछग-अछग हॉड़ियों में चढ़ गया। प्रसाद जी गोभी; 
आल, मटर की तरकारी और चूरमे का लड्डू बनाने में व्यस्त हो 
गए। बड़े उत्साह से उस दिन उन्होंने बनाया था। उनके बनाये 
हुए पदार्थ इतने स्वादिष्ट थे कि आज तक भूले नहीं हैं। उसके 
बाद तो अनेक अवसर आये, छेकिन वह तरकारी बड़ी सुस्वादु 
बनी थी । मुझे उसी दिन पता छगा कि प्रसाद जी भोजन बनाने 
में भी कुशल हैं । 

प्रसाद जी को पृष्पों से अधिक प्रेम था। उन्होंने अपने मकान 
के सामने एक छोटा सा बगीचा छगाया था । प्रति दिन बह दो 
|, त्तीन घन्टा उससें लगाते थे। तरह-तरह के फूलों की क्यारियों 
बनी थीं। गुलाब, जूही, वेछा, रजनीगंधा इत्यादि जब फूलते तो 
मुग्ध होकर वह देखते। वो के दिनों में चह छोटी-सी बाटिका 
अत्यन्त मनोस्म मालूम पड़ती थी। पारिजात के वृक्ष के नीचे 
एक पत्थर की चौकी थी, उसी पर बेंठ कर प्रसाद जी अपनी 
रचनाएं सुनाते थे । 

प्रसाद जी को एक शतरंज को छोड़ कर और अन्य किसी खेल 
से प्रेम न था | वहखिलाड़ी मिल जाने पर शतरंज अवश्य खेलते 
थे। मुझे यह मनहूस खेल पसन्द नहीं था, अतएव मैं सदा इसका 


३० 


प्रसाद का जीवन 


विरोध करता । इस पर वह कभी चिद भी जाते | मैं मौन होकर 
बैठा रहता । 

संसार के किसी महान्‌ लेखक--छ्यूगो; टॉल्सटाय, ड्यूमा 
की रचनाओं पर तैयार की हुई फिल्‍म आ जाती तो बह सिनेसा 
भी चढे जाते थे । सब से अधिक नाव पर बैठ कर सैर करना ही 
उन्हें पसन्द था । 

१९३१ ई० में प्रसाद जी का साहित्यिक कार्य क्रम शिथिलू हो 
रहा था। उन्होंने एक सकान बनवाया था। उसमें खर्च काफी 
हो गया। उधर आय भी कम हो गई थी। व्यवसाय की ओर 
ध्यान न देने के कारण दिन पर दिन हानि की सम्भावना ही 
दिखाई पड़ने छगी। 

मन-बहछाव के विचार से ही सपरिवार वह पुरी गये थे। मैं 
उनके साथ कलकचे तक गया था । पुरी के र्मणीक दृश्यों ने उनके 
कवि-हृदय को अश्वासन तो दिया परन्तु अधिक खर्च हो जाने के 
कारण मानसिक व्यग्रता फिर उपस्ित हुई। क्‍या होगा ? कैसे 
चलेगा ९--रूस्ववादी होने पर भी इन प्रश्नों में वह उलझ गये । 
, आर्थिक समस्याओं के कारण अब वह नियमित रूप से कारखाने 
का कार्य देखने छगे । 

(हंस! मासिक रूप में, कहानियों का मासिक पत्र, प्रेमचन्द 
जी के संस्पादन में निकल रहा था; उसका नाम करण और 
योजना असाद जी की ही थी। वह उसमें बराबर लिखते रहे | अब 


३१ 


अखाद जौर उनका साहित्य 


उनका विचार था कि काशी से एक छुद्ध साहित्यिक पाछ्तिक पत्र 
निकाला जाय । 

भाई शिवपूजन जी भी उन दिनों काशी में ही रहते थे । हम 
छोगो ने शीघ्र ही निश्चय कर लिया कि उनके सम्पादन में पत्र का 
प्रकाशन आरम्भ कर: दिया जायगा। अतएब प्रसाद जी से पूछा 
गया कि पत्र का नाम क्या होगा; दो दिन विचार करने के 
बाद, उन्होंने पत्र का नाम जागरण ? रक्खा। 

बसन्त पंचमी ११ फरवरी १९२०९ ई० को पुस्तक मन्दिर से 
“जागरण! का प्रथम अँक प्रकाशित हुआ था । जागरण” को उनका 
पूर्ण सहयोग प्राप्त था। शिवपूजन जी उन्हीं के आदेशानुसार उसका 
सम्पादन करते थे । पूर्ण साहित्यिक होने के कारण पत्र सबब-सा- 
धारण के उपयुक्त न था। अतएव उसमें भारी हानि होती जा 
रही थी । अन्त में वह पतन्न ग्रेमचन्द जी को दे दिया गया। प्रेम- 
चन्द जी के सम्पादन में वह साप्ताहिक हो कर निकछा | 

प्रसाद का वास्तविक जीवन बहुत ही स्पष्ट था। मैंमे उन्हें 
सदैव ही सात्विक पाया। पान को छोड़ कर उन्हें और कोई 
व्यसन नहीं था; वह भाँग तक नही पीते थे। माँस-मदिरि से 
हार्दिक घृणा सी थी। शराबी चरित्रों का निमोण करने में वह 
अत्यन्त स्वाभाविक थे, किन्तु उन्होंने लोगों को पीते हुए और नशे 
में देखा था। लेकिन खुद कभी नहीं। चौद्‌ह ब्ष तक प्राय प्रतिदिन 
प्रसाद जी के साथ रहते हुए भी मैंने उनमें कोई दुग्गुण नहीं देखा | 


डर 


प्रसाद का जीवन 


छेखक के चरित्र का प्रभाव उसकी रचनाओं में कहाँ तक 
पड़ता है, यह एक विवाद का विपय है। “जागरण में कविवर 
निराठा जी का चरित्र पर एक लेख प्रकाशित हुआ था। उसमें 
उन्होंने लिखा था--- 

'क्ालिदास, श्रीहर्प, शेक्सपीयर, वायरन, उमरखप्याम, रवीन्द्रनाथ 
आदि कवि काव्य में बड़े चरित्रवान हैं या असचरित्र ः इनकी कथाओं से 
हमें क्या मिलता है ? इनका चुम्बनालिंगन काव्य क्यों बडेनवड़े लोग पीते 
; रहते हैं ? यह वमन पीना वन्द्‌ करा दौजिये | 'घूंघट के पट खोल री, तोहें 
राम मिललेंगे---यह क्या है? क्यों महात्मा जी इसे गाते-नाबाते हैं ; पाप अगर 
. नीचे की तरफ जाता है, तो नौचे क्या है-अघः ब्रह्म नहों /' 

मेरा कवि सदा निरपराध है। मैं क्‍या कहूँ, वह क्या क्या करता है १ 

प्रसाद जी ने जागरण के अग्रलेख में छिखा था-- हाँ, अपवित्रता, 
असतओर  दुश्वरित्र कला का उद्देश्य न होना चाहिये । यदि कोई कछाकार चारित्रिक 
पतन के कारण अपने व्यक्तित्व की नष्ट करके भी कला में कल्याणमयी सृष्टि 
कर सकता है, तो उसका विशेषाधिकार मानते हुए प्रायः लोग देखे जाते हैं। 
कालिदास आदि के सम्बन्ध में ऐसा ही कहा जा सकता है, किन्तु इसका यह 
मतलब नहीं कि कलाकार को कुचरित्र होना ही चाहिए। यह निसंकोच कहा 
जा सकता है कि कलाकार की कसौटी उसकी कला है, न कि उसका व्यक्तित्व 
वाल्मीकि और व्यास का आदर्श देखते हुए तो यह कहना पढ़ता है कि 
बिना जले हुए, विदग्ध साहित्य की सृष्टि नहीं हो सकती, और तव कलाकार 
अपनी कला में व्यक्तित्ष को खो कर कला के ही रूप में प्रतिष्ठित होता 


रे डरे 


प्रखाद और उनका स्गहित्य 


है। उसे जनता का सम्मान मिलता ही है, चाहे आज मिले या हज़ारों 
वर्ष बाद ।' 

अतएव यह ठीक ही है कि कछा को, छेखक को चरित्र की 
कसौटी पर न कसना चाहिये। यदि संसार के महान लेखकों का 
चरित्र अन्वेषण किया जाय तो अधिकांश असचरित्र और विलासी 
प्रमाणित होंगे। संसार के साहित्य पर अमरता की छाप डालने 
वाला; फ्रेच कछाकार विक्टर ब्यूगो का ही चरित्र छीजिये। उननी- 
सर्वी-शताव्दी में विश्व-साहित्य उसके चरणों पर नत-मस्तक हो 
गया था। उसने जिस साहित्य का निमौण किया, वह आज तक 
हिसाचलछ की तरह अटल है। किन्तु व्यक्तिगत जीवन उसका 
दूसरा ही था। अपनी पत्नी एडिली और प्रेयसी जूलियट के होते 
हुए भी वह एक यहूदी अभिनेत्री की ओर आकर्षित हुआ । उन 
दिनों फ्रांस सें इस तरह के अपराधी के लिए बड़ा कठोर दृण्ड 
नियत था। विक्टर द्यूगो और यहूदी नटी दोनों दी जेलखाने 
की हवा खाते, लेकिन विक्टर स्वयं 'हाउस आफ पियसे! का 
मेम्चर था । इसलिए छुछ न हो सका। कुछ छोगों का तो यह भी 
कहना है कि खयं बादशाह छुई फिलिप ने इस मामले को 
शानन्‍्त किया । 

प्रसाद जी की अल्हड़ जवानी सें भी एक घटना ऐसी ही 
घटी थी । यह मुझे बाद में पता छगा जब १३ फरवरी १९३६ ई० 
को मैंने उनसे पूछा--“आपकी रचनाओं में प्रेम का एक उज्वल 


झट 


पसाद का जीवन 


रहस्य छिपा हुआ है, छेकिन मुझे इतने दिनों में भी आपने यह 
नहीं बतछाया कि आपकी वह अज्ञात प्रेयसी कोन थी ९? 

उन्होंने जो कुछ उत्तर दिया उसके पश्चात फिर इस सम्बन्ध 
में मैंने उनसे कुछ नहीं पूछा । 

प्रसाद जी का व्यायाम की ओर बचपन ही से अभ्यास था । 
बह एक हज़ार बेठकी और पाँच सो दण्ड अपनी जवानी में प्रति 
दिन करते थे । उन्हे कसरत कराने वाछा शिक्षक उनसे बॉह करने 
में थक जाता था। दो एक बार कुछती में भी उन्होंने उस कछा के 
विशेषग्यों को परास्त किया था। इससे उनके बढ़े भाई की प्रसन्नता 
बढ़े गई थी। अपनी खुराक के बारे में प्रसाद जी खयं कहते थे 
कि फल, दूध और घी के अतिरिक्त वह आध' सेर बदाम प्रति 
दिन खाते थे। 

प्रसाद जी का मध्यम श्रेणी का कद था। गौर वर्ण, गोल मुँह, 
दाँत सब एक पक्ति में--हँसने में बहुत स्वाभाविक मारूस पड़ते 
थे। जवानी सें तो द्वाका के मलमरू का छुतों और शान्तिपुरी 
धोती पहनते थे; छेकिन बाद में खद्दर का सी उपयोग करते रहे। 
जाड़े में सुंघनी रंग के पट्टू का कुश्ता अथवा सकरपारे की सींयन 
का रुईदार ओवरकोट पहनते थे। आँखों पर चश्मा और हाथ सें 
डण्डा-असाद जी का व्यतित्व बहुत ही आकष्षक था | 

प्रसाद जी ने अपने जीवन में पुरस्कार रूप भें एक पैसा भी 
किसी पत्र-पत्रिका से नहीं लिया । बह निस्‍्वार्थ भाव से साहित्य- 


३५ 


अ्र्ताद और उनका साहित्य 


सेवा करते रहे । हिन्दुस्तानी-एकेडमी से ५००) का और नागरी 
प्रचारिणी सभा से २००) पुरस्कार उन्हें मि्ता था। यह ७००] भी 
उन्होंने नागरी प्रचारिणी सभा को अपने भाई के स्मारक सखरूप 
दान दे दिया | 

प्रसाद जी के जीवन में यह एक नोट करने की वात है कि 
उन्होंने किसी कवि सम्मेछन अथवा सभा का सभापति होना कभी 
स्रीकार नहीं किया । कवि सम्मेलन में यदि कभी जाते भी तो 
अपनी कविता सुनाना उन्हे पसन्द नहीं था। बहुत आग्रह करने 
पर अपनी छिखी पुस्तक में से वैठ-वेठे कुछ पढ़ देते थे। जीवन में 
पहली वार नागरी प्रचारिणी सभा की ओर से कोपोत्सव के अब: 
सर पर उन्होंने खड़े हो कर जनता के सन्मुख “नारी और छज्ञा' 
कविता पढ़ी थी। वाह-बाह की पुकार मच गई। सचमुच 
प्रसाद जी ने इतने सुन्दर ढंग से सुनाया था कि सभी मुग्ध हो 
नये थे। 

दिसम्बर १९३६ ६० तक अ्रसाद जी कुछ साहित्यिक कार्य 
करने के छिये निश्विन्त हो सके थे। सन्‌ १९३१ से लेकर ३६ 
तक अन्य पुटकर कविता कहानी और लेखों को छोड़ कर प्रसाद 
जी ने केवछ भ्ुवखामिनी नाटक, काम्रायनी महाकाव्य और 
इरावती »'धृरा उपन्यास ही छिखा | इन सात वर्षों में पारिवारिक 
और आश्थिक समस्याओं के कारण प्रसाद जी प्रायः चिन्तित दिख- 
छाई पढ़े | कामायनी के साथ उन्हें कठोर तपस्या करनी पड़ी थी | 


रे8 


प्रसाद का जीवन 


जिस दिन कामायनी समाप्त हुईं, उनके चेहरे पर एक अपूर्त 
शान्ति विराज रही थी । 

मैंने कहा--“आपने हिन्दी साहित्य के भंडार में सब कुछ भरा 
है; उसके प्रत्येक अंक की पूर्ति की है 

वे मौन थे। केवछ इतना ही कहा--“कामायनी लिखकर सुझे 
सन्‍्तोष है ।! 

छखनऊ प्रदर्शनी से लौट कर मैं आया था । उहोंने कहय--मैं 
भी छूखनऊ जाना चाहता हूं । 

मैंने कहा--अवश्य जाइये, परिवर्तन से दिल बहलाव हो 
जायगा !' 

इसके बाद लखनऊ से जबबे छौटे तो मलीन से दिखलाई पढ़े। 
२८ जनवरी ३७ से उन्हें ज्वर आने छगा। हम लोगों ने समझा; 
साधारण ज्वर है; दीक हो जायगा । २९ फरवरी को उनके कफ की 
जॉच कराई गईं, तो मारछ्स हुआ कि उन्हें राजयक्ष्मा हो गया है। 

इस रोग के परिणाम से प्रसाद जी सलीभांति परिचित थे । 
डनकी पूरे पत्नी का देहान्त भी इसी रोग के कारण हुआ था। 
उनकी बातों में जीवन के प्रति उदासीनता दिखछाई पड़ने छूगी । 

मैं प्रतिदिन उनसे मिलने जाया करता था। घन्टों बैठ कर 
इधर-उधर की बातें करता, जिसमें उनका सन बहला रहे । कभी 
एक दिन कुछ अच्छे हो जाते, फिर कष्ट बढ़ जाता। कफ काफ़ी 
निकलने छगा था। शरीर शिथिल होता जा रहा था। प्रायः सभी 


|््७ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


का कहना था कि परिवर्तन के लिये किसी पहाड़ अथवा सेनोटो- 
रियम में प्रसाद जी को छे जाना चाहिये। लेकिन उन्होने इसको 
स्वीकार नहीं किया । वह काशी छोड़ कर कहीं बाहर नहीं जाना 
चाहते थे। 

प्रसाद जी में एक बात और विशेष थी कि वह जो निश्चय कर 
लेते फिर उसी पर अटल रहते, किसी के समझाने का कोई असर 
न पड़ता था। हम छोगो ने यहाँ तक कहा कि यदि आप बाहर 
नहीं जाना चाहते तो जाने दीजिए, यहाँ सारनाथ के पास किसी 
बगीचे में ही चल कर कुछ दिन रहिए । डाक्टरों का कहना है 
कि इस रोग में सब से बड़ी औषधि वायु परिवर्तन ही है। 

सारनाथ के पास बगीचा ठीक किया गया। बहुत कुछ सम- 
झाने पर किसी तरह उन्होंने वहाँ चछना स्वीकार कर लिया । सब 
सामान छारी द्वारा वहाँ पहुँचाया गया, किन्तु अन्त में वह वहाँ 
नजा सके। 

मैं जब पहुँचा तो बड़े करुण शब्दों सें उन्होंने मुझसे कहा-- 
“जो होना होगा वह यहीं होगा ऐसी अवस्था में अब घर से बाहर 
जाने में और भी कष्ट होगा ।” 

मैंने कहा--/जैसी इच्छा, जाने दीजिये ।” 

प्रसाद जी धार्मिक मनोदृत्ति के पुरुष थे। वह शिव के उपासक 
थे। आचार-व्यवहार में भी वह आस्तिक थे। किसी के हाथ की 
कची रसोई खाने तथा जूता पहन कर पानी आदि पीने से परहेज 


रे८ 


प्रसाद का जीवन 


रखने में भी वह हृद थे । अपने अन्तिम समय तक जब पुजारी 


। प्रति दिन की तरह पूजा कर के शिव का चरणाझ॒त, बेलपत्र और 


फूछ छाता तो वह उसे श्रद्धा से आँखों और सस्तक पर छगा ल्ते । 
मैंने सदेव उन्हें ऐसा ही देखा । 

“इसी तरह अच्छे और बुरे दिनि सुख-हुःख की कसोदी 
पर अपनी रेखायें अंकित कर जाते थे। 

मैं कहता--“बरसाती दिन बीत जाने पर सर्दी में आपका 
खास्थ्य सुधर जायगा [* 

वे कहते--“देखो कया होता है ? कमजोरी बढ़ रही है, शरीर 
शिथिल होता जा रहा है । 

उनकी ऐसी अवस्था देख कर हृदय पर बड़ा भीषण आधात्त 
छगता । फिर भी मैं उन्हें सान्‍्त्वना देने की चेष्टा करता | 

आठ-नो महीने तक होम्योपैथिक चिकित्सा ही चलती रही। 
इसका एक कारण यह था कि प्रसादजी परहेज्ञ नहीं करना चाहते थे। 

चि० रल्नशंकर ने स्कूछ की पढ़ाई छोड़ दी थी। वह प्रसाद जी 
के सामने से ही कारखाने का काये सीखते थे। प्रसाद जी स्वयं 
उन्हें अपने साथ काम सिखकाते थे । 

साहित्यिक कार्यक्रम तो उनका पूर्ण था ही, साथ-ही-साथ 
परिवारिक प्रबन्ध में भी कोई न्रुटि नहीं थी। फिर भी सम्तान 
की समता के जार से वह अछग न हो सके। उनके दाशेनिक 
विचार और सिद्धान्त स्वयं एक पहेली से बन गये । 


३९ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


अब रोग इतना बढ़ गया था कि डाक्टरों ने उनका किसी से 
सेंट और बात करना भी बन्द करवा दिया। उनकी ऐसी अवखा 
देख कर सभी छोग व्यग्र हुए | सव के अनुरोध पर उन्होंने वेधक 
चिकित्सा खीकार की । दो-महीने आयुर्वेदीय औषधियों का सेवन 
चलता रहा | उससे भी कुछ छाम न हुआ | 

अन्त में फिर उसी होमियोपैथिक चिकित्सा पर ही प्रसाद जी 
निर्भर रहे। 

उनके फैछाशबास के बीस दिन पहिले मैं उन्हें देखने गया 
|, था। यही उनसे मेरी अन्तिम भेंट थी। वे पलँग पर पड़े थे। सूखी 
हड्डियों के ढांचे पर मॉस का एक पतला सा आवरण मात्र ही रह 
गया था--मुख कान्तिहीन, पीछा-सा, आँखें धँसी हुई) उन्हें बात 
करने में भी बड़ा कष्ट होता था। 

बहुत देर चुप रहने के बाद मेरी तरफ देखते हुए हाथों को 
ऊपर उठा कर उन्होंने कहा--देखो” ! 

मैं समीप जा कर उनका हाथ देखने छगा। उस भीषण रोग 
के साथ ही उन्हें चमम रोग हो गया था, लेकिन उस समय तक 
चह अच्छा हो चुका था । कुछ चिह्न मान्न शेष थे | 

उस दिन वहाँ से छौटकर मुझे खाना-पीना कुछ भी अच्छा 
न लगा । मैंने समझ लिया कि अब प्रसाद जी इस दुनियाँ पर चन्द 
दिनों के मेहमान हैं । 

१४ नवम्बर एकादशी को सन्ध्या से ही उनकी अवस्था अधिक 


छ० 


प्रसाद का जीवन 


घराब हो गईं थी। सांस छेने में भी बहुत कष्ट होने छगा था। 
एत्रि में उपखित डाक्टरों ने अन्तिम घड़ी का संकेत करते हुए 
कहा--जो कुछ कहना-सुनना हो कह-सुत्र छीजिये ।! 

उन्होंने इतना ही कहा--'सांस छने में बहुत कष्ट हो रहा है; 
केवल उसे दूर करने की दवा दीजिये ।' 

१० नवम्बर १९२७ ई० को तड़के ही नौकर ने आकर द्वार 
खटखटाया । मेरे पूछने पर उसने कहा-“बाबू साहब का खर्गे- 
वास हो गया ।! 

मैं अलन्त कातर हो कर दौड़ा हुआ वहाँ गया। उस दिन 
साढ़े चार बजे उनके प्राण निकले थे। सुना था; अन्त समय तक 
उनका ज्ञान बराबर बना रहा। 

पूवेजों की प्रथा के अनुसार हरिचन्द्र-घाट पर उनकी अन्‍्ते- 
छ्विक्रिया की गई । 

स्सशान पर उनकी चिता का वह चित्र आँखों से आज तक 


नहीं हट सका है। पता नहीं क्‍यों ? शायद इसीलिए कि वह एक 
कठोर सत्य है ! 





४१ 





अऑगरेजी-कोष के अनुसार उपन्यास का अर्थ है, वास्तविक 
जीवन की कहानी अथवा आश्रर्यंमय कहानी । 

आरस्भ में साहसिक क्रियाओं का वर्णन ही कथा का मुख्य 
उद्देश्य माना जाता था । ऐसे उपन्यास में घटनाओं का क्रम बना- 
कर नायक आपत्ति और उल्झनों के साथ अपने कार्य भें प्रविष्ट 
होता था। कुछ अन्य चरित्रों को भी उपस्थित कर के नायक के 
कार्य में सहायता पहुँचाई जाती थी । ऐसे उपन्यासों में दुष्ट और 
नीच ग्रवृत्ति के चरित्रों की मृत्यु और अन्त में नायक की विजय 
सफलतापूर्वक दिखलाई जाती थी ) यह्‌ उन उपन्यासों का प्रधान 
उद्देश्य था। बिदेशों में उपन्यास की यही प्रणाढी भ्रचलित थी, 
किन्तु भारतीय कथा - साहिदय पौराणिक और धार्मिक डोर में बँधा 
हुआ था । आगे चलकर अन्य देशों की भौति उससे भी परिवर्तन 
की लहर उठने छगी। यह्‌ एक निम्।ित सत्य है कि संसार के 


प्रखाद के उपन्यास 


साहिद्य में फ्रेंच-साहिय ही अगुआ है। जिस तरह साहितदय व 
संगीत में उन्होंने जीवन दिया है, बैसे ही १७ वी शताब्दी के वाद 
उपन्यासों का क्रम भी बदछा । साहसिक क्रिया ने आत्मा का रूप 
ग्रहण किया । मनुष्य के सुख -दुःख की पहेली, सामाजिक जटि- 
छुता और जीवन के भिन्न-भिन्न अंग ही उपन्यासों के चिपय 
बने । १९ वीं शताब्दी में फ्रंच- साहित्य में द्यूगो, वालजक, पलों- 
बर, मोपासोँ इल्ादि महारथियों ने उपन्यास-कछा को उच्च-शिखर 
तक पहुँचा दिया था। संसार के साहिद्य पर उनका इतना प्रभाव 
पड़ा कि अन्य देशों के उपन्यासों का ऋ्म भी बदला । योरोप का 
उपन्यास -साहित्य उनका ऋणी है, इसमें कोई संदेह नहीं । 

इधर २० वीं शताब्दी में हमारे हिन्दी कथा-साहित्य के भाग्य 
ने भी पलटा खाया । अब छखलछखा सुँधाकर वेहोश करने और 
कमरबन्द फेककर ऊपर चद्नेवाले, गली और सड़क पर भटकने 
वाले पात्रों के लिए विस्तृत क्षेत्र दिखलाई पड़ा, और हमें प्रमचन्द्‌ 
जी के इस मत से सहमत हो कर आगे बढ़ना पड़ा-- 

“हर्ष और ओोक, प्रेम और अनुराग, ईपों और द्वेंष भनुष्य-सात्र में 
व्यापक हैं। हमें केवल हृदय के उन तारों पर चोट छगानी चाहिए, जिनकी 
झंकार से पाठकों के हृदय पर भी वेसा ही प्रभाव हो । सफ़र उपन्यासकार 
का सब से बडा लक्षण यह है कि वह अपने पाठकों के हृदय में उन्हीं भावों 
को जाग्रत्‌ कर दे, जो उसके पात्रों में हो ।? 

आधुनिक चरित्र-प्रधान हिन्दी-उपन्यासों का ढाचा खड़ा 


ह३ 


अ्रसाद और उनका साहित्य 


ऋरने का एकमात्र श्रेय प्रेमचन्द्‌ जी को ही है। जो उपन्यास साह- 
पसिक क्रिया से आरम्भ होता है, उसमें कथानक के आधार पर ही 
पात्रों का चरित्र वनाया जाता है, किन्तु जो केवर चरित्रों के बल 
पर ही चलता है, उसमें पात्रों के चरित्र के अनुसार ही कथानक 
बनता है। चरित्र - प्रधान उपन्यासों में कथानक को इस लिए सरल 
रकक्‍्खा जाता है और उन पर कुछ विशेष ध्यान नहीं दिया जाता। 
अ्रेमचन्द जी ने जासूसी, तिलिस्मी उपन्यासों के युग में चरित्र- 
प्रधान उपन्यासों को उपस्थित किया, अतएवं वह आज भी सान- 
नीय हैं और आनेवाले युग में उनका ऐतिहासिक महत्त्व रहेगा, 
इसमें भी कोई संदेह नहीं । 'सेवासदन” में भी साधारण कथानक 
के आधार पर पात्रों के चरित्रों का निमाण हुआ है । 

चरित्र -प्रधान उपन्यासों में छेखक अपने सिद्धान्त के द्वारा 
उन चरित्रों को चुनकर एकत्रित करता है, जिनके द्वारा वह अपना 
संदेश पाठकों के मस्तिष्क में प्रविष्ट करता है। अतणव भिन्न-भिन्न _ 
तक और सिद्धान्त के कारण सब चरित्र-प्रधान उपन्यासों का 
ऋम एक-सा नहीं रहता । कुछ ऊेखक साहित्य और समाज में 
नप्न चित्रण और छुचरित्रों के साथ सहानुभूति न रखने के कारण 
आदशेवादी कहलाये हैं और अन्य नप्न वर्णन छारा; जीवन को 
'सत्य के सम्मुख-रखकर, स्पष्ट चित्रण के कारण यथार्थवादी माने ' 
जाते हैं । | 

साहित्य का क्रमशः विकास होने पर आदशंवाद और यथा- 


४४ 


प्रसाद के उपन्यास 


थवाद का झगड़ा भी फ्रांस के लेखकों में सब से पहले उठा। एक 
समूह आद्शवाद का पक्षपाती बना, दूसरा दछ यथाथवाद के 
इष्टिकोण का। यथाथवाद का ससर्थन करने वालों के मुखिया 
गुस्तेव फ्लॉबर थे। फ्लॉबर, मोपासों के गुरु और प्रकाण्ड विद्वान 
| थे। अपनी योग्यता और अध्ययन के कारण अपने जीवन में ही 
उन्हें फ्रेंच यथार्थवादी साहित्य का कण्णधार साना जाता था। 
॥ भादाम बोचरी' इस श्रेणी का पहला उपन्यास है। 

१९ वीं शत्ताब्दी का आदशवाद और यथाथवाद का यह झगड़ा 
आज तक किसी देश में नहीं सुलझ सका। अतएवं इस सम्बन्ध में 
स्छॉबर और प्रसिद्ध उपन्यास-लेखिका जाज सेंड में परस्पर जो 
पत्र-व्यवहार हुआ, उसका अंश यहाँ उपस्थित कर के हम इस 
विषय को स्पष्ट करना चाहते हैं । यह अंश यथाथचाद के प्रत्येक 
(अंग पर प्रकाश नहीं डाछता, लेकिन एक ओर फ्छॉबर के यथा- 
थवादी सत का समर्थन है और दूसरी ओर जाज सेंड के आदशे- 
बाद का तके मनोरंजक होते हुए भी उपयोगी और प्रामाणिक है। 

मैं अपने हृदय की कोई वात लिखने में अजेय अनिच्छा का अनुभव 
करता हूँ। मैं तो यहाँ तक पाता हूँ कि किसी उपन्यासकार को किसी विषय 


पर अपना विचार प्रकट करने का अधिकार ही नही है। क्या ईश्वर ने अपना 


विचार प्रकट किया है ”---फलॉबर 
क्या छेखों में अपने हृदय की बात कोई न अंकित करे ? किन्तु मुझे 


पा आभास होता है कि इसे छोड़ कर और कुछ भी नहीं अंकित कर 
छ्५ 


प्रसादु और उनका साहित्य 


"सकता । क्या कोई अपने हृदय को अपने मस्तिष्क से प्थक्‌ कर सकता है * 
क्या कोई मनुष्य अपने को इस तरह से विभाजित कर सकता है? अन्त में, 
मुझे तो किसी का अपने कारये में तन्‍्मय न हो जाना ऐसा असम्भव-सा मालूम 
देता है, जैसा कि आँख के अतिरिक्त किसी ओर से विचार करना 7--.- 
जाज सैण्ड 

“हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं । मैं सोचता हूँ कि वह महान कला 
अवश्य ही वैज्ञानिक और अव्यक्तिगत होनी चाहिए। आपको मस्तिष्क के 
चल पर स्वयं अपने को पात्रों में परिवर्तत करना चाहिए, न कि उनको ही 
अपनी कक्षा में खीच लावें /---फ़्लॉवर 

लिकिन चित्रित पात्रों के विषय में अपनी सम्मति छिपाये रहना और 
परिणामस्वरूप पाठक को उन विचारों से अपरिचित रखना, जो उसे उनके 
विषय से स्थिर करने चाहिए, उन्हें न समझने देने की इच्छा करना है; और 
उसी क्षण पाठक भी आपको छोड़ देता है। पाठक की सर्वोपरिइच्छा हमारे 
विचारों मे प्रवेश करने की है और इसी का आप तिरस्कारपूर्वक निषेध करतें 
हैं /--जाजे सैण्ड ह 

“जिन पात्रों का परिचय ठेता हूँ, उनके विषय में अपनी सम्मति प्रकट 
करने का अपना अधिकार ही नही समझता । यदि पाठक एक पुस्तक की 
शिक्षा को नहीं निकाल पाता तो बह या तो स्वय॑ अत्पबुद्धि है अथवा पुस्तक 
यथार्थ से परे है; क्योंकि यदि कोई वस्तु किसी क्षण सत्य है तो वह अच्छी 
है। अइलील पुस्तकें तभी बुरी हैं, जब उनमें सत्यता नहीं हैं---पुलॉवर 

फ्छॉवर के तके की व्यापकता इसी सीमा तक है कि आज 


श्् 


प्रसाद के उपन्यास 


कल लेखक के व्यक्तित्व का: आवश्यकता से अधिक, स्पष्टीकरण 
बुरी दृष्टि से देखा जाता है। ठुले हुए दाक्य ओर उचित शब्दों 
की उसकी उत्कट इच्छा ने उसके यथा अनुकरण के तुल्य 
सौमाग्य न प्राप्त किया । उसने यह अनुभव किया कि पूर्ण प्रामा- 
णिकता के विचार से यह असम्भव है : और जब सौन्दर्य तथा 
यथार्थता का विरोध हुआ तो कहाँ त्याग आवश्यक है. इसके 
विषय सें उसका सस्तिष्क साफ था। यह वह मनुप्य था, जिसने 
'सलेम्बो! के लिए समस्त पुस्तकालयों को छान डाछा था, 'चुनवा्ड 
एट पे कुचेट” के छिए १५०० पुस्तकों से परामशे लिया था और 
जो धर्स-विरोधी की तरह लिख सकता था कि 'मैं विशिष्ट वर्णन, 
स्थानीय ज्ञाच, संक्षेप मे ऐतिहासिक तथा वस्तुओ के सत्य परिज्ञान 
को बहुत ही अपरिज्ञान समझता हूँ। मैं सर्वोपरि सौन्दर्य का 
अनुसरण कर रहा हूँ, जिसके कि मेरे सित्र साधारण ही अजु- 
रागी हैं |? 

विश्व की समस्त उन्नत भाषाओं के साहिलद सें फ्डॉवर और 
जाज सेण्ड जैसा सत रखने वाले लेखक हुए हैं और होगे । अतएव 
इन्हीं भावों को यदि हम अपने हिन्दी-साहित्य में टटोलें तो दिख- 
लाई पड़ेंगान-- 

प्रेमचन्द जी लिखते हँं---इस विषय में अभी तक मतभेद है कि उप- 
न्यासकार को मानवीय दुवलूताओं और कुवासनाओं, उसकी कमजोरियो ओर 
अपकीर्तियों का विशद्‌ वर्णन वाछनीय है या नहीं, मगर इससें कोई संदेह नहीं 


४७ 


असाद और उनका साहित्य 


कि जो लेखक अपने को इन्ही विषयों में बाँध लेता है, वह कभी उस कछा- 
विद्‌ की महत्ता को नहीं पा सकता, जीवन-संग्राम में जो एक मनुष्य की आन्त- 
रिक दशा सत्‌ ओर असत्‌ के संघर्ष और अन्त में सत्य की विजय को धार्मिक 
ढंग से दर्शाता है। यथार्थवाद का यह आशय नहों है कि हम अपनी दृष्टि 
को अन्धकार की ओर ही केन्द्रित कर दें। अन्धकार में मनुष्य को अन्धकार 
के सिवा सूझ ही क्या सकता है ? बेशक चुटकियाँ लेना, यहाँ तक कि नहतर 
लगाना भी कभी-कभी आवश्यक होता है, लेकिन देहिक व्यथा चाहे नहतर से 
दूर हो जाय, पर मानसिक व्यथा सहानुभूति और “उदारता से ही शान्त हो 
सकती है। किसी की नोच समझकर हम उसे ऊँचा नहीं बना सकते : बल्कि 
उसे और नीचे गिरा देंगे । कायर यह कहने से बहादुर न हो जायगा कि तुम 
कायर हो। हमें यह दिखिलाना पड़ेगा कि उसमें साहस, बल और चैये सब 
कुछ है, केवल उसे जगाने की जरूरत है। साहित्य का सम्बन्ध सत्य और 
सुन्दर से है, यह हमें न भूलना चाहिए। * 

दूसरी ओर यथाथवाद के पश्च की ओर से कविवर निराला जी का यह हे 
वक्तव्य भी प्रेसचन्द जी द्वारा संपादित पन्न में ही प्रकाशित हुआ था। यह 
भी विचारणीय है--- 

'यूदें आदर्श की भद्दत्ता तकन वर्तमान समाज ही पहुँच सका है और न 
उसके चित्रित करने वाले चित्रकार | स्वप्त की अस्पष्ट रेखा की तरह, उसके 
खोले हुए प्राचीन बढ़े आदर्श के चित्र, वर्तमान जागृति के प्रकाश में छाया 
मूर्तियों में ही रह गये हैं, जिनके साहित्यिक अत्तित्व अनस्तित्व ही अवल हैं। 

+* उपन्यास का विषय, हंस, माचे, १९३० ई० | 


जी 


प्रसाद के उपन्याप्त 


जब तक किसी वहते हुए प्रवाह के प्रतिकूल किसी सत्य की बुनियाद पर ठहर 
कर कोई उपन्यासकार नई-नई रचनाओं के चित्र नहीं दिखाता, तब तक च 
तो उसे साहितिक शक्ति ही प्राप्त होती है और न समाज को नवीन श्रवाहमान 
जीवन । तभी राचना-विशेष शक्ति तथा सौन्दय से पुष्ट हो कर नवीनता का 
आवाहन करती है, कछा भी साहित्य को नवीन ऐख्र्य से अलंकृत करती है, 
कलाकार कला से अधिक महत्त्व प्राप्त करता है । अथवा वह कला का अधि- 
कारी समझा जाता है, न कि किसी भ्रवाह के साथ बहने वाला केवल एक 
अनुसरणकारी । + 

प्रेमचन्द जी हिन्दी के सब से बड़े औपन्यासिक हैं, पर पूर्व कथन 
के अनुसार थुग को नये साँचे में ढाल देने वाली रचनाएँ उन्होने नही 
दी, युग के अलुकूछ रचनाएँ की हैं। आय" आदर्श को नहीं छोड़ा, 
थद्यवि उनके पात्र कमी-कभी प्राकृतिक सत्य की पुष्टि अपनी उच्छुह्ुुलताओं 
के भीतर से कर जाते हैं, तथापि रवना मे उनके आदशवाद की 
ही विजय रहती है । उनके सितार में वही वोल विशेष रूप से स्पष्ट सुन 

_ बढ़ता है।े 

अपने पूवे छेख के प्रकाशित होने के दो वर्ष बाद प्रेमचन्द जी 
फिर अपने आदशवादी मत पर टिप्पणी करते हैं-- 

'साधारणतया युवा अवस्था में हमारी निगाह पहले विध्वंस करने की 
ओर से उठ जाती है। हम सुधार करने की धुन में अधाधुन्ध शर बलाना 

+ हिन्दी-साहित्य में उपन्यास, हंस, जुलाई, १९३० ई० 

| जीवन सें साहित्य का स्थान, हंस, अप्रैल, १९३२ ई० 


४ 8९ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


शुरू करते हैं। खुदाई फोजदार बन जाते हैं। तुरन्त आँख काले धब्बों की 
ओर पहुँच जाती है। यथार्थवाद के प्रवाह में बहने लगते हैं । बुराइयों के नम्न 
चित्र खाँचने में कला की कृतकायेता समझते हैं।...... 

साहित्यकार को आदर्शवादी होना चाहिए। भावों का परिमार्जन भी 
उतना ही वांछनीय है। जब तक हमारे साहित्यसेवी इस आदर्श तक न पहुँ 
चेंगे, तव तक हमारे साहित्य से मंगल की आशा नहीं की जा सकती । अमर 
साहित्य के निर्माता विलासी प्रकृति के मनुष्य नही थे ।' 

प्रेमचन्द जी का एक उद्धरण और देकर हम अपने लक्ष्य पर 
आना चाहते हैं-- 

नवीन साहित्य अब आदर्श चरित्रों की कल्पना नहीं करता। उसके 
भरित्र अब उस श्रेणी से लिये जाते हैं, जिन्हें कोई छना भी पसन्द न करेगा । 
मैक्सिम गो्की, अनातोले फ्रांस, रोमों रोलों, एच्‌० जी वेल्स आदि योरोप के, 
स्वर्गीय रतननाथ सरशार, शरतचन्द्र आदि भारत के, ये सभी हमारे आनन्द 
के क्षेत्र को फैला रहे हैं, उसे मानसरोवर और कैलाश की चोटियों से उतार- 
कर हमारे गली-कूचों में खड़ा कर रहे हैं। वे किसी शराबी को, किसी जुआरी 
को, किसी विषयी को देख कर घृणा से मुँह नही फेर लेते । उनकी मानवता 
पतितों में वे खूबियों, उससे कहीं बड़ी मात्रा में देखती हैं, जो धर्मध्वजाधा- 
रियों में ओर पविन्नता के पुजारियों में नही मिलती। बुरे आदमी को मला 
समझ कर उससे प्रेम और आदर का व्यवहार कर के उसको अच्छा बना देने 
की जितनी संभावना है, उतनी उससे घृणा कर के, उसका बहिष्कार कर के 
नहीं। मनुष्य में जो कुछ सुन्दर है, विशाल है, आदरणीय है, आनन्द्प्रद 


न 


प्रसाद के उपन्यास 


है, साहित्य उसी की मूर्ति है। उसकी गोद में उसे आश्रय मिलना चाहिए, 
जो निराभ्रय है, जो पतित है, जो अनाह्त है ! + 

पाश्चात्य देशों के यथार्थवादी लेखकों का प्रमाव प्रेमचन्द जी 
के ऊपर अवश्य पड़ा है। इसी लिए उनका आदरशवाद कुछ ढीला 
पड़ गया है। वह पतित और बुरे आदमियों के साथ सहानुभूति 
का रास्ता खोलते हैं। किन्तु आदशवाद का पक्षपाती बुरे चरित्रों 
के प्रति सहानुभूति रखते हुए उनका अन्त कैसे बुरा और घृणित 
करेगा। आदशवाद में बुरा तो दूध की मक्‍्खी की तरह अछूग 
होता है। बुरे चरित्रों की इसी लिए सृष्टि भी की जाती है कि 
अच्छे चरित्रों के विकास में सहायता मिले, रावण और राम की 
तरह। अतएव.ग्रेमचन्द जी का यह सिद्धान्त कहों तक टिक सकता 
है, यह नहीं कहा जा सकता। 

ऊपर के उद्धृत अंशो से यह प्रकट होता है कि प्रेमचन्द जी न 
तो पूर्ण आदशंबादी ही ठहरते हैं और न यथार्थवादी ही । इसका 
पहला कारण यह है कि भारतीय-हिन्दू-समाज में उत्पन्न लेखक 
कैसे अपने आदशेवाद के अस्तित्व को समूल नष्ट कर दे ? जिस 
वायुमंडछ में अथवा वातावरण में जो उत्पन्न होता है, उसी के 
अनुसार उसकी प्रतिमा का विकास होता है। ससाज में चाहे 
जितनी अ्रष्टता हो, छेकिन उसका नप्न और स्पष्ट चित्रण साहिदय 


पर आघात पहुँचाता है, यह सभी विचारशील व्यक्तियों की राय 
+ “साहित्य की प्रगति” हंस, मार्च, १९३३ 


५१ 


असाद और उनका साहित्य 


है। यही कारण है कि भारतीय लेखक शरत; प्रेमचन्द दोनों ही 
नतो यथार्थवादी लेखक माने जा सकते हैं. और न पूर्ण आदशेबादी 
ही। विदेशी चूल्हे पर भारतीयता की डेग चढ़ा कर यह आदशेवाद 
और यथाथंबाद की जो खिचड़ी पकाई गई है, वह सचमुच 
जनता को खूब पसन्द आई है, और सफल उपन्यासों के लिए जैसे 
यही एक मा खुल गया है। 

फ्रांस के बालज़क या फ्लॉबर-जेसे महान्‌ लेखकों की, जिन्हें 
हम यथाथवादी की श्रेणी में मानते हैं, रचनाओं में कुछ अंशों में 
वे चित्र दिखलाई पड़ते हैं। उसी तरह भावुक रोमांटिक लेखक 


* झागो में भी यथार्थवादी चित्रण की पूर्ण क्षमता प्रकट होती है। 


अतएब यह भी नहीं कहा जा सकता कि इस खिचड़ी-प्रथा के 
प्रेमी विदेशी उपन्यास-लेखक नहीं थे। प्रेमचन्द जी के शब्दों में 
आदशेवाद की पर्याप्त परिभाषा हो चुकी है। अब प्रसाद जी के 
मातानुसार यथाथवाद की व्याख्या हम दे रहे हैं-- 

“थथार्थवाद की विशेषताओं में प्रधान है छछुता को ओर साहित्यिक 
इृष्टिपात | उसमें स्वभावतः दुःख की प्रधानता और बेदना की अनुभूति आव- 
श्यक है। लघुता से मेरा तात्पय है साहित्य के माने हुए सिद्धान्त के अनुसार 
महत्ता के काल्पनिक चित्रण से अतिरिक्त व्यक्तिगत जीवन के दुःख और 
अभावों का वास्तविक उल्लेख । है 

/...... इस यथार्थबादिता में अभाव, पत्तन और चेदना के अंश प्रचुरता 


प्रसाद के उपन्यास 


आरम्म में जिस आधार पर साहित्यिक न्याय की स्थापना होती है, 
जिसमें राम की तरह आचरण करने के लिये कहा जाता है, रावण की तरह 
नहों--उसमें रावण की पराजय निश्चित है। साहित्य में ऐसे प्रतिद्वन्द्री 
पात्र का पतन आदरशवाद के स्तम्भ में किया जाता है, परन्तु यथार्थवादियों 
के यहाँ कदाचित्‌ यह भी माना जाता है कि मनुष्य में दुरवताए होती ही हैं, 
और वास्तविक चित्रों में पतन का भी उल्लेख आवश्यक है। फिर पतन के 
मुख्य कारण छ्षुद्रता और निन्‍्दनीयता भी, जो सामाजिक रूढ़ियों द्वारा निधोरित 
रहती हैं, अपनी सत्ता बना कर दूसरे रूप में अवतरित होती हैं। 
बिदना से श्रेरित होकर जन-साधारण के अभाव और उनकी वास्तविक 
स्थिति तक पहुंचने का प्रयत्ञ यथार्थवादी साहित्य करता है । इस दशा में प्रायः 
सिद्धान्त बन जाता है कि हमारे ढु खों और कष्टों के कारण प्रचलित नियम 
और प्राचीन सामाजिक रूढ़ियाँ हैं। फिर तो अपराधों के मनोवैज्ञानिक विवेचन 
के द्वारा यह भी सिद्ध करने का प्रयत्न होता है कि वे सब समाज के कृत्रिम 
पाप हैं। अपरांधियों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न कर के सामाजिक परिवर्तन 
के सुधार का आरम्म साहित्य में होने लगता है। ** 
4थार्थवाद छुट्रों का ही नही, अपितु महानों का भी है वस्तुतः यथार्थ- 
वाद का सूछ भाव है---वेदना । जब सामूहिक चेतना छिन्न-मिन्न होकर पीढ़ित 
होने छंगी है, तब वेदना की विद्वति आवश्यक हो जाती है। कुछ लोग कहते 
हैं कि साहिलिकार को आदर्शवादी होना ही चाहिए और पिडांत से ही आद- 
शंवादी धार्मिक अ्वचनकरती बन जाता है। वह समाज को कैसा होना चाहिए, 
यही आदेश करता है, और यथार्थवादी सिद्धांत से ही इतिहासकार से अधिक 


णद 


प्रसाद और उनका साहित्य 


कुछ नहीं ठहरता; क्योंकि थथार्थवाद इतिद्ास की सम्पत्ति है। वह चित्रित 
करता है कि समाज कैसा है या था । किन्तु साहित्यकार न तो इतिंहासकतों है 
ओर न घर्मशाज्न-अणेता । इन दोनों के कर्तव्य स्वतन्त्र हैं । साहित्य इन दोनों 
की कमी को पूरा करने का काम करता है । साहित्य, समाज की वास्तविक 
स्थिति क्‍या है, इसको दिखाते हुए भी उसमें आदरशंवाद का सामजस्य स्थिर 
करता है। दुःखदग्ध जगत और आनन्दपूर्ण स्वगे का एकीकरण साहित्य है। 
इस लिए असत्य अघटित घटना पर कल्पना की वाणी महत्त्वपूर्ण स्थान लेती है, 
जो निजी सौंदर्य के कारण सत्य-पद पर प्रतिष्ठित होती है। उसमें विश्व मंगल 
| की भावना ओत-प्रोत रहती है. ।' 

प्रसाद जी की इस व्याख्या में कितनी गहराई है, यह अध्य- 
यनशील लेखकों से छिपी न रहेगी। प्रेमचन्द्‌ जी जहाँ नद्तर 
लगाना चाहते हैं, वहाँ घाव अस्पष्ट रहता है। प्रसाद जी उसी 
वात को कितने अच्छे ढंग से कहते हें--“साहित्यकार न तो इति- 
हासकता है ओर न धर्मशास्र-प्रणेता । साहित्य इम दोनों की कमी 
को पुरा करने का काम करता है।! 

प्रसाद कवि होने के कारण, प्रेमचन्द्र और शरत्‌ की भांति 
आदशेवाद और यथार्थवाद के मध्यवर्गीय नहीं माने जाते । रह- 
स्थवादी होने के कारण उनका सिद्धान्त ही अछग है, अतएव इसे 
ओर स्पष्ट करने के लिए यहाँ मैं विद्ात आछोचक पं० नन्ददुलारे 
वाजपेयी का सत दे रहा हूँ-- 

्रसाद जी स्पष्ट दी इन दोनों वादों का विरोध करते हैं। उनका कथन 


प्रखाद के उपन्यास 


है कि 'सास्कृतिक केन्द्रों में जिस विकास का आभास दिखाई पढता है वह 
महत्व और ल्घुल्व के दोनों सीमान्तों के बीच की वस्तु है'; यहां महत्व और 
लघुल के दोनों सीमान्तों से प्रसाद जी का तालर्य ऐतिहासिक आदर्णचाद 
और यथार्थवाद के सीमान्तों से है। दाशनिक सीमान्तों की ओर यहां उनकी 
हडिं नही है । 

इस वीच की वस्तु या मध्यस्थता के निर्देश से यह अर्थ नहीं लगाना 
चाहिए कि प्रसाद जी सिद्धान्तत- मध्यवर्गीय थे । प्रसाद जी आदर्शवाद और 
यथार्थवाद की बौद्धिक दाशनिकता के विरोधी थे। उनके रहस्यवाद या 
शक्तिसिद्धान्त में दोनों की मूल दु'खात्मकता का भी निषेध है !' 

आदशवाद और यथाथवाद के मिश्रण का यह प्रयोग उपयुक्त 
रीति से समझ जाने पर छामग्रद्‌ और कल्याणकारी होगा, यह 
संसार के सभी प्रतिष्ठित आलोचकों का मत है। यह विषय घास- 
छेटी तके में सरल है, पर समझने में उतना ही जटिल है । हमारे 
महान्‌ कछाकार प्रेमचन्द जी भी कभी-कभी भमटकने छूगते हैं-- 
'सत्य क्या है. और असत्य क्या है; इसका निर्णय हम आज तक 
नहीं कर सके । एक के लिए जो सत्य है, यह दूसरे के लिए 
असल ।* 

यथाथवाद की भूमि पर फ्रांस ने एक तीसरेबाद का आवि- 
प्कार किया, जो प्रकृतिबाद नाम से विख्यात हुआ। एमिल जोला 
इसके आविष्कारक थे । ज्ोछा का यह प्रयोग वर्तमान योरोपीय 
और अमेरिकन उपन्यासकारों में कितने अंझशों में प्रविष्ट हो गया 


ण्छ 


असाद और उनका साहित्य 


है, यह हमारे अध्ययन की सामग्री है। अभी हमें स्मरण रखना 
चाहिए कि यहाँ केवल प्रसाद के उपन्यासों का विवरण देना है । 
लेकिन इसके पहले हम ज्ञोछा का मत और उसके आविष्कार की 
प्रणाली देखने के छिए अवश्य उत्सुक होंगे । 

जोला का मत था--मैं मनुष्य की प्रकृति का अध्ययन करना चाहता 
हूँ, न कि चरित्रों का / 

जोछा फ्रेच - साहित्य में नवीनता की ऑधी का अग्नदूत बन- 
कर आया था। छेकिन उस युग के फ्रेंच-उपन्यास लेखक छिमेत्रे 
ने ज़ोला के लिए लिखा है--- 

'कठोर पशुबुद्धि, तुच्छ लिप्सा, मनुष्य प्रकृति के निकृष्ट और धृणित 
अंगों के सांसारिक अस का निराश कवि । 

अब जोलछा के सिद्धान्त पर दृष्टिपात कीजिए । 

वह लिखता हे--जब अमाणित है कि भानवशरीर एक यंत्र है, 
जिसके चक्र प्रायोगिक के इच्छानुसार प्रगतिमान किये जा सकते हैं, तो हमें 
मनुष्य के आवेग और बुद्धिपूर्ण कियाओ की ओर अग्नसर होना चाहिए । 
हमारे पास प्रायोगिक रसायन-शात्र और पदार्थ-विज्ञान हैं। पहले प्रायोगिक 
शरीर-विज्ञान रक्‍्खेंगे और उसके बाद ही प्रायोगिक उपन्यास | यह उन्नति 
वह अंतिम अवस्था है, जो स्वयं अमावशालिनी है और जिसका जानना आज 
भी सरल है। सव का एक ही मत है। यह आवश्यक था कि निर्जीब पदार्थों 
के निश्चयवाद से अग्नसर हो कर जीव-पदार्थ के निश्चयवाद तक पहुँचा जाय; 
वयोंकि वलार्ड बर्नेढ्-जैसे वैज्ञानिक भी यह अ्रमाणित करते हैं. कि मानव- 


प्रसाद के उपन्यास 


शरीर भी नियमित सिद्धान्तो द्वारा शासित है। धोखे से निर्मय हो कर हम 
उस समय की घोषणा कर सकते हैं, जबकि अपने अवसर पर चुद्धि और 
विचार के नियम भी बनाये जायूँगे। भनुष्य के मस्तिष्क का और आम सड़क 
के पत्थर का विधान, एक सिद्धान्त के अनुसार करना चाहिये।' 

विदेशी उपन्यास -साहित्य के ऊपर यथार्थवाद का बहुत 
अभाव पड़ा है और प्रायः उपन्यासकार इसका समर्थन करते चले 
आये हैं। यथार्थवाद के साथ ही साथ पाश्चात्य उपन्यास-साहित्य 
में प्रकृतिबाद का भी उतना ही बोल बाछा रहा है और प्राय: दे 
एक दूसरे के आश्रित रहे हैं । यहाँ पर प्रक्ृतिबाद के मूल तत्त्वों 
पर विवेचना करना आवश्यक है | 

उपन्यास - साहित्य में कथानक का एक विशेष स्थान है और 
कथानक में चरित्र-चित्रण, घटनाओं का क्रम-विकास, परिस्थि- 
तियों का उछेख इत्यादि भी महत्त्वपूर्ण हैं। घटना-चक्र का विकास 
तथा इसका अंतिम परिणाम कभी-कभी पात्र के स्वाभाविक कार्यों 
पर निर्भर करता है और उपन्यासकार पात्र के जीवन का तथा 
उससे सम्बन्धित घटनाओं का यथार्थ उलेख करता है, जिससे 
घटनाओं का अन्त स्वाभाविक होता है। इस शैली का अनुसरण 
करने से छेखक को सत्यता से परे नही जाना पढ़ता । जो बास्त- 
विक घटनाक्रम होता है, उसी का विवेचन छेखक करता है। 

कभी-कभी इसके विपरीत दूसरी श्रेणी के जो उपन्यासकार 
हैं, वे घटनाओं का वास्तविक उल्लेख नहीं करते और परिणाम को 


पशु 


असाद और उनका साहित्य 


पहले ही से अपने मन में स्थिर कर लेते हैं, तब कल्पित घटनाओं 
ह्वारा उस अभीष्ट के अन्त तक पहुँचते हैं। अपने निश्चित परिणाम 
को लाने के लिए घटनाक्रम का विवरण, वास्तविक न देकर उल- 
टफेर कर देते हैं। ऐसे उपन्यास जीवन की सत्य तथा यथा्थे 
घटनाओं से बहुत दूर रहते हैं । परिणाम प्रमुख हो जाता है और 
जीवन की घटनाएँ उस पर आश्रित हो जाती हैं । पात्रों का चरित्र- 
चित्रण उन काल्पनिक घटनाओं पर अवरूम्बित हो जाता है। न 
कि घटनाएँ पात्र के सहज स्वभाव पर आश्रित रहती हैं | 

उस श्रेणी के उपन्यास-लेखक, जो यथार्थ वर्णन में विश्वास 
रखते हैं, भ्रकृति का सहारा छेते हुए घटनाओं तथा उनके 
क्रम विकास का यथार्थ वर्णन तथा उल्लेख करते हैं। ऐसे 
उपन्यासकार तथा उपन्यास ही अकृतियादी कहलाते हैं । प्रकृति- 
वाद का साधारण अर्थ यही होता है। 

अब इसको स्पष्ट करने के लिए पाश्चात्य प्रकृतिबादी उपन्या- 
सकारों का मत और उनके उपन्यासों पर दृष्टि डालना आवश्यक 
है। प्रकृतिवाद पर ज़ोछा के विचारों को प्रायः सभी साहित्यिकों 
ने स्वीकार किया है। 

जोछा ने स्पष्ट कहा है---हम उपत्यासकार सानवजीवन तथा उनकी 
सनोवृत्तियों की परीक्षा करने वाले न्यायाध्यक्ष हैं । 

मनुष्य का आचरण उसकी पैतृक शक्तियों तथा जीवन की 
और अन्य अवस्थाओं पर निर्भर करता है। उपन्यासकार को यह 


प्रसाद के उपन्यास 


ज्ञात रहता है कि किसी एक निश्चित और पैठक शक्तिवाला मनुष्य 
किसी एक अवस्था में निश्चित आचरण करेगा | इस लिए उपन्या- 
सकार ऐसे पात्रों को चुनता है; जिनकी शक्तियों को बह जानता 
है और उन्हें किसी एक ऐसी अवस्था में डालकर उनके चरित्र का 
विवेचन तथा वर्णन करता है, जिससे वह अपने अभीए्ट परिणाम 
त्क पहुँच सके । कितु ऐसे परिणाम स्वाभाविक होते हैं। इन 
. परिणामों तक पहुँचने के रिए उपन्यासकार को न तो घटनाक्रम 
का मनसाना उलटफेर करना पड़ता है और न जीवन की यथाये 
तथा सत्य बातों का गछा ही घोटना पढ़ता है। 

यह सिद्धान्त वैज्ञानिक दृष्टिकोण से उतना उपयुक्त नहीं है, 
जितना सौंदर्य-बिवेचना के विचार से । इसी लिए इस श्रेणी के 
उपन्यासकारों को पाश्चात्य देशों में विशेष महत्त्व दिया जाता है। 
वर्तमान योरोपीय उपन्यास-साहित्य पर उनका बहुत अधिक प्रभाव 
पड़ा है। कथानक में जो कृत्रिमता प्रायः पाई जाती है, उसके 
विरुद्ध उन्होने विद्रोह किया है। उनका विचार है कि किसी एक- 
अभीष्ट परिणाम पर पहुँचने के लिए पात्र को अखाभाविक तथा- 
असत्य घटनाक्रम में डालना जीवन की सत्यता नष्ट करना है 
और एक स्वतंत्रता से विकसित होने वाली वस्तु को, उसका यथार्थ 
वर्णन न कर के, निर्जीव चना देना है। इस प्रकार पात्र घटनाओं 
के आश्रित हो जाता है। और घटनाएँ पात्र पर निर्भर नहीं करतीं। 

यह मानना पड़ेगा कि प्रकृतिवाद को एक प्रकार से ज़ोला ने- 


ण्षु 


प्रसाद और उनका साहित्य 


ही सर्वप्रथम सिद्धान्त का रूप दिया है। किन्तु इसके पूर्व भी 
कुछ उपन्यासकारों को इसके तत्त्व का पता छग चुका था। 
इँगलैंड का प्रसिद्ध उपन्यासकार ट्रोलोप्पे इसका सब से पूर्व श्रामा- 
णिक उदाहरण है। वह चरित्र-प्रधान उपन्यासकार था। उसके 
<वारसेट शायर” की कहानियों में प्रकृतिवाद की बहुत कुछ झछक 
दिखलाई पड़ती है। उसके प्रायः सभी उपन्यासों में कथानक का 
विकास पात्रों के सहज स्वाभाविक कार्यों द्वारा ही होता है। - 
बासतव में उसके उपन्यासों में पात्र स्वयं अपनी कहानी बनाते हैं । 

इसके अन्य और भी अनेक उदाहरण पाये जाते हैं। प्रसिद्ध 
, रशियन उपन्यासकार तुर्गनेव के 'क्रादस एण्ड चिल्ड्रेन! शीर्षक 
उपन्यास में भी पात्र स्वयं ही कहानी का रूप देते हैं। इससे 
इतना तो स्पष्ट ही है कि बड़े-बड़े उपन्यासकारों ने इस बात का 
अनुभव किया है कि कछा में क्नत्रिमता का आ जाना किसी भी 
कला को दूषित कर देता है। 

विख्यात अमेरिकन प्रकृतिवादी उपन्यासकार टामसन डेजर 
का कहना है--'सल्य, सुंदरता, प्रेम और आशा, कौन-सी वर है, 
यह मैं नहीं जानता और न इस पर मैं विश्वास ही रखता हूँ । 
लेकिन फिर भी इनको मैं सन्देह की दृष्टि से नहीं देख सकता । 

डेज़र जीवन के इन तत्त्वों को न समझते हुए भी इनका 
अनुसरण करता है और कछा को ऋृत्रिमता और असतद्यता से 
यूपित नहीं होने देता। इस प्रकार उपन्यासकार के उपन्यासों 


६० 


प्रसाद के उपन्यास 


में भी प्रकृतिवाद का पूर्ण विकास हुआ है और साथ ही साथ 
उसके उपन्यासों में इस सिद्धान्त के गुण और अवगुण दोनों 
ही पाये जाते हैं। जो कुछ भी अबगुण डेज़र के उपन्यासों 
मेँ पाये जाते हैं, वे प्रकृतिवाद सिद्धान्त के दोष नहीं कहे 
जो सकते। वरन्‌ वे लेखक की वर्णन शैली के दोष हैं। 

जीवन की घटनाओं का उसने आवश्यकता से अधिक वर्णन किया' 
है और कहीं-कहीं तो एक ही बात की कई बार आवृत्ति भी कर 
दी है। फिर भी यह मानना ही पड़ेगा कि गाल्सवर्दी के सबे- 
प्रसिद्धे उपन्यास “कंट्री हाउस”! के कथानक की सफलता तथा 
रोचकत्ता का मुख्य श्रेय इसी सिद्धान्त को है। 

फ्रांस के प्रतिष्ठित उपन्यास-छखक शेमाँ रोलाँ के “जीन 
क्रस्टफो! में भी हम प्रकृतिवादी अँश देखते हैं । यद्यपि रोमों रोलाँ 
आदशेवाद तथा यथाथंवाद का पूर्ण पक्षपाती है। 
यशस्ी उपन्यासकार नेक्ज़ो के 'पेली दी कांकररः की प्रसिद्धि 

भी प्रकृतिवाद के ही कारण हे। नेक्ज़ो की सफलता तथा उसकी 

शक्ति इसी बात पर निर्भर करती है. कि वह सनुष्य-जीवन की 
सामान्य, अधम, सछिन तथा असभ्य घटनाओ का भी बणन पूर्ण 
निष्कपटता और स्वाभाविक रूप से करता है। नेक्ज़ो जीवन की 

छोटी से छोटी तथा बड़ी से बड़ी सभी घटनाओं को महत्त्वपूर्ण 
समझता है; क्योंकि उसका यह विश्वास है कि जीवन के अधम से 

अधम अनुभव भी आत्मा की उन्नति सें सहायता प्रदान करते हैं। 


६१ 


ग्रसाद और उनका साहित्य 


प्रकृतिवादी सिद्धान्त में एक बात और विचारणीय है। प्रहृ- 
'तिवादी छेखकों के सम्बन्ध में, जेसा ऊपर हम लिख चुके हैं कि 
लेखक को पात्र के जीवन की घटनाओं के सहज, स्वाभाविक 
अनुभवों पर तथा नियति पर निर्भर रहना पढ़ता है | 
प्रकृतिवादी उपन्यास-लेखक साथ ही साथ जीवन के अनुभवों 
का तथा भाग्यचक्र का बहुत ही सुन्दर चित्रण करते हैं। इसका 
सब से सुन्दर उदाहरण माशेरू प्राउस्ट के उपन्यासों में बहुत 
अधिकता से मिलता है। उसके उपन्यासों में नियतिबाद की 
, झलक ग्रायः प्रसाद जी की तरह सभी स्थानों पर प्रकट होती है । 
योरोपीय उपन्यासकारों ने नियति के चक्रों का दिग्दशन कई 
प्रकार से कराया है और मनुष्य के अंतहृह्त तथा उसकी आत्मा की 
प्रगति का भी पूर्ण विवेचन किया है। योरोपीय साहित्य में इसका भी 
बहुत महत्त्व है। यदि हम इसी सिद्धान्त को हिन्दी उपन्यास साहित्य 
में खोजें तो एक नवीन आकृति में प्रसाद के उपन्यासों में पावेंगे। 
कंकाल में लेखक ने उन्नीस पात्र पात्रियों को लेकर एक ऐसे 
संसार की सृष्टि की है जो देखने में अत्यन्त पथ भ्रष्ट है, उनका 
समाज में कोई स्थान नहीं है, समाज अपने धार्मिक और 
सामाजिक आदश में कितना पाखण्ड बटोर कर अपने आस्तित्व 
को ख्ायी बनाये हुए है, जिसमें पतन और पथ भ्रष्ट की परिभाषा 
इतनी जटिल है कि परिस्थितियों और कुचक्र द्वारा पद दृलित 
आणियों के लिये कोई स्थान नही | 


प्र्छ 


प्रसाद के उपन्यास 


उपन्यास में दस सखी चरित्र और नौ पुरुष चरित्र का निर्माण 
हुआ है शेष कुछ पात्र इन चरित्रों को स्पष्ट और प्रकाश डालने के 
लिये घटना क्रम के अनुसार कहीं-कहीं प्रकट होते हैँ, किन्तु 
उनका कोई स्थान नहीं । 

कथा भाग--श्रीचन्द्र अमृतसर के व्यवसायी है, धन के लोभ में उन्हें 
कुछ नही दिखाई पढ़ता, सनन्‍्तान क्री लालसा, साधु सन्यासियों की भक्ति पूजा 
में उनकी पत्नी किशोरी कुचरित्र हो जाती है, मठाघीश देवनिरंजन उसका 
शिकार होता है, वाल्यकाल में वे दोनों साथ खेले थे, घटनाचक्र से फिर 
उनका समायम होता है, उसकी कल्पना में किशोरी सम्मुख भाती है और 
वह अत्यन्त अधीर होकर उसकी आराधना करने रूगता है । जगत तो मिध्या 
है ही, इसके जितने कर्म हैं, वे भी माया है, अ्म्राता जीव भी प्राइत है, 
क्योंकि वह भी अपरा श्रकृृति है, जब विश्व मात्र प्राहत है, तो इसमें अलो- 
किक अध्यात्म कहों । थही खेल यदि जगत बनाने वाले का है तो वह मुझे 
भी खेलना चाहिये । 

श्रीचन्द्र किशोरी का हरद्वार में ही रहने का अवन्ध कर स्वय॑ अमृतसर 
में रहने लगा। इधर निरंजन और किशोरी का प्रणण चल रहा था। छुछ 
दिनों बाद श्रीचच्न आए। मान सनाव हुआ । किशोरी उनके साथ चली गई। 
किशोरी के असम में रहने वाली विधवा रामा वहीं रह गई। निरंजन के 
सनोरंजन के लिए वही एक साधन बन कर प्रस्तुत हुई । 

पन्द्रह बरस बाद, काशी में ग्रहण था। विधवा रामा अब निरंजन के 
मंठारी के साथ सघवा होकर अपनी कन्या तारा को लेकर आई थी। भीड़ 


६३ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


के धक्के में पढ़कर अपनी माता और साथियों से अछूग हो जाती है। अन्त 
में एक कुटनी के चक्र में पडकर उसे वेश्या बनना पड़ता है। 

स्वयंसेवक मंगलदेव का उसका सामना हुआ था, किन्तु संकोच ओर 
और छज्जा के कारण एक युवती की वह न बचा सका । फिर वेश्या होने पर 
एक दिन लखनऊ में उससे भेंट होती है। मंगल उसके आकर्षण में पढ़ 
जाता है गुलेनार वेश्या इत्ति के उपयुक्त नहीं, वह सुरक्षित रहती है। मंगल 
के साथ एक दिन वह भाग जाती है दोनों हरद्वार में रहते हैं। मंगल आय॑- 
समाज के वातावरण में जीवनोपाजन करता है। दोनों सुख से रहते हैं । 
दोनों का विवाह होने वाला ही था कि एक दिन चाची; ननन्‍दों के मुँह से 
यह सुनकर कि तारा को माँ भी दुरुचरित्र थी, मंगल को घुणा होती है। 
विवाह की पूरी तैयारी हो जाने पर उसी दिन मंलय चुपचाप भाग जाता है | 

उधर अनाथ तारा गर्भवती हो कर भटकती है। उसे कोई सहारा नहीं। 
चाची के यहां कई महीने कठते हैं । फिर आत्महत्या करने के लिए तारा अस्तुत 
होती है । किन्तु एक संन्‍्यासी उसे कहता है-कि आत्महत्या करना पाप है । 

तारा कहती है-पाप कहां पुण्य किसका नाम भें नहीं जानती । सुख 
खोजती रही, दुख मिला, दुख ही यदि पाप है तो मैं उससे छुट कर सुख की 
मौत मर रही हैं, मरने दो । 

अन्त में असफल हो कर तारा कष्ट के दिन व्यतीत करती है । अस्पताल 
में उसे पुन्न उत्पन्न होता है । 

दूसरी बार फिर गंगा में हूवने पर भी उसके प्राण न गए । एक भहात्मा 
के द्वारा बह बचाई गई। 


५२24 


कंकाल 

हरद्वार से जाने के छ' मास बाद किशोरी को एक पुत्र उत्तन्न हुआ, तभी 
से श्रीचन्द्र की घृणा बढती गई | बहुत सोचने पर श्रीचन्द्र ने यह निश्चय किया 
कि किशोरी काशी जा कर अपनी जारज सन्तान के साथ रहे और उसके खर्च 
के लिए वह कुछ भेजा करे। पुत्र पा कर किशोरी पति से वंचित हुई । 

किशोरी का दिन अच्छी तरह बीतने छूगा । देवनिरंजन भी कभी-कभी 
काशी आ जाते । किशोरी के यहां ही भंडारा होता 

किशोरी का पुत्र विजयचन्द्र स्कूल में पढ़ता था। एक दिन घोडे पर से 
गिरते, गिरते उसे मंगलदेव ने बचाया । तभी से उन दोनों की मैत्री हो गई। 
आर्थिक कठिनाई के कारण मंगल उपवास कर रहा था। अन्त मे विजय 
के अनुरोध करने पर वह विजय के साथ उसके घर रहने लगा । 

उस दिन भंडारा था। अछूत भूखे पत्तल पर दृट रहे थे। एक राह की 
थकी हुई भूखी दुवेल युवती भी वहां पहुंची । उसी भूख की जिससे वह स्वय॑ 
अशक्त हो रही थी, यह बीभमत्स छीला थी। वह सोच' रही थी--क्या संततार 
भर में पेट की ज्वाला, मनुष्य और पश्चुओं को एक ही समान सताती है। ये 
भी मजुष्य हैं ओर इसी धार्मिक भारत के मनुष्य हैं, जो कुत्तों के मुंह के टुकड़े 
भी छीन कर खाना चाहते हैं। भीतर जो पुण्य के नाम पर-धर्म के नाम पर 
गुलछरे उड़ा रहे हैं, उसमें वास्तविक भूखों का कितना भाग है, यह पत्तलों के 
छटने का दृश्य बतला रहा है। भगवान तुम अन्तर्यामी हो। 

वह अनाथनी दुखनी किशोरी के आश्रय में रहने छगी। उस का नाम 
यमुना है। अभात के समय वह मालतीकुल्न को पत्थर की चौको पर बैठी है। 
नौड सें से निकलते हुए पक्षियों के कलरब को वह आइच्ये से सुन रही थी। 


५ ६५ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


वह सम्रझ न सकती थी कि उन्हें क्यों उल्लास है ! संसार में प्दृत होने की 
इतनी प्रसक्षता क्यों ! दो-दो दाने बीन कर ले आने और जीवन को हम्बा 
करने के हिए इतनी उत्कन्‍्शा ! इतना उत्साह ! जीवन इसने सुख की 
बसु है 

उस दिन विजय, मंगल, किशोरी और दासी यमुना सभी वजरे पर बैठ 
कर गंगा की धारा में वह रहे थे। पार, रेती पर वजरा छगा। स्नान करके 
ज्योहीं जमुना उठी, मंगल ने साहस से पूछा--तारा तुम्ही हो 

उसने कहा--तारा मर गई, में उसकी प्रेतात्मा हूं । 

मंगल ने हाथ जोड़ कर कहा--तारा मुझे क्षमा करो । 

तारा कहती है--हम लोगों का इसी में कत्याण है कि एक दूसरे को ते 
पहचानें और न एक दूसरे राह में अं, क्योंकि दोनों को किसी दूसरे का 
अपलम्प है। 

विजय उन दोनों को वातें करते देखता है। उसकी आओखें क्षण भर में 
लाल हो जती हैं। इस घटना का प्रभाव इतना पढता है कि विजय तीन दिन 
तक ज्वर में पढ रहता है। 

भंगलदेव न जाने कैसी कत्पना से उन्मत्त हो उठता। हिंसक मनोश्ि 
जाग जाती है। उसे दमन करने में वह असमर्थ था । दूसरे दिन विना किसी 
से कहे सुने मंगठ चला गया । 

तीर यात्रा के हिए किशोरी, विजय यमुना के साथ मधुरा चली जाती है। 

एक दिन पाप पुण्य पर अपना मत प्रकट करते हुए विजय कहता है-“ 
पाप और ढुछ नहीं है यमुना, जिन्हें हम छिपा कर किया चाहते हैं, उत्ही 


द्शि 


कंकाल 
कर्मों को पाप कह सकते हैं, परन्तु समाज का एक बड़ा भाग उसे थदि व्यव- 
हाय्ये बना दे तो वही कर्म हो जाता है, धर्म हो जाता है। देखती नहीं हो, 
इतने विरुद्ध मत रखने वाले संसार के मनुष्य अपने-अपने विचारों में धार्मिक 
बने हैं, जो एक के यहां पाप है। वही तो दूसरे के लिए पुष्य है। 
विजय के मन में हन्द्‌ चल रहा था। उन्हीं दिनों एक अल्हड़ बाल 
विधवा तरुण बालिका घन्टी उन छोगों से परिचित होती है। घन्टी परिहास 
करने में बड़ी निदंय थी । 
मंगलदेव भी आठ बालकों को लेकर ऋषिकुछ बनाये था। वह सहायता 
के लिए किशोरी के यहां आता है। किशोरी और निरंजन ने उसे घर बनवा 
देने और वल्न इत्यादि कि सहायता का वचन दिया । 
सब का मन इस घटना से हलका था, पर यमुना अपने भारी हृदय से 
वार-बार यही पूछती थी, कि इन लोगों ने मंगल को जलपान करने तक को 
न पूछा, इसका कारण क्या उसका प्राथों हो कर आना है। 
... विजय अपने हृदय का रहस्य यमुना के सम्मुख एक दिन खोलता है। 
यह कहता है--तुम मेरी आराध्यदेवी दो-सववेस्व हो । 
किन्तु यमुना कहती है--मैं दया की पात्री एक बहन होना चाहती हूं । 
विजय का योवन उच्छुंखछ भाव से बढ़ रहा था। घन्टी आकर उसमें 
सजीवता ले आने का प्रयत्न करती; परन्तु वैसे ही जैसे एक खंडहर की किसी 
भम्म प्राचीर पर बैठा हुआ पपीहा कभी बोल दे । 
घन्टी को साथ ले कर विजय घूमता है। दोनों में घनिष्ठता बढ़े जाती 
है। भेद खुलने पर घन्टी कहती है--मैं क्या जानूं कि छज़ा किसे कहते हैं । 


द्द्ड 


असाद और उनका साहित्य 


किशोरी मधुरा से काशी चली जाती है । यमुना, गोस्वामी कृष्णशरण के 
साभ्रम में रहने लगती है । 

घटनावश एक दिन तांगे पर घन्टी और विजय घूमने निकलते हैं। 
उस दिन तामे वाले के षढयंत्र से आक्रमण होता है। घन्दी को चोट 
झुगती है। चर्च के पास ही इस दुर्घटना के कारण पादरी जान और बाथम 
का सहारा मिलता है । विजय और घन्टी वही कुछ दिन रहते हैं। सरला 
और लतिका दो हिन्दू महिलाएं ईसाई हो गई थीं । वहीं एक दिन अंबे 
भिखारी द्वारा यह ज्ञात होता है कि घन्टी की माता का नाम नन्‍्दो है । 

सरला और विजय से बातें होते हुए यह रहस्य भी खुलता है कि मंगल 
के गले में जो यंत्र था और जिसे विजय को मंगल ने एक बार बेचने के लिये 
दिया था, वह यंत्र मंगल के वंश का रक्षा ककच था। उसी के आधार पर 
मंगल सरला का पुत्र प्रमाणित होता है। 

वृन्दावन के समीप एक छोटा सा श्रीकृष्ण का मन्दिर है। गोस्वामी 
क्ृष्णशरण उस सन्दिर के अध्यक्ष, एक साठ पेंसठ वरस के तपस्वी पुरुष 
हैं। किशोरी से अलग हो कर यमुना अब वहीं रहती है। मंगलदेव भी. 
अब गोस्वामी जी को गुरु के रूप में मानता है। आश्रम में कृष्ण कथा 
प्रायः होती है । घन्टी और विजय भी कभी उस कथा में सम्मलित होते । 
एक दिन गेस्वामी जी से विजय घन्टी से व्याह करने के सम्बन्ध में अनुमति 
चाहता है। 

गोस्वामी जी कहते हैं--यदि दोनों में परस्पर प्रेम है तो भगवान को 
साक्षी देकर तुम परिणय के पवित्र बन्धन में वंध सकते हो । 


हट 


कंकाऊ 
किन्तु सहसा यमुना ने कहा--विजय बाबू, यह ब्याह आप केवल अहंकार 
से करने जा रहे हैं। आपका प्रेम घन्टी पर नहीं है । 
सब आइवर्य में थे। बूढा पादरी जान, सरला, रृतिका, विजय और 
घन्टी सब लोग बहा से तागे पर चले आये। 
किशोरी और निरंजन काशी लोट आये थे, परन्तु उन दोनों के हृदय में 
शान्ति न थी। क्रोघ से किशोरी ने विजय का तिरस्कार किया | फिर भी सहज 
मातृ स्नेह विद्रोह करने लगा । निरंजन से झगडदा बढने लगा । दोनों में 
अनवन रहने लगी । निरंजन ऊब कर जाने का निश्चय कर लेता है। किशोरी 
कहती है--तो रोकता कोन है, जाओ परन्तु जिसके लिए मैंने सब कुछ खो 
दिया है, उसे तुम्हों ने मुझसे छीन लिया-उसे ढेकर जाओ ! जाओ तपस्या करो, 
तुम फिर महात्मा वन जाओगे | सुना है, पुरुषों के तप करने से घोर कुकर्मों 
को भी भगवान क्षमा करके उन्हें दर्शन ढेते हैं। पर मैं हूं ल्लनी जाति, 
मेरा वह भाग्य नहीं, मैंने जो पाप बटोरा है, उसे ही मेरे गोद में फेंकती जाओ। 
निरंजन बिना एक शब्द कहे स्टेशन चला गया। 
उसी दिन श्रीचन्द्र अपनी प्रेयसी चन्दा और उसकी लडकी लाली को ले 
कर काशी आते हैं , दोनों मे समझौते का मार्ग खुलता है। ; 
विजय के भ्रति घन्टी के मन में भी तक चलता है। वह कहती है --हिन्दू 
| ल्लियों का समाज ही कैसा है, उसमें कुछ अधिकार हो तब तो उसके लिये कुछ 
सोचना विचारना चाहिए। और जहाँ अन्ध अनुसरण करने का आदेश है वहाँ 
प्राकृतिक, ज्ली-जनोंचित, प्यार कर लेने का जो हमारा नैसर्गिक अधिकार है- 
जैसा कि घटनावश, श्राय ल्लियोँ किया करती हैं--उसे क्यों छोड़ दूँ? यह कैसे 


६९ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


हो, क्यों हो इसका विचार पुरुष करते हैं । वे करें, उन्हें विश्वास बनाना है, 
कोड़ी पाई लेना रहता है और द्वियों को सरना पढ़ता है। 

विजय सोचता है कवि यह हँस मुख घन्टी संसार के सब परइनों को सहल 
किये बेटी है । 

घन्टी कहने छगती है--तुम ब्याह करके यदि उसका प्रतिदान किया चाहते 
हो तो भी मुझे कोई चिन्ता नहीं। यह विचार तो मुझे कभी सताता ही नहीं । 
मुझे जो करना है वही करती हूं, करेंगी सी। घूमोगे घूमूगी, पिलाओगे पिऊँगी, - 
बुलार करोगे हँस छगीं, ठकराओगे रो दृ्गी । स्ली को इन सभी वस्तुओं की 
आवश्यकता है। मैं इन सबों की समसाव से अहण करती हूँ और करूँगी। 

नोका विहार से जैसे ही विजय और घन्टी उतरे थे, बैंसे ही एक भीषण 
दुघंटना हो गई। घन्टी को भगा छे जाने के लिये जो षडयंत्र चल रहा था, वे 
ही लोग सम्मुख आ जाते हैं । इन्द्र होता है। विजय एक पुरुष का गला दवा 
कर उसका आप ले लेता है । खून हो गया है तुम यहाँ से हट चछो'--कहते 
हुम वाथस घन्टी की लेकर चला जाता है। उसी समय स्नान के लिये निकली 
हुई थभुना वहाँ उपस्थित होती है। निरंजन पहले ही से उसके पीछे-पीछे सब 
देख सुन रहा था। 

विजय भयभीत हुआ। मृत्यु जब तक कल्पना की वस्तु रहती है तब, तक 
चाहे उसका जितना प्रत्यास्यान कर लिया जाय, परन्तु यदि वह सामने हो ? 

निरंजन और यमुना के समझाने पर विजय नाव पर बैठ कर निकल 
जाता है । 

लूतिका और बाथम का सम्बन्ध विच्छेद होता है। सरला उसे समझाती 


छठ 


कंकाल 

है--दुःख के लिए, सुख के लिए, जीवन के लिये और मर॒ण के लिये इसमें 
शिथिलता न आनी चाहिए । आपत्तियाँ वायु कौ तरह निकल जाती हैं; सुख के 
दिन अकाश के सह परिचमी समुद्र में भागते रहते हैं। समय काटना होगा, 
और यह ध्रुव सत्य है कि दोनों का अन्त है । 

लतिका और सरला चचे का आश्रय छोड कर गोस्वामी कृष्णशरण के 
आश्रम में जाती हैं । 

चन्दी उधेड्-बुन में लगी थी। वह मन ही सन कहती है--में भीख माग 
कर खाती थी, तव मेरा कोई अपना नहीं था । लोग दिल्लगी करते ओर में 
हँसती, हँसा कर हँसती । मुझे विश्वास हो गया कि इस विचित्र भूतल 
पर हम लोग केवल हँसी की लहरों में हिलने डोलने के लिये आये हैं ।... 
पर उस हँसी ने रंग पलट दिया, वही हँसी अपना कुछ और उद्देश्य रखने 
लगी । फिर विजय, धीरे-धीरे जैसे सावन की हरयाली पर प्रभात का वादल बन 
कर छा गया । मैं नाचने लगी मयूरी-सी | और अब यौवन का सेघ वरसने 
- छेगा ।...नियति चारों ओर से दवा रही थी । छो-मैं चली, घाथम""“उस 
पर भी लतिका रोती होगी। जरे-अरे मैं हँसाने वाली सबको रुलाने लगी ! मे 
उसी दिन धर्म से च्युत हो गई...... 

फृतहपुर सीकरी से अछनेरा जाने वाली सड़क के सूने अंचल में एक 
छोटा सा जंग है। बहां डाकू बदन गूजर के यहां विजय अपना दिन काटता 
है। गाल बदन की लड़को है। गाला एक सुस्लमानो ज्री से उत्पन्न हुई थी। 
गाला और विजय की घनिष्ठता अधिक बढ़ने छूगी। यह देख कर बदन गूजर 
ने एक दिन नये ( विजय का नया नास ) से कहा--नये ! मैं तुमको उपयुक्त 


७१ 


पभसाद भौर उनका साहित्य 


समझता हूं गाला के जीवन की धारा सरल पथ से बहा ले चलने की क्षमता 
तुम में है। 

किन्तु गाला भेद भरी दृष्टी से इसे अस्वीकार करती है, यह कह कर कि 
मैं अपने यहा पले हुए मनुष्य से कभी ज्याह न कछगीं। 

मंगलदेव अपने मानसिक हलचल के कारण वृन्दावन से आकर उसी जंगल 
के एक आम में गूजर बालकों की एक पाठशाला खोलता है । गाला के यहा 
भी कभी-कभी सहायता के लिए आता है। 

मंगल एक दिन शुज््य पथ पर निरद्दे्य चछा जा रहा था। चिन्ता जब 
अधिक हो जाती है, तब उसकी शाखा-अशाखाएं इतनी निकलती हैं कि मस्तिष्क 
उनके साथ दौढ़ने में थक जाता है । किसी विशेष चिन्ता की वास्तविक गुरुता 
छप्त हो कर विचार करने को यांत्रिक और चेतना-वेदना विहीन बना देती है । 
तब, पैरों से चलने में, मस्तिष्क से विचार करने में, कोई विशेष मिन्नता नही 
रह जाती | मंगलदेव की वही अवस्था थी । मार्ग में गाछा ओर उसके पिता 
से उसकी भेंट होती है। दोनों को वह पाठशाला द्खिलाता है । बालिकाओं 
के लिए वह एक विभाग खोलने के लिए योजना रखता है । गाला पढ़ी लिखी 
है। अतएव वह योग्यता से वह काये कर सकती है । मंगल की योजना में 
इस का संकेत है । 

विजय के जिस खून के मुकदमे में यमुना स्वयं विजय को बचाने के लिये 
फंसती है, न्यायालय में वह विचित्र मुकदमा चल रहा था । निरंजन ने धन 
से काफी सहायता की । 

मंगलदेव की पाठ्शाला में अब दो विभाग हैं-एक लड़कों का दूसरा लड़- 


ज्र्‌ 


कंकाक 

कियों का । गाला लड़कियों की शिक्षा का प्रवन्ध करती । वह अब एक प्रभा- 
वशालिनी गम्भीर युवती दिखलाई पढ्तीजिसके चारों ओर पवित्रता और 
ब्रह्मचर्य का मण्डल घिरा रहता । बहुत से लोग जो पाठ्शाल्षा में आते, वे इस 
जोडी को आश्चर्य से देखते । 

मंगल वृन्दावन से कई दिनों चाद छोटा । उसने यमुना के उस मुकदमे 
का विवरण बतदाया | 

गाला कहती है--श्नी जिससे प्रेम करती है, उसी पर सरवस वार देने को 
प्रस्तुत हो जाती है, यदि वह भी उसका प्रेमी हो तो | ज्ली वय के हिसाब से 
सदेव शिक्षु, कर्म में वयस्क ओर अपनी असहायता में निरीह है । विधाता 
का ऐसा ही विधान है। 

मंगल कहता है--उसका कारण प्रेम नही है, जैसा तुम समझ रही हो। 

गाला ने एक दौध निरवास लिया। उसने कहा--नारी जाति का निर्माण 
विधाता की एक झुंझलाहट है। मंगल ! उससे संसार भर के पुण्य कुछ 
लेना चाहता है, एक माता ही कुछ सहाजुभूति रखती है, इसका कारण है उसका 
भी ज्ली होना । 

घटनाक्रम के अनुसार गोस्वामी कृष्णशरण,के आश्रम में मंगल, गाला, 
यमुना, लतिका, नन्‍्दो, घन्‍्टी, निरंजन सभी उपस्थित होते हैं । भारत-संघ 
का स्थापन होता है| सेवा धर्म जिसका प्रधान उद्देश्य है। 

यमुना अन्त में उस मुकदमे में निर्दोष समझ कर छोड़ दी जाती है । 
सरला को उस का पुत्र संगलदेव मिल जाता है। एक दिन स्नान करने के 
लिये जाते हुए छतिका और यमुना में बातें होतीं हैं । 


७३ 


जा 


भसाद भोर उनका साहित्य 


जव मैं ल्लियों के ऊपर दया दिखाने का उत्साह पुरुषों में देखती हूं, तो 
जैसे कट जाती हूं, ऐसा जान पड़ता है कि चह सब कोहाहऊ, ज्ली-जाति की 
लरूज़ा की मेघमाला है । उनकी असहाय परिस्थिति का व्यंग उपहास है ! 
यमुना ने कहा । 

लतिका कहती है--पुरुष नहो जानते कि स्नेहमयी रमणी सुविधा नहों 
चाहती, वह हृदय चाहती है। पर मन इतना भिन्न उपकरणों से बना हुआ है 
कि समझौते पर ही संसार के ञ्री पुरुषों का व्यवहार चलता हुआ दिखाई देता 
है......हम ल्लियों के भाग्य में लिखा है कि उड़ कर भागते हुए पत्नी के 
पीछे, चारा और पानी से भरा हुआ पिजंरा लिए घूमती रहें ! 

यमुना ने कहा--कोई समाज और धर्म ह्लियों-का नहीं बहन ! सच पुरुषों 
के हैं । सब हृदय को कुचलने वाले क्र हैं, फिर भी मैं समझती हूं, कि 
ल्लियों का एक धर्म है, वह है आधात सहने की क्षमता रखना । 

भारत संघ की स्थापना हो गई । निरंजन ने अपने भाषण में कहा--- 
भनवान्‌ की विभूतियों को समाज ने वांट लिया है, परन्तु जब मैं स्वा्थियों 
को भगवान्‌ पर भी अधिकार जमाये देखता हूँ तो सुझे हँसी आती है-ओर 
भी हँसो आती है--जब उस अधिकार की घोषणा कर के दूसरों को वे छोठा, 
नीच और पतित 5हराते हैं... 

मंगल देव कहता है--सुधार सौन्दर्य का साधन है। सभ्यता सौन्दर्य की 
ज़िज्ञासा है। शारीरिक और अलंकारिक सौन्दर्य प्राथमिक है, चरम सौन्दर्य 
मानसिक सुधार का है। मानसिक सुधारों में सामूहिक भाव कार्य करते हैं... 
समाज को सुरक्षित रखने के लिये उसके संघटन में स्वाभाविक मनोद्ृत्तियों की 


५७ 


कंकाल 

सत्ता स्वीकार करनी होगी। सब के लिये एक पथ देना होगा । समस्त प्रक्ष- 
तिक आकाँक्षाओ की पूर्ति आप के आदर में होनी चाहिये । 

निरंजन के प्रयल्ल और हृप्णशरण के आदेशानुसार गाला का विवाह 
मंगल के साथ हो जाता है । यमुना अपने भाई भिखारी विजय को लेकर काशी 
चली जाती है। घंटी, सरला, लतिका, इत्यादि आश्रम में ही रहते हुए सेवा- 
मार्ग ग्रहण करती हैं । 

किशोरी, श्रीचन्द्र के साथ ही रहती है। किशोरी के मन मे फिर भी भाति 
नहीं। एक दिन उसे निरंजन का एकपन्न मिलता है, उसमें अपना हृदय खोल 
कर वह अपने अपराधों को स्वीकार करते हुए किशोरी को सान्त्वना देता है। 
चह लिखता है--मर्म व्यथा से व्याकुछ होकर गोस्वामी कृष्णशरण से जब मैंने 
अपना सब समाचार घझुनाया, तो उन्होंने बहुत देर तक चुप रह कर यहां 
कहा--निरंजन भगवान क्षमा करते हैं । मनुष्य भूलें करता है, इसका रहस्य 
है भनुष्य का परिमित ज्ञानाभास, सत्य इतना विराट है कि हम छुद्र जीव व्याव- 
हारिक रूप में उसे संपूर्ण महण करने में प्राय असमर्थ प्रमाणित होते हैं। 
जिन्हें हम परम्परागत संस्कारों के प्रकाश से कलंकमय देखते हैं। वे ही छ्षुद् 
ज्ञान मे, सत्य उहरें तो मुझे कुछ आश्चर्य न होगा .. ... 

किशोरी न्याय और दण्ड देने का ढक्ोसला तो मनुष्य गी कर सकता है, 
पर क्षमा में भगवान की शक्ति है। उसकी सत्ता है, महत्ता है। सम्भव है कि 
इसी लिए सब के क्षमा के लिए, वह महाप्रलय करता हो । 

किशोरी के मन में घोर अशान्ति है। अपने दत्तक पुश्न मोहन से उसे सन्तोष- 
न हुआ। विजय के भ्रति बह व्याकुल रहती है। वह रोग शैया पर पढ जाती है; 


पु 


असाद और उनका साहित्य 


यमुना काशी आकर किशोरी के यहाँ फिर दासी के रूप में प्रवेश करती 
है। रहस्य खुलता है। मोहन उसी का पुत्र है, यमुना उसकी दासी बन कर 
कुछ शान्ति पाती है। विजय कंगालों की श्रेणी सें सड़क पर पड़ा दिन कादता 
है। किशोरी की मरणावस्था बता कर यमुना विजय को श्रीचद्र के यहाँ ले 
जाती है। श्रीचन्द्र उसे भिखारी ही समझता है, विजय किशोरी को देख कर 
लौट आता है। किशोरी का अन्त होता है। 

कुछ दिनों के बाद उन कंगाल मनुष्यों के साथ जीवन व्यतीत करते हुए 
सहसा एक दिन विजय मरता है। घंटी, मंगल, गाछा, उस दिन सब संघ के जल्लूस 
में थे। घटना स्थान पर मंगल, गाला, घंटी, यमुना, और श्रीचन्द्र रहते हैं। 

। स्वयं सेवकों की सहायता से उस का सतक संस्कार करवाने का प्रवन्ध 
| हुआ । 

मनुष्य के हिसाब किताब में काम ही तो बाकी पड़े मिलते हैं--कह कर 
घंटी सोचने लगी । फिर उस शव की दीन-दशा मंग्रल को संकेत से दिखिलाया। 

मंगल ने देखा--एक ज्जी पास ही मलिन वसन में वैठी है । उसका घूँघट 
आसओं से भीग गया है, और निराश्रय पढ़ा है एक--कंकाल । 

ऊपर कंकाल उपन्यास का जो कथा भाग संक्षेप में दिया गया 
है। उसमें अधिकतर यही ध्यान रखा गया है कि प्रधान पात्न-पात्रियों 
की वास्तविक मनोवृत्तियों का प्रद्शेन किया जाय | जिसमें पाठकों 
को उन्त के हृदय की बातें सरलता से-समझने में सुविधा हो । 

कंकाल में धार्मिक सूत्र वॉधकर सामाजिक दृष्टिकोण रखा गया 
है। अतएव कथा का आरम्भ और अन्त, प्रयाग, हरद्वार, मथुरा, 


ड्द 


कंकारू 

वृन्दावन अयोध्या और काशी आदि प्रमुख तीथ स्थानों में ही होता है। 

कंकाल छेखक का प्रथम उपन्यास है। पात्रों में प्रतिद्वन्द्रिता चछा 
कर कथा को आकर्षक बनाने का प्रयत्न स्वाभाविक ही है. । संसार 
के अधिकांश उपन्यासों में पात्रों में प्रतिहन्द्रिता चछा कर कथा 
को रोचक और कौतूह॒ल पूर्ण बनाने की प्रणाली प्रचलित है | यदि 
विश्व साहिद्य के समस्त उपन्यासों की छान बीन की जाय तो यही 
निष्कर्ष निकलेगा कि दो स्लरी और एक पुरुष अथवा दो पुरुप और 
एक स्त्री को लेकर ही प्रतिद्वन्द्विता की भावना प्रबल करने का 
उद्देश्य लेखकों ने सम्मुख रखा है। भारतीय कथा साहित्य में 
बंकिम बाबू के 'विपवृक्ष' के बाद यही धारा बही है | 

कंकाल में भी पहल तारा को लेकर मंगछ और विजय में यही 
भावना जागृत होती है । विजय तारा से निराश हो कर घंटी के 
पाश में बंधता है। फिर गाछा को लेकर विजय और मंगल का वही 
सानसिक इन्ह चलता है। अतएव जब विजय जैसा युवक तीन- 
तीन नवयुवतियों के प्रेम में, विकलछ रहता है, तो कथानक अपने 
आप आकर्षण की भूमि पर वेग से बढ़ेगा, इसमें कोई संदेह नहीं । 

टेकनिक के ख्याल से लेखक ने इस उपन्यास में काफी स्वतं- 
त्रता से कास लिया है। जिस तरह नियमित रूप में परिच्छेदों का 
क्रम उपन्यास में रहता है, वैसा न करके अपनी सुविधानुसार ही 
लेखक ने उनका क्रम रखा है । 

उपन्यासों में प्रायः देखा जाता है कि एक हिरो (प्रधान नायक)' 


छ्छ ए 


असाद और उनका साहित्य 


और एक हिरोइन (प्रधान नायिका) को लेकर ही उपन्यास चलता 
है, किन्तु कंकाल में ऐसा नहीं है। 'वेनटी फेयर, की तरह यह पूर्ण 
'रूप से नहीं कहा जा सकता कि मंगछ और विजय में कौन प्रधान 
है ? दोनों का चरित्र जोरदार है, वैसे ही तारा और घंटी में भी 
समानता है, यह ठीक है कि तारा का चित्रण अधिक सार्मिक है, 
उससें गंभीरता और त्याग अधिक है, घंटी में वास्तविकृता और 
हँसोड़ उद्ण्डता का प्रदर्शन है । 
कंकाल सें भी नियति का प्रभाव उपस्थित हो जाता है, जैसे 
निरंजन का मठाधीश हो जाना, गाछा को डाके का धन मिलना, 
श्रीचन्द्र को चन्दा द्वारा आर्थिक सहायता मिलनी, मोहन का 
श्रीचन्द्र का दत्तक पुत्र होना इत्यादि । 
गोस्वामी ऋृष्णशरण का धार्मिक व्याख्यान, गाछा की माता 
की कहानी दोनों कुछ विशेष आकर्षक नहीं, ऐसा प्रतीत होता है 
कि उपन्यास सें इतना अंश किसी तरह रख दिया गया है, टेक: 
'निक के अनुसार भी यह उपयुक्त नहीं जंचता। मैंने कंकाल सुनने 
के बाद अपना यही भत प्रसाद जी के सम्मुख रखा था। किन्तु 
छेखक को जो उपयुक्त जंचे वही ठीक है, उसकी स्वतंत्रता में कौन 
बाधक हो सकता है ९ 
कंकाल में ऋष्णशरण को छोड़ कर सभी चरित्र यथार्थवादी 
सूमि पर उत्पन्न हुए हैं। समाज का नम्न रूप इतने वास्तविक 
इहष्टिकोण से रखा गया है कि उसे देख कर आदर्शवादी अवश्य 


जद 


0 कंकाल 
ही अपना मुंह, विक्ृत कर छेंगे। छेकिन मुझे तो सब से बड़ा 
आख़ये तब हुआ, जब कंकाल की आलोचना करते हुएग्रेमचन्द जी 
ने छिखा था--धंटी का चरित्र बहुत द्वी सुन्दर हुआ है। उसने 
एक दीपक की भॉति अपने प्रकाश से इस रचना को उज्ज्वल कर 
दिया है | अल्हड़पन के साथ जीवन पर ऐसी तात्विक दृष्टि, यद्यपि 
पढ़ने में कुछ अस्वाभाविक माछुम होती है; पर यथाथे में सत्य 
है। विरोधों का मे जीवन का गूढ्रहस्प है । 

कहना न होगा कि घंटी का चरित्र सब से अधिक यथा्थवादी 
इृष्टिकोण से किया गया है | 

वर्तमान यूरोपीय उपन्यासों में सत्यता के नाम पर वास्तविक 
चित्रण करने में कुछ यथार्थवादी लेखकों को हिचकने की आव- 
शयकता नहीं पड़ती। मैंने नावें के विख्यात लेखक नेट हेमसून का 


: दी शेड छीड्स ऑन” उपन्यास पढ़ा । उसमें नायक की माता 


चर 


के दुश्चरित्रताका वर्णन उसकी पत्नि उससे कर रही है और अपनी 
माता के कुचरित्रों को नायक भली भाति जानता है; फिर भी 
उसके व्यवहार और स्नेह में अन्तर नहीं दिखछाई पड़ता । छेकिन 
कंकाल सें छेखक ऐसा नहीं करता । किशोरी के क्ुचरित्र होने पर 
भी विजय को ज्ञात नहीं होता है। विदेशों में चाहे कछा के नाम 
पर नभ्नता की इस अन्तिम सीमा तक छेखक भल ही पहुँच जांय; 


' किन्तु हिन्दी यथार्थवादी लेखक ऐसा चित्रण करने में अपना 


अपसान समझेगा | 


७९ 


भ्साद भौर उनका साहित्य 


तितली प्रसाद का दूसरा उपन्यास है, इसमें पूवे और पश्चिम 
का मेल कराकर दोनों में अन्तर दिखलाया गया है, तितली में १० 
स्त्री और १४ पुरुष पात्रों का चित्रण हुआ है; प्रमुख चरित्रों में 
इन्द्रदेव, मधुबन, रासनाथ; शैला और तिवली हैं, मधुबन के चरित्र 
का आरम्भिक अंश विशेष स्पष्ट नहीं हुआ है, आगे चढुकर जिस 
सूत्र में उसे बाँधा गया है, वह अधिक उज्बछ हुआ है, रामनाथ 
का अध्ययन इतना पहुँच जाता है कि वह ग्रीस और रोस की आये 
संस्कृति का श्रभाव सलीभौति समझते हुए बोलता है, ऐसा प्रतीत 
होता है कि छेखक उसके मुँह से केवछ अपना विचार प्रकट 
कर रहा है। 

तितली में कंकाल की भांति स्पष्ट चित्रण नहीं है, पात्नों का 
अन्तरहन्द्द घटनाक्रम के अनुसार पुष्ट हुआ है, फथानक की दृष्टि 
से तितली, कंकाल से आकर्षक है, किन्तु चरित्र चित्रण कंकाल की 
तरह उतेना स्वाभाविक नहीं है। | 

भाषा की दृष्टि से तितछी, कंकाल से सरल है, तितली पाक्षिक 
जागरण में धारावाहिक रूप में प्रकाशित होती रही, कभी-कभी 
मूड न होने पर भी मेरे अनुरोध से प्रसाद जी को चराबर लिखना 
पड़ता था; अतएव यह भी सम्भव है. कि यदि वह इस उपन्यास 
को अधिक समय देकर लिखते तो वर्तमान रूप से अधिक पुष्ट होता । 

तितली उपन्यास में घटनाक्रम के अजुसार पर्याप्त रोमांस है। 
यही कारण है कि पाठकों को पढ़ने में वह आकर्षक प्रतीत होता 


८9 


तिवली 


है, इसमें टन घुमाव जो उपस्थित किया गया है, वह टेकनिक 
की दृष्टि से पूर्ण हुआ है। कथानक और घटनाक्रम के निर्माण 
के अनुसार तिवलली, कंकाल से अधिक महत्वपूर्ण है, कवि होने के 
कारण भावुकता की मात्रा, और दृश्यों का वर्णन इसमें भी अत्य- 
न्‍्त सुन्दर हुआ है। 

मधुबन) रामनाथ और सुखदेव चौबे, इन तीनों पात्रों के 
अध्ययन करने पर प्रकट होता है कि लेखक ने इन चरित्रों के सम्बन्ध 
में इनका काल्पनिक चित्र अपने मस्तिष्क में नहीं बना पाया था । 
घटनाक्रम के अनुसार ही उनका चरित्र बनता गया । 

कंकाल और तितली सें सब से महत्व की बात यही है कि 
कंकाल में चरित्र के अनुसार घटनाक्रम दना है और तितली में 
घटनाक्रम के अनुसार ही चरित्र चित्रण किया गया है। 


८९ 


प्रसाद भर उनका साहित्य 


तितली 


संबत' ५५ के अकाल से बुद्टें ने बंजो को पाया था। वह आज उसी 
समय की कहानी सुनाने ही वाला था कि एकाएक धाँय-घोंय का शब्द सुनाई 
पढ़ा । 

गंगातट बन्दूक के घड़ाके से मुखरित हो उठा । बंजो फुतूहल से झोपडी 
के बाहर चली आई। 

बंजो समझ गई कि कोई शिकारी इधर आ गया है। उसके हृदय में 
विरक्ति हुई, उँह, शिकारी पर दया दिखाने की क्या आवश्यकता भठकने दो | 

कटीली झाडी में चोबे जी फँस गए थये। बंजों की यह भी ज्ञात हुआ 
कि उस दल में एक रमणी भी है। 

चौबे ने कहा--कैसी सांसत है सरकार, भला आप क्‍यों चली आई £ 

शैला ने कहा--हइन्द्रदेव से यह मालूम हुआ था कि सुरखाब इधर वहुत 
हैं, मैं इनके मुठायम परों के छिए आई। सच चौबे जी, लालच में 
चली आई, किन्तु छर्रों से उनका मरना देखने-में मुझे सुख न मिल्ा। आह! 
कितने निडर हो वे गंगा के किनारे टहलते थे । उन पर विन्चेस्टर रिपीटर 
के छररों की चोट !,..विलकुल ठीक नही । में आज ही इन्द्रदेव की शिकार 
खेलने से रोकूंगी-आज ही । 


दर 


तिवली 


अब किधर चला जाय £--हौला ने पूछा। 
चौबे जी ने डग बढ़ा कर कहा--मेरे पीछे-पीछे चली आइये । 
किन्तु मिह्ठी बह जाने से जो मोटी जड़ नीम की उम्र आई थी, उसने 
ऐसी करारी ठोकर लगाई कि चोबे जी मुँह के बल गिरे । 
रमणी चिल्ा उठी, उस धमाके और चिह्लाह॒ट ने बंजो की विचलित कर 
दिया ! वह सहायता के लिए ग्रस्तुत हो गई । 
शैला और चौबे बंजो के साथ उसकी झोंपड़ी तक जा रहे थे, उसी समय 
इन्द्रदेव ने शैला को पुकारा । 
बंजो के सहारे चौबे जी को छोड कर शैला फिरहरी की तरह घूम पढ़ी । 
उसने कहा--बहुत संभल कर आना, चौबे का तो घुटना ही हृट गया है। 
नीम के नीचे खड़े हो कर इन्द्रदेव ने शेला के कोमल हाथों को दवा कर 
ऋटा--करारे की मिट्टी काट कर देहातियों ने कामचछाऊ सीढ़ियाँ अच्छी बना 
ली हैं। शैला कितना सुन्दर दृश्य है! नौचे घौरे-घीरे गंगा बह रही हैं, 
। अंधकार से मिली हुईं उस पार के बृक्षों की श्रेणी क्षितिज की कोर में गाढ़ी 
कालिमा कौ बेल बना रही है, और ऊपर...... 
पहले चल कर चोबे को देख लो, फिर दृश्य देखना--वीच ही में 
रोककर शेला ने कहा. . 
सब छोग बंजो के साथ उसकी क्षोंपड़ी तक पहुँचे । 
' चौबे जी वही रात भर रह गये, शौला इन्द्रदेव के साथ छावनी छोट 
जआाई। 
बंजो छुड्डें से कहती है--वापू जो आए ये, जिन्हे मैं पहुंचाने गई थी 


८रे 


प्रसाद जौर उनका साहित्य 


बही तो धामपुर के जुमीदार हैं। छालटेन लेकर कई नौकर चाकर उन्हें खोज 
रहे थे। पगडंडी पर ही उन लोगों से सेंट हुई। सधुआ के साथ मैं फिर 
लौट आई। 

मछुआ तेल लेकर चौबे का घुटना सेंकने लगा । 

चंजो घुआल में कम्बल लेकर घुसी । कुछ पुआल और कुछ कम्बल से 
गले तक शरीर ढंक कर, वह सोने का असिनय करने लगी। पलकों पर ठंड 


कं 


लगने से बीच में वह ऑँख खोलने मूँदने का खिलवाड़ कर रही थी। जब 
आंखें बन्द रहती; तव एक गोरा गोरा मुँह-करुणा की मिठास से भरा हुआ 


गोल सठोल नन्हा सा सुँह--उसके सामने हँसने लगता । उसमें ममता का 
आकर्षण था--किन्तु विजय हुई आँख बन्द करने की । शैला के संगीत मे 
समान सुन्दर शब्द उसको हृदयतंत्री में झनझना उठे । 

शैला से मित्रता--शैल्ा से मधुर परिचय-के लिए न जाने कहों की साथ 
उमड़ पड़ी थी । 

इन्द्रदेव के पिता की राजा की उपाधि मिली थी। धनी के लडके होने के 
कारण उन्हें पढने लिखने की उतनी आवश्यकता न थी, जितनी लन्दन का 
सामाजिक बनने की । न्‍ 

इन्द्रदेब कभी कभी ठन्‍्दन के उस पूर्वीय भाग की सैर के लिए चले जाते 
थे, जहाँ अद्धे-नम्न दरिद्रों का रात्रि निवास था । 

चुपचाप वह दृश्य देख रहे थे, और सोच रहे थे--इतना अकूत धन 


विदेशों से ले आकर भो, क्या इन साहसी उद्योगियों में अपने देश की दरख्दिता का - 


नाश किया १ अन्य देशों की अक्ृति का रक्त इन लोगो की कितनी प्यास बुझा सका है ! 


दे 


तितली 


सहसा एक लम्बी सी, पतली-दुबठी लड़की में आकर उसके पास याचना 
की । इन्द्रदेव ने गहरी दृष्टि से उस विवरण मुख को देख कर पूछा--क्यों 
तुम्हारे पिता माता नहीं हैं १ 

पिता जेल में है, माता मर गई है ।--उसने कहा । 

और इतने अनाथालय १--इन्द्रदेंव नें पूछा । 

उनमें जगह नहीं --उसने कहा । 
इन्द्रदेव ने पूछा--तुम्हारे कपडे से शराब की हुगन्ध आ रही है। क्या तुम... 

जैक बहुत ज्यादा पी गया था। उसीने कै कर दी है। दूसरा कपड़ा 
नही जो बदरूं | बड़ी सरदी है। कह कर लड़की ने अपनी छाती के पास का 
कपड़ा मुध्टयों से समेट लिया। 

इन्द्रदेव ने प्रश्न किया--तुम नौकरी क्यों नहीं कर लेती ? 

उसने उत्तर दिया--रखता कोन है ? हम लोगों को तो वे बदमाश, 
गिरहकट, आवारा समझते हैं। पास खड़े होना भी... ... 

सरदी के कारण उसके दाँत बज उठे । वह आगे कुछ कह न सकी। एक 
छोकरे ने आकर लडकी को धक्का देते हुए कहा--जों पाती है, सब की शराब 
पी जाती है। इसको देना न देना बराबर है । 

बह घूम कर जाने के लिए तैयार थी कि इन्द्रदेव ने कहा--अच्छा सुनो 
तो, तुम पास के भोजनालय तक चलो, ठुम को खाने के लिये और हो सका 
तो कोई कपड़ा भी दिलवा दूंगा । 

छोकरा हो-हो-हो करके हँस पद्म । बोला--जा न शैला | आज की रात 
तो गरसी से बिता ले, फिर कल देखा जायगा। 


८५ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


इन्द्रदेवब रौछा को साथ लेकर अपनी मेस में चले आये। उस मेस में 
तीन भारतीय छात्र रहते ये। इन्द्रदेव की सम्मति से सब लोगों ने शैला को 
परिचारिका रुप में स्वीकार किया। शैला वही उन लोगो के साथ रहने लगी। 

इन्द्रदेव के सहवास में रह कर शौला भारतवर्ष के प्रति सहानुभूति और 
आकर्षण प्रकट करती है। पिता की स॒त्यु का समाचार पा कर इन्द्रदेव, शैला 
को लेकर भारत चले आते हैं। 

इन्द्रदेव ने शहर के महल में न रह कर धामपुर के वेंगले में ही रहने 
का अवन्ध किया । 

इंगलैन्ड में ही इन्द्रदेव ने शैला को हिन्दी से खूब परिचित करा दिया 
था। बह अब अच्छी हिन्दी बोलने लगी थी । देहाती किसानों के घर जाकर 
उनके साथ घरेल्लू बातें करने का उसे चसका छग गया था। साडी पहनने का 
उसने अभ्यास कर लिया था--और उस पर फबती भी अच्छी थी। 

शेला बड़े कौतूहल से भारतीय वातावरण में नीडे आकाश, उजली धूप 
और सहज आमीण शांति का निरीक्षण कर रही थी। वह बातें भी करती 
जाती थी। गंगा की लहर से सुन्दर कटे हुए बाह्ू के नीचे कगारों मे 
शुन्द्र पक्षियों के एक छोटे से झुन्ड की विचरते देख कर उसने उनका नाम 
पूछा। 

इन्द्रदेव ने कहा--इन्हे चक्रवाक कहते हैं। इनके जोड़े दिन भर साथ 
घूमते रहते हैं। किन्तु जब सन्ध्या होती है, तमी यह अलूग हो जाते हैं। 
फिर ये रात भर नहीं मिलने पाते । 

छावनी के उत्तर नाले के किनारे ऊँचे चौतरे की हरी-हरी दूवों से भरी हुई 


<द्‌ 


तितकी 


भूमि पर कुर्सी का सिरा पकड़े तन्‍्मयता से शेला नाले का गंगा में मिलना देख 
रही थी । 

दालान में चोवे जी उसके लिए चाय बना रहे ये। सायंकाल का सूर्य 
भब लाल बिम्ब मात्र रह गया था। इन्द्रदेव तब तक नही आए थे । 

, शैला कौ तन्मयता भंग हुई। उसने रामदीन से पूछा--क्या अभी इन्द्रदेव- 

नहीं आए । 

नटखट रामदीन हँसी छिपाते हुए, एक आँख का कोना दबा कर, ओठ के 
कोने के जुरा ऊपर दबा लिया। शैल्ला उसे देख कर खूब हँसी। रामदीन कहने 
छगा--बड़ी सरकार आने वाली हैं, उनके लिए छोटी कोठी साफू कराने का 
प्रन्‍न्ध देखने गए हैं। 

इतने ही में बनारसी साड़ी का अचल कन्घे पर से पीठ पर लटकाए, 
हाथ में छोटा सा बेग लिए, एक सुन्द्री वहों आकर खड़ी हो गई । 

शैला ने पूछा--आप क्या चाहती हैं १ 

आने वाली ने नम्र मुस्कान से कहा--मेरा नाम मिस अनवरी है। मे 
कुअर साहब की माँ को देखने आया करती हूँ । 

इसके बाद इन्द्रदेव भी आ गये। सब लोगों ने चाय पी। इन्द्रदेव ने 
अनवरी से कहा--मां जब से आई है, तभी से आपको पूछ रही हैं। उनके 
रीढ में दर्द हो रहा है । 

अनवरी तो वहाँ से उठने का नाम ही न लेती थी। वह कभी इन्द्रदेव 
ओर कभी शैला को देखती, फिर सन्ध्या की आने वाली कालिमा की प्रतीक्षा 
करती हुई, नीले आकाश से आँख लड़ाने लगती । 


७ 


प्रसाद और उनका साहिल 


कुछ देर बाद अनवरी चली गई । इन्द्रदेव ने शैल्ल से पूछा--माँ से तुम 
कब मिलोगी £ 

उसने कहा--चर्ें १ 

इन्द्रदेव ने कहा--अच्छा कल सरेरे । 

इन्द्रदेव को संभालने के ख्याल से अपनी पुत्री माधुरी को साथ लेक 
श्याम हुलारी भी घामपुर आई थीं। वह धार्मिक मनोइृत्ति की प्री हैँ लग 
कहते हैं, इन्द्रदेव के कानों में यह समाचार किसी मतलब से पहुँचा दिया गया 
कि आपके चरण छू कर चले आने पर माता जी ने फिर से स्नान किया, त्तो 
फिर वह मकान में न ठहर सके । 

अनवरी, माधुरी और उश्यामदुलारी के पास पहुँचती है। वहाँ पर हँसी 
दिल्ली में माधुरी से शैला का भाभी वाला सम्बन्ध जोड़ कर वह उसके मन 
की बातें प्रकट करा लेती है। 

श्यामदुलारी और माधुरी शैला के प्रति विरोध प्रकट करती हैं। अनवरी 
उन लोगों का समर्थन करते हुए उस घड्यन्त्र में सहायक होती है। फिर 
कुछ दिनों के लिए बहों ठहर जाती है। 

शैला और अनवरी आज साथ ही घूमने निकली थी। शैला झोंपडी के 
पास जा कर खड़ी हो गई। उसने देखा, मधुआ अपनी हूटी खाट पर बे 
हुआ वंजो से छुछ कह रहा है। वंजो ने उत्तर में कहा--तब क्या करोगे 
मधुवन । अभी एक पानी और चाहिए, नहों तो तुम्हारा आलू सूख कर ऐसे 
ही रह जायगा, ढाई रुपए के विना। मंहमगू महतों क्या उधार नहीं देगें 
मटर भी सूख जायगी। 


८८ 


तित्तली 


अरे आज में मधुवन कहाँ से वन गया रे चंजो ! पीट दूंगा अगर मुझे 
मधुआ न कहेगी, में तुम्हे तितली कह कर न पुकारुगा छुना न | हल उधार 
नही मिलेगा, महतो ने साफ-साफ कह दिया है । 

म॒धुबन कहता है--अच्छा, आज से मैं रहा मधुबन और तुम तितली यही न। 

दोनों की आखे एक क्षण के लिए मिली--स्नेहपूर्ण आदान-प्रदान करने 
के लिए, मधुवन खड़ा हुआ, तितली वाहर चली आईं, उसने देखा, शैल्ला 
और अनवरी चुपचाप खड़ी हैं। 

शैला पॉच रुपए का नोट तितली को दे रही थी; लेकिन उसने नहीं लिया। 
अन्त में उसने वह रुपया मधुबन को दिया, और दोनों वहाँ से चल पड़े । 

मार्ग में चलतेल्चलते शैा कहती है--लन्दन की भोढ़ से दवी हुई 
अलुष्यता से मैं ऊब उठी थी, और सवसे बड़ी बात तो यह है कि मैं भी 
दुख उठा चुकी हूँ, दुख के साथ दुखी की सहाजुभूति होना स्वाभाविक है। 

अनवरी कहती है--हम मुसलमानों को तो मालिक की मर्जी पर अपने 
को छोड़ देना पढ़ता है, फिर सुख-दुख की अछग-अलग परख करने की 
किसको पड़ी है। 

चलते-चलते वे दोनों छावनी पर पहुंचते हैं। 

तहसीलदार वनजरिया पर बेदखली करने के लिए कागज पत्र इन्द्रदेव 
को दिखलाना चाहता था, और बुड्डा रामनाथ अपनी सफाई देते कह रहा 
था--कष्णापण माफी पर छगान कैसा? 


अनवरी छोटी कोठी पर पहले ही चली गई थी। शैलो, इन्द्रदेव और 
चौबे जी भी वहीं पहुंचे। 


८९ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


श्यामदुलारी ने इन्द्रदेव से पुछा--अच्छा बेटा ! यह मेम साहब कोन हैं ? 
इनका तो तुमने परिचय ही नहीं दिया। 

इन्द्रदेव ने कहा--मां इश्नलेण्ड में यही मेरा सब प्रवन्ध करती थीं, मेरे 
खाने पीने का, पढ़ने लिखने का और कभी जब अस्वस्थ हो जाता तो डाकटरों 
और रात-रात भर जाग कर, नियमपूर्वक दवा देने का काम यही करती थीं, 
इनका मैं चिरऋणी हूँ, इनकी इच्छा हुई कि मैं भारतवर्ष देखूगी। 

चौवे जी ने एक वार साधुरी की ओर देखा और माधुरी ने अनवरी को। 
तीनों का भीतर-ही-भीतर एक दल सा बंध गया, इधर माँ बेटे की ओर होने 
लगी--और शैला, जो व्यवधान था, उसकी खाई में पुल बनाने लगी । 

इन्द्रदेव ने देखा कि उनके हृदय का घोझ ठछ गया, शेला ने माँ के 
समीप पहुँचने का अपना पथ बना लिया, उन्होंने इसे अपनी विजय समझी । 

भाधुरी का कोघ कपोलों पर लाल हो रहा था। 

मानव-स्वभाव है; वह अपने सुख को विस्तृत करना चाहता है, और 
भी केवल अपने सुख से ही वह सुखी नही होता, कभी-कभी दूसरों की ढुखी 
करके, अपमानित करके, अपने मन को, सुख को प्रतिष्ठित करता है। 

अनवरी ने माधुरी के भन में जो आग लगाई है, वह कई रूप बदल कर 
उसके कोने-कोने की झुलसाने लगी है । 

माधुरी के गौर की चांदनी शैला की ऊपा में फीकी पडेगी ही, इसकी 
हृढ़े संभावना थी, एक सम्मिलित छुहम्ब में राष्ट्रनीति ने अधिकार जमा लिया। 
स्वपक्ष और पर पक्ष का सजन होने लगा। 

चौबे माधुरी की तरफ थे, मोटर पर बैठते हुए अनवरी ने कहा--घंब- 


९5० 


तितली 


राइए मत चौंबे जी, बीवी रानी आपके लिए कोई वात उठा न रखेंगी । 

मधुबन के लिए वंश गौरव का अभिमान छोड़ कर, मुकदमे में सव कुछ 
हार कर, जब उसके पिता सर गए, तो उसकी वडी विधवा वहन ने आकर 
भाई को सम्हाला था, उसकी ससुराल सम्पन्न थी, किन्तु विधवा राजकुमारी 
के दरिद्र भाई को कौन देखता * उसी ने शेरकोट के खंडहर में दीपक जलाने 
का काम अपने हाथो में लिया, वह आज जव से गंगा स्नान करके लोटी है, 
तभी से उत्तेजित हो रही थी, मधुवन का हल चलाना उसे पसन्द न था, वह 
बाबा रामनाथ को कोसती थी, क्यों कि उनका कहना था--हल चलाने से 
बड़े लोगों की जात नहीं चली जाती, अपना काम नहीं करेंगे, तो दूसरा 
कौन करेगा। 

मलिया छावनी पर नोकरी करती थी | 

छावनी की बातें उससे राजकुमारी सुन रही थी, कोई भी स्वार्थ न हो; 
किन्तु अन्य लोगों के कलह से थोड़ी देर मनोविनोद कर लेने की मात्रा मनुष्य 
की साधारण मनोवृत्तियों में प्राय मिलती है, राजकुसारी के कुतूहल की तृप्ति 
भी उससे क्यों न होगी । 

बाबा रामनाथ अपनी कहानी सुनाते हैं, जिसमें यह प्रकट होता है कि 
वार्टली नाम के एक अंगरेज की नील की एक कोठी थी, अपनी बहन जेन के 
विशेष अनुरोध करने पर भी वह इंगलेण्ड नही जाना चाहता था, क्योंकि भारत 
के किसानों में उसका काफी रुपया फंसा था। वार्दली के कारण ही देवनन्द्न 
की समस्त भू-सम्पत्ति नीढाम हो गई थी। उसका सब कुछ चला गया था ॥ 
एक कन्या को छोड़ कर शेष परिवार के सभी लोग चल बसे । 


५९१ 


पसाद और उनका साहित्य 


परदेश मे रामनाथ से उसको में होती है। तितली को रामनाथ के 
हाथों में सॉप कर उसका भी अन्त हो जाता है । 

आगे छुड्ढा कुछ न कह सका क्योंकि तितली सचमुच चीत्कार करती हुई 
मूछिंत हो गई। शैला उसके पास पहुँच कर उसे प्रकृतिस्थ करने में लय गई ।। 
इन्द्रदेव आराम कुर्सो पर लेट गए, और सुनने वाले धीरे-घीरे खिसकने लगे । 

पूस की चाँदनी गाँव के हल्के कुह्दासे के रूप में साकार हो रही थी। 
शीतल-पवन जब घनी अमराइयों में हरहराहट उत्पन्न करता तब स्पश न होने 
पर सी, गाढ़े के कुर्ते पहनने वाले किसान अलावों की ओर खिसकने लगतें। 
शैला खड़ी होकर एक ऐसे ही अछाव का दृश्य देख रही थी, जिसके चारों 
ओर &- सात किसान बैठे तम्बाकू पी रहे थे । 

सधुबन ने शैंछा को नमस्कार करते हुए पूछा--क्या कोई काम है: 
कहीं जाना हो तो मैं पहुँचा दूं । 

शैला से कहा--नहों मधुबन, में भी आग के पास बैठना चाहती हूँ। 

वहाँ पर नील कोठी के सम्बन्ध में बातें होती हैं। वह यहाँ से कितनी 
दूर पर है, शेला पूछती है। महंगू से उसे सव बातें मात्म होती हैं । 

शैला चौल कोठी देखना चाहती है; छेकिन उस भुतही कोठी में इस रात 
के समय जाने का कोई साहस नहीं करता । अन्त में मधुबन प्रस्तुत होता है, 
और उसके साथ रामजस भी । दोनों के साथ शैला वहाँ जाती है। 

सार्गे में तहसीलदार के सम्बन्ध में वातें होती हैं। मधुबन वतलाता है, 
किसी समय इसी तहसीलदार ने गुदाम वाले साहव से एक वात पर उसाड 
कर मेरे पिता जी को लड्य दिया था, मुकदसे में जब मेरा सब कुछ साफ ही गया 


ण्र्‌ 


तितली 


तो उसने घामपुर की छावनी मे नौकरी कर ली। मैं किसी दिन इसकी नस 
तोड़ दूं तो मुझे चैन मिले । इसके कलेजे में कतरनी जैसे कीड़े दिन रात 
कलबलाया करते हैं । 

शैला नील कोठी पहुँच गई, वह पत्थर की पुरानी चोकी पर बेठ कर 
सूखती हुई झील को देखने लगी। देखते-देखते उसके मन मे विषाद और 
करुणा का भाव जागृत होकर उसे उदास बनाने लगा। शेला को दृढ़ विश्वास 
हो गया कि जिस पत्थर पर वह बैठी है, उसी पर उसकी भाता जेन आकर 
बैठती थी। जिस दिन से उसे वाटछी और जेन का सम्बन्ध इस भूमि से 
बिद्ति हुआ, उसी दिन से उसकी मानस लहरियों में हलचल हुई । बाल्यकाल 
की सुनी हुई बातों ने उसे विश्वास दिलाया कि उसकी माता जेन ने, अपने 
जीवन के सुखी दिनो को यही बिताया है। अब सन्देह का कोई कारण नहीं 
रहा । श्ज्ञात नियति की प्रेरणा उसे किस सूच्न से यहां खीच लाई है, यही 
उसके हृदय का प्रश्न था । 

शैला नील कोठी से चली आ रही थी, वह सोचने छगी--- 

नियति दुस्तर समुद्र को पार करती है। चिरकाल के अतीत को वर्तमान 
से क्षणमर में जोड़ देती है, और अपरिचित मानवता-सिन्धु में उसी एक से परि- 
चय करा देती है, जिससे जीवन की अग्नगामिनी धारा अपना पथ निर्दिष्ट 
करती है, कहां भारत कहां मैं और कहाँ इन्द्रदेय | और फिर तितली जिसके 
कारण मुझे अपनी माता की उदारता के स्वगाय संगीत सुनने को मिले, यह 
पावन प्रदेश देखने को मिला । 

वह कन्ची सड़क से धीरे-धीरे चली जा रही थी, एकाएक मोटर रोककर 


९३ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


अनवरी ने कहा--छावनी पर ही चल रही है न। आइये न | 

शैला ने कह्ा--आप चलिए सें आती हैँ । 

अनवरी ने कृष्णमोहन से कहा--यह तुम्हारी मामी हैं, उन्हें जाकर बुलाओं । 

कृष्णमोहन ने नमस्कार करते हुए कहा--आइये न ! 

कृष्णमोहन अपने विलासी पिता इ्यामछाल की लापरवाही के कारण 
भाघुरसी के साथ ही रहता था। 

शैल्ता मोटर पर बैठ गई । 

सहसा एक दिन इन्द्रदेव को यह चेतना हुई कि वह जो कुछ पहले ये, 
अब नहीं रहे, उन्हें पहले से भी कुछ कुछ ऐसा भास होता था कि पढे पर एक 
दूसरा चित्न तैयारी से आने वाला है; पर उसके इतना शीघ्र आने की सम्भा- 

, घना न थी, शौला की स्थिति क्या होगी? इस सम्बन्ध में वह वार बार सोचने 
' छगे, उसका गौरव बनाने के लिए कभी-कभी वह उससे मुक्त होने की चेषठ 

करने लगते । 

उनके कुटुम्ब वालों के सन में शैला को वेश्या से अधिक समझने की 
कल्पना भी नहीं हो सकती थी, इस कारण वह व्यथित रहता । 

इधर शैला वावा रामनाथ के यहाँ हितोपदेश पढ़ने भी जाती थी, अर्थात्‌ 
इन्द्रदेव और शैला दोनों ही अपने की बहलाने की चे्ट में ये । 

इन दिलों इन्द्रदेव के परिवार में घटनाएँ बड़े वेग से विकसित हो रही 
थी । एक दिन इन्द्रदेव ने शैला से कहा--मैं इस लिए चिन्तित हूँ कि अपना 
और तुम्हारा सम्बन्ध स्पष्ट कर दूँ। यह ओछा अपवाद अधिक सहन नहीं 
किया जा सकता । 


९४ 


तितली 


शैला कहती है--दूसरे मुझकी क्या कहते है। इस पर इतना ध्यान देने 
की आवश्यकता नही, ....-अब में तुमसे अलग होने की कल्पना करके दुखी 
होती हूँ। किन्तु थोडी दूर हटे बिना भी काम नहीं चलता । तुसकी और 
अपने को समान अन्तर पर रख कर, कुछ दिन परीक्षा लेकर तव मन से पूछेंगी । 

इन्द्रदेव ने कह्दा--क्या पूछोगी शेला £ 

शैला ने गम्भीरता से उत्तर दिया--हम लोगों के पश्चिमीय जीवन का यह 
संस्कार है कि व्यक्ति को स्वावलम्ब पर खड़े होना चाहिए । तुम्हारे भारतीय 
हृदय मे, जो कोठुम्बिक कोमलता में पला है, परस्पर सहानुभूति की सहायता 
की बड़ी आशाएँ परम्परायत संस्कृति के कारण, बलवती रहती हैं । किन्तु मेरा 
जीवन कैसा रहा है, उसे तुमसे अधिक कोन जान सकता है * मुझ से काम 
लो और बदले में कुछ दो । 

अनवरी को आते देख कर उल्लास से इन्द्रदेव ने कहा--शैला शेरकोट 
चाली बात अनवरी से मां तक पहुंचाई जा सकती है। 

शैला प्रतिवाद करना ही चाहती थी कि अनवरी सामने आ कर खड़ी हो 
गई । उसने कहा--आज कई दिन से आप उधर नही आई हैं। बड़ी सरकार 


अरे पहले बैठ तो जाइये--छुसीं खिसकाते हुए शैला ने कहा--मैं तो 
स्वयं अभी चलने के लिए तैयार हो रही थी। 

अनवरी ने कहा--अच्छा । 

शैला ने कहा--हाँ शेरकोट के बारे में रानी साहिबा से मुझे कुछ कहना 
था। मेरे श्रम से एक बढ़ी घुरी बात हो रही है, उसे रोकने के लिए. .. ,.. 


९५ 


प्रसाद और उचका साहित्य 


क्या १--अनवरी ने पूछा । न 5 

सधुवन बिचारा अपनी झोपड़ी से भी निकाछ दिया जायगा। वही उसके 
बाप दादाओं की डोह है। मैंने बिना समझे बूझे बेंक के लिए वहीं जगह पसंद 
की । उस भूल को सुधारने के लिए मैं अभी ही वहाँ जाने वाली थी । 

मधुबन हो, वही न जो उस द्नि रात को आपके साथ था, जब आप 
नील कोठी से आ रही थी। उस पर तो आपको दया करनी चाहिए-- 
कह कर अनवरी ने भेद भरी दृष्टि से इन्द्रदेव की ओर देखा । 

इन्द्रदेव कुर्सी छोड़ कर खड़े हुए । 

शौलाने निराश दृष्टिसे उनकी ओर देखते हुए कहा--मेरी दया में आपकी 
सहायता की भी आवश्यकता हो सकती है, चलिए । 

मधुबन की बहिन राजकुमारी से बाबा रामनाथ, तितली और मधुबन के 
सम्बन्ध में बात करते हैं । 

गंगातट पर रामनाथ, राजकुमारी, शैला और तितली सभी लान के लिए 
जाती हैं, आपस में सबसे बातचीत हुई । 

राजकुमारी का हृदय लिग्ध हो रहा था, उसने देखा, तितली अब वह 
चंचल लड़की न रही, जो पहले मधुबन के साथ खेलने आया करती थी, उसकी 
काली रजनी सी उनोदी ओखे जैसे सदैव कोई गम्भीर स्वप्न देखती रहती हैं, 
लम्बा छरहरा बदन, गोरी पतली उंगलियों, सहज उन्नत ललाठ, कुछ खिची 
हुई भोहें और छोटा सा पतले-पतले अधरों वाला सुख, साधारण कृषक बालिका 
से कुछ अढग अपनी सत्ता बता रहे थे, कानो के ऊपर से ही घूंघट था, 
जिससे लटें निकली पड़तों थीं, उसकी चौड़े किनारे को थोती का चम्मई रंग 


५्क 


तितकों 


उसके शरीौर में घुला जा रहा था, वह सन्ध्या के निरंभ गयन में विकसित 
होने वाली-अपने ही मधुर आलोक से सन्तुष्ट-एक छोटी सी तारिका थी । 

सुखदेव चौबे राजकुमारी के सझुराल के समोप रहने वाला चिर परिचित 
पड़ोसी था, घटनावश एक दिन उससे और राजकुमारी से मेंट होती है, चोबे 
ने तितली का इन्द्रदेव से विवाह करने का नया षडयंत्र उपस्थित किया, 
राजकुमारी इस कोर्य में सहायक हो, यही चौबे का विचार था। 

उस दिन मधुबन घर छौठ कर आया तो उसने राजकुमारी को एक नई 
खवस्था में देखा, उस दिन भोजन नहीं पका था, वह ,चुपचाप जल पी कर 
खबला गया। 

राजकुमारी ने सब देख समझ कर कहा--हूँ ! अभी यह हाल है तो 
तितली से व्याह हो जाने पर धरती पर पैर ही न पढ़ेंगे । 

बाबा रामनाथ और शेला में परस्पर अपने अपने देश के जीवन संबंधी 
सिद्धान्तों पर वातौलाप होता है । रामनाथ आर्य सभ्यता तथा उसके सिद्धान्तों 

के पोषक हैं और शैला अपने पाश्चात्य व्याहारिक सिद्धान्त की । अन्त में राम- 

नाथ ही की विजय होती है और शैल्ा भारतीय सिद्धान्तों में प्रभावित हो कर 
बावा रामनाथ से दीक्षा लेने के लिए तैयार हो जाती है। 

राजकुमारी तभी से अपने भाई और तितली से विमुख रहने छूगी। शेर- 
कोट में वह अकेले ही रहती थी । भधुबन, नोकरी छग्र जाने के कारण 
अपनी पत्नी के साथ नील की कोठी में ही रहने छूगा था । 

स्वतंत्रता पाकर जवानी की उमंगें राजकुमारी के मन में फिर से उठने 
लगीं। मधुवन को भी राजकुमारी के चरित्र पर सन्देह हो चला था। किन्तु 


७ ९७ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


उसकी वही दशा थी, जैसे कोई मनुष्य भय से आंखें मूँद लेता है। 
वह नहीं चाहता था कि अपने सन्देद की परीक्षा कर के कठोर सत्य का नम 
रूप देखे । 
गाँव के पंडित दीनानाथ की लड़की का ब्याह था। राजकुमारी की 
इच्छा भी खूब सजबज कर वहाँ जाने की हुईं। उसने अपने वालों पर कंधी 
बडे मनोयोग के साथ की । दर्पण उठा कर कई बार उसने अपना मुँह देखा। 
एक छोटी सी बिन्दी छगानें के लिए उसका मन ललच उठा। रोली, इकुम, 
सिन्दूर वह छगा नहीं सकती थी, तव * उसने नियम, धर्म और अपनी 
उत्कृष्ट अभिलाषा की मयौदा कत्ये और चूने की विन्दी ऊगा कर बचाली ! 
फिर से दर्पण देखा । वह अपने उपर रीझ्ष उठी । हाँ, उसमें वह शक्ति आ 
गई थी कि पुरुष एक बार उसकी तरफ देखता । 
लेकिन वैधव्य ने वेचारी राजकुमारी से “ईंगार धारण करने का अधिकार 
छीन लिया था। बड़े दुःख से माथे की बिन्दी मिटा कर वह दीनानाथ के घर 
गई। , शादी के वातावरण और हँसी-दिछृगी से राजकुमारी के नस-नस में 
विजली सी दौड गई। वाहर रंडी गा रही थी, 'छगे नेन घालेपन से, राज- 
कुमारी बहुत ही अधिक विचलित हो उठी। रात में ही वहाँ से शेरकोट लोट 
जाने के विचार से वह सुखदेव चौथे के साथ निकल पड़ी । रसीली चॉदनी की 
आद्रेता से भन्‍्थर पवन अपनी लहरों से राजकुमारी के शरीर में रोमांच उतनन्न 
करने लगा था। सुखदेव ज्ञान विहीन मूक पशु की तरह, उस आम की अंधेरी 
छाया में राजकुमारी के परवश शरीर के आलिड्नन के लिए चंचल हो रहा था। 
राजकुमारी की गई हुई चेतना फिर छौट आई । अपनी असहायता में 


९८ 


तितली 
उसका नारीत्व जाग उठा। उसने चोबे को चुपचाप शेरकोट तक पहुंचाने के 


- लिए विवश किया । 


माधुरी का पति श्यामछाल बहुत ही दुराचारी था। वह धामपुर आया 
हुआ था । पूरे गाव को अपनी ससुरा७ समझ कर उसने जिस-तिस ज्ञी पर 
सत्याचार करना शुरू कर दिया । इसके बाद एक दिन माधुरी के देखते दी 
देखते वह अनवरी के साथ कलकतें छोट गया । इस अपमान से माधुरी छ्षुन्घ 
हो उठी थी। शैला ने उसे सान्त्वना दी। उसे भी लगा, जैसे शेला के बारे में 
बंधी हुई उसकी धारणायें गृलत हैं । श्यामदुलारी को भी यही अनुभव होने 
लगा । उन्होंने शेला से सलाह कर यह निश्चय किया कि अपनी जायदाद वह 
माधुरी के नाम कर दे । इन्द्रंदेव कुछ दिन पहले ही कब कर बनारस चछे 
गये थे ; तथा वहाँ बैरिस्टरी झुरू कर दी थी। इसलिए शैठा, माधुरी और 
श्यामदुलारी कागजात की रजिस्ट्री आदि के लिए बनारस गईं। वही इन्द्रदेव 
और शौला का विवाह भी हो गया । 

शैला का विचार गांव में एक बेंक, ओषधालय, झामसुधार और प्रचार 
विभाग खोलने का था। उसने सोचा था कि इन सब संस्थाओं के एक दी 
स्थान पर रहने से उन पर वह ठीक तरह से नियंत्रण रखने में सफल होगी । 
गाव के तहसीलदार ने, जो सम्रद्धि के दिनों में मधुबन के पिता का नमक खा 
चुकने की वजह से इस बिगड़ी के जुमाने' में मधुबन पर अपने प्रभुत्त की 
छाप जमाना चाहता था, इन्द्रदेव की आज्ञा पर शेला के लिए शेरकोट को ही 
पसन्द किया था। परन्तु जब उसे यह माछ्म हुआ कि शेरकीट मघुबन के 
रहने का स्थान ही नही, वरन केवल उसके कारण ही उसकी पैत क विभूति 


८९५९ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


का चिराग्र भी टिमटिमा रहा है, वह उस पर अपना आधिपत्य जमाने को 
तैयार नहीं हुई । 
शैल्ा ने नील की कोठी इन्द्रदेव से मांग ली । 
घावा रामनाथ मधुबन और तितछी का विवाह कराने के इच्छुक थे। 
उधर माधुरी, अनवरी और सुखदेव चौबे इन्द्रदेव के ऊपर से शैला का प्रभाव 
हटाना चाहते थे । उनकी इच्छा थी कि किसी दूसरी लड़की से उनका ब्याह 
करा दिया जाय। सुखदेव चौबे इस पषड़यंत्र के अशुआ बने। चौंबे कौ 
राजकुमारी से सछुराली रिह्तेदारी थी। वह उसके पुरोहित वश का था। देवर 
भाभी का नाता था, व्यज्न विनोद की खुटकियां आपस में चलती थीं। उसने 
राजकुमारी के कान भरे। राजकुमारी इस विवाह के विरोध में हो गई। 
उसने बाबा रामनाथ से भी अपना विरोध प्रकट किया । रामनाथ ने उसकी 
कोई बात नहीं सुनी । वरन्‌ इस ख्याल से कि आगे चल कर यह पढ़यंत्र 
और ज़ोर न पकड़े । उन्होंने तितली और मधुबन का विवाह भी उसी दिन 
कर दिया, जिस दिन शैला को हिन्दू धर्म में दीक्षित किया। स्वयं इन्द्रदेव 
उसके गवाह थे । 
इनके जाते ही गांव में तदसीलदार का अत्याचार बढ़ने लगा । मेंधुबन 
से शेरकी४ और बनजरिया बकाया लगान में छीन ली गई । राजकुमारी तह- 
सीलदार से भुकृदमा लड़ने की गुरज से महन्त जी के पास कुछ रुपया उधार 
ने गई। महन्त वासना का शिकार होकर उसकी तरफ वढ़ा। राजो चिह्ाई। 
मधुवन वाहर ही छिपा हुआ खड़ा था। क्ोघ के आवेश में चहार दीवारी 
फांद कर वह अन्दर आया, तथा निर्दयता-पूर्वक महन्त की गर्दन घोंट दी । 


१०० 


दितली 


खून कर मधुबन भागा । चुनार द्वोता हुआ कलकत्ता गया । पहले कुली- 
गिरी की, फिर रिक्शा हांकने लगा। कलकते की पुलिस के चक्कर मे वेचारा 
मधुबन एक दिन निर्दोष ही, डाके के अपराध में गरिरफूतार कर लिया गया। 
उसे दश वर्ष की कैद हो गई। 

( मधुबन जब महन्त की हत्या कर गाव से भागा था, तितली गर्भवती 
थी। और इस लम्बी अवधि में उसका वह गर्भस्थ शिकश्वु भी बढ़ कर अब 
चौदह वर्ष का हो गया था। तितली शैर्ला के साथ ग्राम पाठशाल्त, झाम संग- 
ठन आदि कार्यों में हाथ बंठाती थी। भोहन अपने पिता के लिए माँ से जिद 
करता था। एक दिन उसे ज्वर चढ़ आया । ' 

“लछड़का कहता है, माँ पिता जी'**” 

हां बेटा, तेरे पिता जी जीवित हैं। मेरा सिन्दूर देखता नहीं-तितली 
लड़के को सान्तवना देकर सुला देती है। वह सोचने लगी, इतने दिन बीत 
गए, क्या मधुबन अब लोट कर घर नहीं आयेगा ? 
, सोचते सोचते वह बिकल हो उठी। उससे पागलों की तरह मोहन को 

प्यार किया, उसे चूम लिया। अचेत मोहन करवट बदल कर सो रहा। 

तितली ने किवाड़ खोले । 

उसने देखा, आकाश का अन्तिम कुछुम दूर गंगा की गोद में चू पड़ा, 
और सजग होकर सब पक्षी एक साथ ही कलरव कर उठे। साथ ही उसने देखा, 
जीवन थुद्ध का थक हुआ सैनिक मधुबन विश्राम शिविर के द्वार पर खड़ा था।? 


१०१ 


असाद और उनका सादित्य 


इरावती 


इरावती प्रसाद का ऐतिहासिक उपन्यास है। सालूवती कहानी 
लिखने के समय जो अध्ययन की सामग्री उनके सम्मुख थी; उसको 
लेकर आगे बढ़ने के लिए इरावती का कथा भाग बनता है। 

प्रसाद की यह अन्तिम रचना अधूरी रह जाती है; इसका 
हिन्दी-साहित्य को मार्मिक आघात है. । 

इरावती उपन्यास को आरम्भ करते समय लेखक ने कुछ 
संकेत नोट किये थे जिनके आधार पर उपन्यास खड़ा किया 
जाता । 

दुःख इस बात का है कि इस उपन्यास के आगे बढ़ने वाले 
कथानक के सम्बन्ध में प्रसाद जी से कभी बातें नहीं हुई । 

एक दिन अपनी रुग्णावस्था में उन्होंने हम छोगों से कहा-- 
शक लेखक महोदय मेरे इरावती उपन्यास को पूरा करना चाहते हैं। 

हम लोग उनका नाम जानने के लिए उत्सुक हो उठे । प्रसाद 
जी ने बतछाया। उनका नाम सुनते ही हम छोग हँस पड़े | 

मैंने कहा--अपनी रचनाओं को आप ही पूरा कर सकते हैं, 
दूसरे किसी की इतनी क्षमता नहीं दिखाई पड़ती । 


१०२ 


दरावती 


आज भी इरावती पढ़ कर समाप्त करने के बाद मुझे अपने वे 
शब्द याद आ रहे हैं, जैसे वे ही शब्द गूँज रहें हैं | प्रसाद जैसी 
लेखन-कुशलता प्राप्त करना साधारण बात नहीं । वह अपने निर्मित 
चरित्रों पर कितने प्रकार से प्रकाश की किरणें बिखेरते थे, यह 
अध्ययनशील पुरुषों से छिपा नहीं है । 

इस उपन्यास के सम्बन्ध में कुछ कहने के पूर्व हम उनके नोट 
किए हुए संकेतों को यहां खोजना चाहते हैं । 

(१) मणिमाछा में वेश्या भाव और इरावती में कुछबंधू 
प्रवृत्ति, दोनों का अन्तर | 

इरावती और मणिमाला का वैसा ही चित्रण हुआ है। इरावती नतंकी 
होते हुए भी मगध-सम्राट्‌ बृहस्पतिमित्र के प्रणय-प्रद्शन को तिर॒स्कार की 
दृष्टि से देखती है। बन्दी होकर कष्टों के दिनों में भी वह अपने चरित्र पर 
अटल रहती है। दूसरी ओर मणिमाछा कुलवधू होते हुए भी अपनी मनोइ- 
तियों के कारण नीचे गिरती है। धनदत्त जब दो वर्षों के वाद विदेश से 
लोठता है, तब उसे अपनी पलली पर सन्देह होता है। अतएव इन दोनों के 
अन्तर को दिखाना ही लेखक का ग्रधान उद्देश्य प्रतीत होता है । 

(२ ) खारवेल का रह्न खरीदने आना और कालिन्दी के चक्र 
में फेस जाना । 

उपन्यास के अन्तिम परित्छेद में कलिंग का राजा खारबेल स्वर्ण- 
प्रतिमा लेने के लिये सम्राट का निमम॑त्रण पाकर मगध जाता है। एक्र दिन 
उसी ख्वर्णप्रतिमा के ढिये कुछ रत्न खरीदने, धनदत्त के यहाँ जाता है। 


१०३ 


प्रसाद भौर उनका साहित्य 


वहां कालिन्दीऔर इरावती से साक्षात होता है । खाखेल दोनों ही से प्रभावित 
होता है। मुझे तो ऐसा विस्वास होता है कि कथानक में आगे चछ कर लेखक 
कालिन्दी से खारवेल का विवाह कराता, क्योंकि कालिन्दी भी नन्‍्द वंश की 
राजकुमारी थी। 

(३) ब्रह्मचारी और आजीवक का विवाद--किसी भी तरह 
जब तुम स्व की चेतना नहीं भूछ पाते--वंह चीवर) वह पात्र 
मेरा है, इससे परे दूसरे का है--और मैं भी नहीं हैं। यह दशेन 
समझ में नहीं आता है। मैं कहता हूँ रव और उसके अतिरिक्त 
जो कुछ है, सब को स्व बना सकूं तो यह दुःख, भेद सूलक छेश 
छूट सकता है। सारा विश्व महेश्वर का शरीर है। इसमें चैतन्य 
जीवों की समष्टि है। एक इकाई रूप बदलती है; दूसरा बनता है। 
उसमें हम सब उसी तरह हैं, जैसे मेरे एक रक्त बिन्दु में अनेक 

' जीवाणु और चह रस की तरह अपने आनन्द से सब को सजीव 
रखता है । 

ब्रह्मचारी के आनन्द प्रचार की भावना इसी सिद्धान्त के अनुसार 
होती है । 

(४ ) बौद्ध स्थविर की आज्ञा; युद्ध न होना चाहिये । छल से 
सब पराभूत किये जा सकते हैं। छड़ें भी तो जैन खारवेल और 
यवन । मगध के धार्मिक बौद्ध तटस्थ । 

चोद्ध स्थविर का चरित्र अभी तक विशेष रूप से नहीं उपस्थित किया 
गया है; किन्तु यवनों के आक्रमण और खारबेल के आ जाने के वाद आगे के 


१०४ 


इरावती 


कथानक में हो सकता है कि चाणक्य की तरह बौद्ध स्थविर का चरित्र विशेष 
रुप में रखा जाता, जिसमें उसकी छलनीति द्वारा सब पराभूत किये जाते 

(५ ) काढिन्दी किसी तरह खारवेल से इरावती का सामना 
करा देती है, वह गन्धवे वेद का ज्ञाता इरावती का नृत्य देखने 
का हठ करता है। 

कालिन्दी, इरावती को साथ लेकर ही खारवेल का सामना करती है। यह 
अंतिम अंश में स्पष्ट है। इरावती का कथा भाग संक्षिप्त रूप में रख कर, 
उसके अन्त के सम्बन्ध में हम कुछ संकेत देना चाहते हैं । 

कथा भाग--उसकी आँखें आकांक्षा विहीन सन्‍्ध्या और उल्लास विहीन 
ऊषा की तरह काली और रतनारी थी। कभी-कभी उनमें दिग्दाह का श्रम होता ; 
वे जल उठतीं ; परन्तु फिर जैसे घुझ जाती । वह न वेदना थी, न प्रसच्तता । 
उपके घुँघराले बार जटा न बन पाये । छोटी-छोटी स्वत' बढने वाली दाढ़ी भी 
कुछ योंही कालिमा से उसकी सुवर्ण-त्वचा की रेखांकित कर रद्दी थी। शरीर केवल 
हाड़ से बना अ्रतीत होता था। परन्तु उसमें बल का अभाव नहीं था। पह 
अभी आकर शिप्रा के शीतछ जल से स्नान कर घाट पर बैठा था। उसके 
मणिबन्ध में, किसी नागरिक के जूडे की शिप्रा में गिरी हुई माला पढ़ी थी। 
उसमें अभी गन्ध थी, फिर भी उसे छूंघने की इच्छा नहीं। धह परदेसी था। 
उसकी एक छोटी गठरी वही पड़ी थी । शित्रा में जल विहार करने वालों की 
कम्मी न थी। बसन्त की सन्ध्या में आकाश प्रसन्न था। प्रदोष का रमणीय 


समय, किन्तु वह तो अनसना, थका-सा | तब भी जैसे इन सब की वह उपेक्षा 
कर रहा था । 


१०५ 


प्रसाद और उचका साहित्य 


तूर्यनाद और दुन्दुमि गूँजने ऊगी। चारों ओर जैसे हलचल मची। 
लोग उठ कर चलने छंगे । परन्तु वह स्थिर बैठा रहा | किसी ने पूछा तुम 
न चलोगे क्या ? 

कहाँ 2 

मन्दिर में ! 

“किस सन्दिर में ? 

थहों महाकाल की आरती देखने ४ 

अच्छा !' कह कर भी वह उठा नहीं। घाट जन शुन्य हो गया । मन्दिर 
की पताका धूमिल आकाश में लहरा रही थी। वह बैठा रह्य। परन्तु चपल धीडों 
से सजित एक पुष्परथ, वही घाठ के समीप आकर रुका । उस पर बेडे हुए 
युवक ने सारथी से कहा--वस यही, किन्तु वे सब कहाँ है ? अभी नही आए ! 
,... इतने में अश्वारोहियों की एक छोटी-सी ढुकड़ी वही आकर खड़ी हुई। 

रथी ने कुछ संकेत किया, सब उतर पढ़े । शिप्रावट के बट की शाखाओं 

में घोंढ़ों की रास अठका दी गई। कुछ परिचारक भी दाइते हुए भाये। वे 
सब वहीं ठहर ग्रये, केवल एक उल्काघारी महाकाल के गोपुर कौ ओर बढ़ने 
लगा। पीछे-पीछे ये लोग चले | रथी का ढील-डोल साधारण था, किन्तु उसका 
प्रभाव असाधारण । उसके समीप से लोग हट जाते थे । 

उस दिन उजयिनी के महाकाल के मन्दिर में समारोह था। महाकील 
का प्रदोष-पूृजन भारत विख्यात था। उसमें सक्ति और भाव दोनो का समा- 
वेश था। सालिक पूजा के साथ उत्य गीत का का समावेश था, इस लिए 
नौद्ध शासन में सी उजयिनी की वह शोभा सजीव थी। 


१०६ 


इरावती 


सहसा मदज्न और वीणा बजी; न जाने किधर से, जुपूर को झनकारती 
हुई, एक देवदासी आकर खडी हो गई। भावामिनय और नृत्य साथ-साथ 
चला | मगध के मौर्य सम्राज्य का कुमारामात्य बृहस्पतिमित्र इन सब दृश्यों 
को देख कर कहता है---यह देव मन्दिर है या रंगशाला ? 

अपनी गठरी छे कर आया हुआ पथिक अ्निमित्र मगध के महादंड नायक 
पुष्पमिन्र का पुत्र था। वह मुग्ध हो कर नर्तकी इरावती को देख रहा था। वह 
कुछ पहिचानने लगा था । कुछ बोलना ही चाहता था, तभौ कुमार बृहस्पतिमित्र 
आज्ञा देता है। देव मन्दिर के नाम पर विलासिंता का प्रचार बन्द करो 

महाकाल का ब्ह्मचारी पुजारी इस आज्ञा का विरोध करता है। 

आज्ञा का पालन न होने के कारण बृहस्पतिमित्र दुसरी आज्ञा देता है-- 
हों है उजयिनी का प्रादेशिक महामात्य उसको मेरे आगमन की सूचना 
दो | और इस नतेकी को पकड़ कर दुर्ग में ले जाओ 7 

दर्शकों में भगदड़ पड़ी, रंग में भंग हुआ। अभिमिन्र इरावती कौ 
सहायता करना चाहता है; लेकिन इरावती कहती है--मैं बन्दी होना चाहती हैँ। 

कुमार बृहस्पतिमित्र कहता है--मैं वेश्याओं से घिरी हुई देव प्रतिमा 
से घृणा करता हूँ। 

अब बह्मचारी से नहीं रहा गया | उसने कहा--धर्म क्या है और कया 
नहीं है। यह महाकाल मन्दिर का आचार्य महामात्य से सीखना नही चाहता । 

कुमार का क्रोध अब आपे में न रह सका; उसने उच्च केंठ से कहा- 
तो सुनो भोये साम्राज्य की प्रधान नीति धर्म संशोधन की है, अनाचार. 
राष्ट्र में न होने पाएगा । 


१०७ 


भसाद और उनका साहित्य 


ब्रह्मधारी की आँखों से एक बार फिर ज्वाला निकली उसने कहा- 
किन्तु भगवान का ताण्डव उत्य क्या है ? थह तुम नहीं जानते कुमार | उस 
सत्य को रोकने की किसकी क्षमता है तुम्हारी समस्त शक्ति उस शक्तिनाथ 
की विभूति का एक कण मात्र है। बढ़े-बढें साम्राज्य और सम्राद्‌ उसकी एक 
ही दृष्टि में नाश होते हैं, सावधान ), . 

ब्रह्मयचारी का वाक्य पूरा होने भी नहीं पाया था कि कुमार बृहस्पति- 
मित्र को समाचार मिलता है, सम्राद शत घनुष को निवोण पद प्राप्त हो 
गया है । 

उपासकों ने कहा--यह महाकाल का कोप है। 

नरतकी बन्दी होती है और बृहस्पतिमित्र सम्नाट्‌ वसकर पाठलिपुत्र 
की ओर चल पढ़ा । 

इधर हरावती और अभिमित्र के पूर्व श्रेम का रहस्य खुलता है। इरा 
उससे कहती है--क्या बिना मुझसे पूछे तुम रह नहीं सकते १ अभि, मैं 
जीवन रागिनी में वर्जित स्वर हूँ, मुझे छेढ़ कर तुम सुखी न हो सकोगे। 

अभ्रिमित्र कहता ऐ--तुम तो मिछुणी वनने जा रही हो हरा। 

इरा कहती है--देवता के सामने नाच चुकी, भव देखूं अदेवता अनात्म 
अझे कौन सा नाच नचाता है। 

इरावती ने उन भिक्छुणियों के साथ प्रस्थान किया जो दूर श्रांगण में 
उसकी प्रतीक्षा कर रही थीं । 

भिछ्ुणी संघ विहार में, एक दिन इरा चाँदनी रात में अपने दृत्य में 
तन्मय हो जाती है। 


१०८ 


इरावती 


आश्चर्य और कोघ भरे मिछुकों का एक दछ बाहर आया। उन लोगों 
ने देखा सचमुच इरा नाव रही है। सोन्दय का उनमुक्त उछास, उनका कोष, 
उनकी फटकार, क्षण भर के लिए स्थगित हो रही, जैसे वे भी इस अद्भुत 
उन्माद को हृदयंगम कर लेना चाहते थे। 

बौद्ध स्थविर के रुष्ट होने पर इरावती कहती है--मेरे पास उत्य को छोड़ 
कर और है ही क्या १ आज इतने ज्री पुरुष के समारोह में तो अपना कर्तव्य 
समझ कर ही उत्य कर रही थी, यह भी अपराध है, तब तो मुझे छुट्टी दीजिये (- 

इरावती के इस वत्य के कारण मिछुणी संघ की प्रवारणा स्थगित की गई। 

इरावती चुपचाप शिग्ना नदी के तट पर जा कर खड़ी हुई। रात्रि का 
तृतीय प्रहर था, और बह अपने जीवन के अथम प्रहर में थी। रात की निस्त- 
ब्धता उसके हृदय की घड़कन को ओर स्पष्ट करने छगी। 

सहसा वह देखती है, एक छोटी सी नाव चली जा रही है और नाव पर 
महाकाल के ब्रह्मचारी के सामने, दोनों हाथों से डाड़ चलाता हुआ अप्मिमित्र 
बैठा बातें कर रहा है । ब्रह्मचारी कह रहा था--आर्य धर्म का आरम्भिक उल्ला- 
समय स्वरूप यद्यपि अभी एक बार ही नष्ट नही हो गया, फिर भी उसे जगाना 
पढ़ेगा। सर्वे साधारण आरयों में अहिंसा, अनात्म के नाम पर जो कायरता, 
विधवास का अभाव और निराशा का प्रचार हो रहा है, उसके स्थान पर 
उत्साह, साहस और आत्म विश्वास की प्रतिष्ठा करनी होगी। 

अभिमित्र इरा को देखता है। इरा कहती है-मैं तुम्हारे साथ चलना चा- 
हती हूँ, ठहरो नाव रोकी । 

उसी समय उसे कुछुमपुर ले जाने के लिए सम्राट्‌ की आज्ञानुसार कुछ: 


१०९ 


भसाद और उनका साहित्य 


सेनिक आते हैं। इरा नदी में कूद पढ़ती है, अप्निमित्र उसे बचाता है। अन्त 
में दोनों बन्दी हो कर कुछुमपुर जाते हैं और त्रद्मचारी उत्तराखंड भ्रमण 


करने चले जाते हैं। 

उस दिन साम्राज्य परिषदू का विशेष आयोजन था। सम्राट्‌ , बलाधिकृत 
दंडनायक और महानायक सभी अपने उपयुक्त स्थानों पर बैठे थे । फिर छोटी 
बाँसुरी ओर डफूली लिये मगध की नतेकियों का दुक सभामंडप को नूपुर से 
शुंजरित करने लगा। 

करलिंगराज खाखेल का दूत उपस्थित किया जाता है। सम्राट अशोक 
फर्लिंय से जो प्रतिमा लाये थे, उसी को छोटा देने का प्रस्ताव था। 

इसके बाद महादंड नायक पुष्पमित्र का पुत्र अम्रिमित्र बन्दी के रुप में 
लाया गया । सम्राट क्षमा करते हुए उसको मुक्त करते हैं। 

उन दिनों मगध पर युद्ध के बादल मंडरा रहे थे। गान्धार से यवनों के 
आक्रमण की आशंका थी। 

अभ्निमित्र का पिता सैनिक, राज-अनुप्रह का अमिलाषी था। अभ्रिमित्र 
से इरावती के कारण वह रुष्ट था। सम्राट्‌ उसे युद्ध में भेजना चाहते थे; किन्तु 
चह पिता की व्यवस्था के कारण उससे मुक्त होता है । 

भिछुणी विहार की प्राचौरों में से इरावती का उद्धार करने की उधेड्बुन 
में वह गंगातट पर बैठा हुआ विचार मम् था। सहसा कुछ शब्द सुनाई पढा। 
बह उस जीर्ण मन्दिर की ओर बढ़ा । वहाँ' पहुँचने पर उसे यह ज्ञात हुआ 
कि मन्दिर का मरणासन्न पुजारी कोई गुप्त रहस्य छिपाये हुए चला जाना चाहता 
है, और कालिन्दी के बहुत अयल करने पर भी वह स्पष्ट नही करना चाहता । 


११० 


इरावती 


विदिशा के कुलपुत्र युवक अमिमित्र को देख कर पुजारी की उस पर 
विश्वास होता है। वह किसी से यह रहस्य न खोलने की शपथ ले कर अमप्नि- 
मित्र को ताम्रपत्र द्वारा नन्दराज की निधि की कुंजी देता है । 

पुजारी का अन्त होता है। अम्िमित्र कालिन्दी को आख़ासन दे कर 
चला जाता है । 

कुक्कुटाराम के मिछुणी विहार में इरावती के नीरस दिन कट रहे थे । 
इरावती सोचने छगी थी । महाकाल का मन्दिर नही, उसके भी पहिले वैभवती 
का किनारा-जहाँ वह माता का दाह कर्म करने के वाद अकेली शर॒दू की सन्ध्या 
में बेटी थी और अभिमित्र आया था. ..होँ, उसने कहा-इरा तुम व्याकुल न 
होना मैं हूँ न ! तुमको चिन्ता किस वात की है किन्तु ...फिर न जाने 
क्या हुआ कुछ ही दिनों में उसका आना-जाना बन्द हो गया। सुनने में आया 
कि वह घर से लड़ कर परदेश चला गया और मैं पथ की मिखारिणी बनी । 

उसका यह अनमना भाव उसकी दो सखी भिछुणियों के सन्मुख प्रकट 
होता है। उनके पूछने पर वह कहती है-संयम के बन्धन के पीछे काम सुख 
का सहाजल संघात रुका है। रुकने दो, सूखने दो, हिमशिल्ा की तरह कठोर 
शीतल---मैं अचल खड़ी हूँ | सुख के आश्रय मन को ही नष्ट कर दूंगी। 

अपनी दो सखियों के साथ में विहार से वाहर निकल कर इरावती टहल 
रही थी | सहसा अभ्निमित्र का इरावती से सामना होता है। वह दक्षिण के 
युद्ध में नायक बन कर जानें की अपनी बात इरा से कहता है । 

इरा कहती है--युद्ध चर्चा अहिंसा की पुजारिनों से करना अपराध है, 
इस लिए अभिमित्र तुम यश और कीर्ति के लिए जाओ। 


१११ 


असाद और उनका साहित्य 


इरा चली जाती है। लौट कर अप्रिमित्र अपने पिता भहादंदनायक के 
पास जाता है। 

पिता की बातों से अम्िमित्र को पता छगता है कि मिक्छणी विहार के 
पास चकर काटने और ताम्रपत्र वाली बातें भी पुष्पमिन्र से छिपी नहीं हैं । 

पाठलिपुत्र में हलचल मची थी । प्रान्तीय दुर्गों 'से सैनिकों का तांता छूग 
रहा था । 

धर्म विजय की इच्छा रखने वाले सम्राट्‌ बृहस्पतिमित्र, शल्न विजय के 
लिए उत्सुक हैं। महागज पर चढ़ कर नगर पश्चिम द्वार से सेना प्रयाण का 
निरीक्षण कर रहे थे। वीरों के खन्न॒ से सम्राट्‌ की वन्दना हो रही है। बृह- 
स्पतिमित्र इस उत्साह में भी जैसे सशंक हैं। 

मगध पर चारों ओर से आक्रमण की आशंका है। एक तरफ यवनों 
के आक्रमण का भय, दूसरी ओर कलिंग के चक्रवर्ती खारवेछ के चढ़ाई 
करने की आशंका, और तीसरा विद्रोहियों का स्वस्तिक दूछ षड़य॑त्र कर 
रहा था । 

पुष्पमित्र की व्यवस्था के अचुसार ही महासेनानायक युद्ध में गये । अमि- 
मिन्न इस बार भी न गया। 

काहिन्दी की विपन्षता का समाचार सुन कर अग्निमित्र उसके यहाँ जाता है, 
किन्तु वहाँ का दूसरा ही दृश्य देख कर वह समझता है कि यहाँ उसे बुलाने 
का षडयंत्र था। वह कालिन्दी का सौन्दर्य देख कर उस दिन चकित हो गया। 
उसे विश्वास ही न होता था कि वह काहिन्दी है, कालिन्दी अमिमित्र के 
सन्मुख अपना प्रणय प्रस्ताव उपस्थित करती है। अम्रिमित्र को यह भी ज्ञात 


११२ 


च्ज 


इरावती 


होता है कि कालिन्दी मन्दिर को एक परिचारिक्रा ही नही, मगध के विद्व- 
विश्रुत नन्द्राज के वँश की है। 

अभिमित्र कालिन्दी से कहता है-मैं ल्लियों के प्रेम का रहस्य नहीं समझ 
पाया हूँ । मैं अणय के स्वाध्याय में असफल विद्यार्थी हूं । 

कालिन्दी ने अपने को अपमानित समझा, उसके नेत्र छाल हो गये । 
परन्तु रमणी के नेन्न ! उन में अधिक ताप होते ही जल बिन्दु दिखाई पड़े। 
अभिमित्र उसे ताम्रपत्र की अधिकारिणी समझते हुए, उसकी निधि उसको देता 
है । उस दिन सगध साम्राज्य उलटने के षड़यंत्र मे वह कालिन्दी का सहा- 
यक होगा, यह भी वचन उसने दिया । 

वहाँ से लोटने पर रात में शैया पर पड़ा इरावती और कालिन्दी की 
तुलना करता हुआ, वह थकावट के कारण फौरन ही सो गया। 

भिछ्ुणी विहार के द्वार पर एक ब्रह्मचारी शंखनाद करता है। इरावती 
बाहर निकल आती है। वह अपने को आनन्द का धार्मिक प्रचारक बतलाता 
है--अनात्म के वातावरण में पा हुआ यह क्षणिक विज्ञान, उस शाइबत 
सत्ता में सन्देह करता है। मा ! तुम सब शक्तिमयी हो! आनन्द के उल्लास 
को मात्रा ही जीवन है, यह भूल क्यो गई ? 

इरा कहती है-परन्तु मुझे तो अपने कमों पर पश्चाताप की ज्वाला में जलने की 
आज्ञा मिली है। ब्ह्मचारी फिर कहता है--कौन से ऐसे कर्म हैं देवी, जिन्‍हें 
आनन्द की भावना में भस्म नहीं कर सकते ? तुमसे कौन सा अपराध हुआ है ? 

इरा कहती है--मैं नहीं जानती, लोग कहते हैं, मै नाचती थी, आनन्द 
भनाती थी, यही मेरा अपराध हो सकता है। 


छः ११३ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


मिक्लुणी संध विहार के नियमों के उलछंघन होने की आशड्डा के कारण 
इरावती वहाँ से चली जाती है । 

अभिमित्र एक दिन खोजता हुआ वहाँ पहुँचता है, लेकिन वह मिलती 
नही, फिर वह अस्त-व्यस्त होकर काढिन्दी के यहां पहुंचता है । 

कालिन्दी उससे पूछती है--इरावती का पता नहीं छगा न ? 

अमिमिन्न की आश्चर्य होता है कि कालिन्दी को इसका कैसे पता लगा ? 

कालिन्दी फिर अभ्निमित्र से प्रणय याचना करती है; किन्तु वह दृढ़ रहता 
है। उसी समय इरावती को खोजते हुए मन्दिर में कुछ सैनिकों का प्रवेश 
होता है। अग्निमित्र इन्द्र करता है, वह आश्चर्य बरकित होकर इरावती की 
ओर देखता है। 

इरावती कहती है--नहीं मेरे लिए रक्तपात की आवश्यकता नहीं। 
अग्निमित्र विमृढ-सा सोचने लगा । उसके घावों से रक्त बहने लगा, वह मूछित 
हो गया । 

सैनिक इरावती को पकड़ कर ले गये । 

कालिन्दी अग्निमित्र की सेवा में व्यस्त होती है। 

दो वर्षों के बाद विदेश से व्यवसाय करके सेठ धनदत्त घर छोट रहा 
था। कुछुमपुर में कोलाहल था। घनदत्त बड़ी दुखिन्ता में पढ़ा । नगर सामने 
दिखाई पढ़ रहा है। सन्ध्या हो चली है। उसके पास रत्नों का ढ़ेर है। वह 
अपने नौकर चन्दन पर चिढ़ रहा था। उसी समय एक व्यक्ति से उसे यह 
ज्ञात होता है कि उसकी पत्नी सणिमाला नगर में उपद्व के कारण चाहर 
चली गई है। 


११४ 


शक 


इरावदी 


रात घनी होती जा रही थी। अब पथिकों का आना-जाना बन्द हो गया 
था। उसी समय दो सैनिकों के साथ वाहकों ने शिविका को चेत्य ऋक्ष की 
छाया में रख दिया। वे विश्राम करने छगे | धनदत्त भी वही था । 

कुछ समय बाद त्रह्मचारी आता है। शिविका में पढ़े हुए घायल रोगी 
को बूटी द्वारा लाभ पहुँचाता है। स्वस्थ्य होने पर रोगी आश्चर्य से ब्ह्मचारी 
को देखते हुए कहता है--प्ुरुदेव ! 

अह्मचारी कहता है---अग्निमित्र ! 

कुछ समय याद्‌ एक बैलगाड़ी और साथ में शिविका लिये हुए कुछ लोग 
फिर उसी वृक्ष के नीचे आये, जैसे रात वहीं बिताने का उन छोगों ने निश्चय 
कर लिया था। 

शिविका में से एक ल्ली निकल कर आलोक के सामने आई। 

धनदत्त ने उसे पहिचाना,वह उसकी पत्नी मणिमाला ही थी । 

धनदत्त उसे अविर्वसनीय समझ कर सन में घृणा कर रहा था। 

घटनाक्रम के अनुसार पुष्पमित्र भी वही पहुंचता है । वह रुष्ट होकर 
अम्निमित्र से बातें करता है। 

पुष्पमित्र की आज्ञाबुसार धनदत्त ओर उसकी पत्नी सब सम्पत्ति के 
साथ सैनिकों द्वारा अपने घर पहुंचाये गये । 

अग्निमित्र अपने पिता के साथ धीरे-धीरे शिविर की ओर 
अग्रसर हुआ। 

इरावती अब सगरघ देश की विशाल र॑ंगशाला में आप हेँंसती है । 

सप्राट्‌ एक दिन उसके सन्मुख बैठ कर श्रणय याचना करता है। वह 


११५ 


असाद और उनका साहित्य 


कहता है--तुम्हारा उत्य देख कर मैं मुग्ध हो गया हूं, मेरे हृदय की ज्वाला 
हुम्हीं बुझा सकती हो । 
वृहस्पतिमित्र उसका आलिंगन करना चाहता है । इरा मूछित हो जाती 
है। ठीक उसी समय भ जाने कैसे कालिन्दी वहों आकर उसको सहायता 
करती है। अन्त में जब उसे यह प्रकट होता है कि इरा के ऊपर अत्याचार 
करने वाला स्वयं सम्राट्‌ है तो वह भयभीत हो उठती है। सम्राट के यह 
पूछने पर कि तुम यहाँ कैसे आई, वह अपने इस अपराध के लिये क्षमा 
मांगती है। 
घनद्त्त के मन में मणिमालछा के प्रति सन्देह था; किन्तु एक दिव जब 
चन्दन द्वारा विदेश में धनदत्त का राजगणिका के यहाँ जाने का रहस्य मणि- 
साला को प्रकट होता है तो वही सन्देह अब समझौता वन कर उपस्थित 
होता है। 
मणिमाला स्वतंत्र विचार की थी। उसे बन्धन नही चाहिये जो कुछ हो 
गया, हो गया। उसके लिये इतनी तनातनी क्यों ? चरित्रों से मनुष्य नहीं 
बनते; मनुष्य चरित्रों का निर्माण करते हैं, यही उसकी धारणा थी। 
घटनाक्रम के अनुसार दो रमणियाँ धनदत्त के यहाँ कुछ रल और मुक्ता 
खरीदने के लिये आई । उसके इस अपूर्व संग्रह को देख कर एक कहती है-- 
सचमुच मुक्ताओ का ऐसा संग्रह दुर्लभ है, श्रेष्ठ ! कुछुमपुर को तुम्हारे ऊपर 
गये होना चाहिये। 
मणिमाला भी वही आकर खडी हो जाती है, अहाचारी भी वहीं 
उपस्थित होता है। अह्यचारी एक रमणी की देख कर कहता है- 


११६ 


इरावती 


अरे तुम बौद्ध विहार से निकल कर यहाँ चली आई हो ! कैसे १ किन्तु ठीक 
है, मिथ्या संसार से मुक्त हो कर तुम वास्तविक जगत में आ गई हो देवी ! 

कल्याणी ने इरावती के लिये कुछ रत्न ओर मुक्ताओं को खरीद कर मूल्य 
दे दिया । 

मनसाना दाम मिलने पर वणिक धनदत्त प्रसक्ष हो उठा। उसने उस द्नि 
अपने ही यहाँ उन्हें भोजन का निमंत्रण दिया । उसी समय एक ओर ग्राहक 
धनदत्त के यहाँ आता है। 

धनदत्त को ज्ञात होता है कि वह युवक कलिंग का राजपुत्र खारबवेल हे, 
और वह भगवान्‌ अग्नजिन की प्रतिमा के लिए उत्तम वज्न मणि लेने आया है। 
धनदत्त को कलिंगराज से यथेष्ट स्व मुद्रायें प्राप्त हो गई। उसने उन्हें भी 
उस रात्रि के उत्सव में सम्मिलित होने का अनुरोध किया। आकाश में काली 
शटाएं उठी थी। मार्ग की कठिनाई के कारण खारबेल ने भी धनदत्त का निम्म- 
त्रण स्वीकार कर लिया । उसी समय अभिमित्र भी वहाँ पहुँचता है । उसे 
देख कर धनदत्त कहता है--इस वो में भी निमंत्रण की रक्षा करने आने के 
लिए मैं आपका इतज्ञ हूं, महानायक अभ्िमित्रु 

एक बड़े से चोकोर मंडप में जिसके सुन्दर स्तम्भ मंजरियों और कुछुमों 
की सालाओं से सजे थे, कोमल काइ्मीरी कम्बलों पर बड़े-बड़े तकियों के सहारे 
सणिमाला, कालिन्दी ओर इरावती बैठी थीं। एक अह्मचारी भी निर्लिप्त जेसा 
बैठा, नीचे की अमराई का अन्धकार देख रहा था। सामने वीणा और सृदंग 
के आगे गायक दल का समारोह था, वीणा गुल्नरित हुई । स्दंग पर थाप पड़ी। 
पास के ही कक्ष में भोजन परोसा जा चुका था। 


११७ 


असाद और उनका साहित्य 


सब छोयों के सोजन कर लेने के बाद सणिमाला के अनुरोध पर युवक कलिं- 
मराज वीणा बजाने छगता है और इरावती अपना चत्य कौशल दिखलाती है। 

अप्रिमित्र एक बार जैसे झलमलाया; किन्तु मन ही मन कुछ सोचकर 
शान्त बेठा रहा । 

खाखेल ने ऐसा सुन्द्र छृत्य कभी देखा न था। उसने वीणा को विराम 
देते हुए, साधुवाद से उस नतेकी का सत्कार किया; किन्तु इरावती अब ठीक 
अम्रिमित्र के सामने बैठ गई थी । 

कलिंगराज श्रसज्ञ होकर इरावती की अपनी एकावली देने लगता है; किन्तु 
कालिन्दी के यह कहने पर कि अथिति के मनोरंजन करने में पुरस्कार का 
प्रलोभन नही रहता, वह अस्वीकार करती है। 

अम्निमित्र खारवेल से प्रसन्न होकर कहता है--भहाराज मैं वचन देता हूं, 
महानायक अभिमिन्न के जीवित रहते आप निश्विन्त रहें । 

धनदत्त के ग्रह के बाहर बहुत से मनुष्य काले वल्चों में अपने को ढंक कर 
सशजञ्र घूम रहे थे। क्षण भर में खन्न चमकने लगे और घनदत्त अप्रिमित्र के 
इस रक्षा की व्यवस्था को देख कर घवरा गया था। अभी बूंदे पड़ रही थीं। 
आकाश निविड़ क्ृष्णवर्ण का हो रहा था । कालिन्दी, इरावती और केयूरक के 
साथ खारवेल भी वही चले आ रहे थे । 

इरावती को प्रसाद जी छोटा उपन्यास ही बनाना चाहते थे, 
यह घटना क्रम को देखते हुए भलीभति ज्ञात होता है। उन्होने 
जितना लिखा, उतने में ही अधिकांश चरित्र क्छाइमैक्स पर पहुँच 
जाते हैं | धनदत्त के यहाँ सभी प्रमुख पात्र एकत्रित होते हैं । इरावती 


श्श्८ 


हरावती 


के नृत्य के वाद कथानक इतनी तीत्र गति से आगे बढ़ता है कि तीन 
चार परिच्छेदों से आगे बढ़ने की सम्भावना नहीं दिखलाई पड़ती । 

अग्निमित्र का चरित्र ठोस होने के कारण इरावती को अपना 
बना लेने की सम्भावना स्पष्ट है। 

मेरे अनुमान के अनुसार आगे चार परिच्छेदों का क्रम इस 
प्रकार हो सकता था | 

( १ ) बोद्ध स्थविर की छलनीति । मगध के भाग्य का निर्णय । 

(२ ) कालिन्दी और खारबेल । 

( ३ ) अप्निमित्र और इरावती। 

(४ ) धनदत्त और मणिमाला । 

कालिन्दी और इरावती के मानसिक इन्ह, द्याग और कट्ठो 
को देखते हुए यह भी अनुमान किया जा सकता है कि उनका 
अन्त आश्त्रद और सुखद होता । 

सम्राट्‌ वृहस्पतिसिनत्र का अन्त केसा होगा, इस सम्बन्ध में 
मैंने इतिहास की सामग्री नहीं देखी है, फिर भी सम्राट की काय- 
रवा और विलासिता को देखते हुए कहा जा सकता है कि उसका 
विध्वंस खाभाविक है। वृद्ध महासेना नायक का अन्त होता है। 
अप्निमित्र, काढिन्दी और स्वास्तिक दल, विद्रोह की ज्वाला प्रज्व- 
लित कर रहे हं। उधर यवनो का आक्रमण हो रहा है! इन सब 
घटनाओ को देखते हुए सम्राद के अन्त का केवल अनुमान किया 
जा सकता है। 





११९ 


हल #न 


आधुनिक कहानी-लेखकों में ऐतिहासिक दृष्टि से भी प्रसाद 
जी का प्रथम स्थान है। मधुकरी का संग्रह करते समय 
सभी लेखकों का रचनाक्रम मैंने बनाया था। प्रसाद जी की १९११० 
में पहली कहाली 'भास! इन्दु में श्रकाशित हुई थी। इसी लिए रचना- 
क्रम के अनुसार, प्रसाद जी की कहानियों सब से पहले दी गई थीं। 
प्रसाद जी ने किसी उद्देश अथवा प्रोपोगण्डा के लिए कहा- 
नियाँ नहीं लिखीं। उनके मन में भावनाएँ उठीं और उन्होंने कहा- 
निया रिखीं, उनकी अधिकांश कहानियाँ सावात्मक हैं। भावा- 
त्मक कहानियों को कहानी-कछा की कसौटी पर कसना कठिन 
है। अपनी तृलिका की प्रस्तावना सें मैंने छिखा था-छुछ छोग 
सर बालकों की तरह कहानी-लेखक से जानना चाहते हैं। हाँ 
तो उस राजा ने तीन रानियों से क्यों ब्याह किया ? उसकी जीव- 
नचया कैसी थी ! क्योंकर निभती थी ? वे एक एक पछ का लेखा 
भागने छगते हैं । 


१२० 


कहानियाँ 


प्रसाद जी ने स्वयं अपनी नीरा कहानी भे एक स्थान पर लिखा है--- 
जैसे एक साधारण आलोचक प्रत्येक लेखक से अपने मन की कहानी कह- 
लाया चाहता है और हठ करता है कि नृहों, यहाँ तो ऐसा न होना चाहिये था ए 

भावात्मक कहानियाँ कोई सीख कर नहीं लिख सकता, उसके 
लिए कोई नियम अथवा सिद्धान्त आवश्यक नहीं हैं। एक वार 
किसी महिला ने भ्रीरवीन्द्रनाथ ठाकुर से पूछा था--आपने अमुक 
कहानी को फिस मतलूव से लिखा । आपका उद्देश्य क्या था ? 

रवीन्द्र वाबू ने उत्तर दिया-कहानी लिखने का उद्देय कहानी 
लिखना है। में कहानी इस लिए लिखता हैँ कि कहानी लिखने की मेरी इच्छा 
होती है। किसी मतलब से कहानी नहीं लिखी जाती... .. साहित्य विज्ञान 
नही और न वह धर्मशास्र ही है। यदि उसमे कुछ निधोरित नियमों के अनु- 
सार ही पात्रों के चरित्र अंकित किये जायें तो वह चित्र प्राणहीन होगा। 
सम्भव है, वह नेतन्नरंजक हो, पर इसमे हम जीवित संसार का आदर्श न 
, देख सकेंगे। 

अतणव भावात्मक कहानी-छेखक किसी की प्रशंसा अथवा 
निन्‍्दा की परवा नहीं करता । वह अपनी ही धुन में झूसता चला 
जाता है। कवि प्रसाद ऐसे ही कहानी-लेखक थे । 

प्रसाद जी ने अपने जीवन में ६९ कहानियों लिखीं। उनके 
पाँच कहानी संग्रह-छाया, प्रतिथ्वनि, आकाशदीप, आँधी, और 
इन्द्रजाल-प्रकाशित हो चुके हैं, उनकी पहली कहानी भ्राम और 
अन्तिम सालवती है । 


१२१ 


असाद और उनका साहित्य 


प्रसाद जी की पहली कहानी आम में ही हम भलीमाति देख 
पाते हैं कि क़्े का दुष्परिणाम उनके मस्तिष्क में मेंडरा रहा था। 
क्वी कहने लगी--हमारे पति इस प्रान्त के गण्य भूस्वामी थे ओर पंश 
भी हम छोगों का बहुत उच्च था। जिस गाँव का अभी आपने नाम लिया है, 
वही हमारे पति की प्रधान जुमीदारी थी। कार्यवश एक कुन्द्नलाल नामक 
महाजन से कुछ ऋण लिया गया । कुछ भी विचार न करने से उनका बहुत 
रुपया बढ़ गया, और जब ऐसी अवस्था पहुंची तो अनेक उपाय करके हमारे 
पति धन जुटा कर उनके पास ले गए तब उस धू्त ने कहा--क्या हज है 
बाबू साहव | आप आठ रोज में आना, हम रुपया छे छेगें ओर जो घाटा 
होगा, उसे छोड़ देगें। आपका इलाका फिर जायगा, इस समय रेहननामा भी 
नही मिल रहा है।' उसका विश्वास करके हमारे पति फिर बैंठे रहे, और उसने 
कुछ भी न पूछा। उनकी उदारता के कारण वह सश्चित धन भी थोड़ा हो 
गया, और उधर उसने दावा करके इलाका-जो कि वह ले लेता चाहता था- 
बहुत थोडे रुपये में नीलाम करा लिया। फिर हमारे पति के हृदय में उस 
इलाके के इस भेंति निकल जाने के कारण बहुत चोट पहुंची । इसौसे उनकी 
मृत्यु हो गई । इस दशा के होने के उपरान्त हम छोग इस दूसरे गोंद में आ 
कर रहने लग्गी। 
आस! से उत्तकी पहली कहानी की एक पात्री केवछ एक छाया 
की तरह प्रकट होती है। उसका विकास नहीं होता । 
बालिका की अवस्था १५ वर्ष की है। आलोक से उसका अन्न अन्धकार 
घन में विद्युेखा की तरह चमक रहा था। यद्यपि दरिद्रता ने उसे मलिन 


श्श्२ 


क्ट्टानियाँ 


कर रक्खा है, पर ईश्वरीय सुपमा उसके कोमल अज्न पर अपना निवास 
किये हुए हैं । 

अपनी अन्तिम कहानी में भिन्न-भिन्न'ल्ली चरित्रों के चित्रण 
करने के बाद प्रसाद जी ने 'सालवती”' का बड़ा उज्जवल चित्र 
प्रस्तुत किया है. । 

आज जैसे उसने यह अनुभव किया कि नारी का अभिमान अकिंचन है। 
वह मुग्धा विलासिनी, अभी-अभी संसार के सामने अपने अस्तित्व को मिथ्या 
माया, सारहीन समझ कर आई थी। वह अपने सुवासित अलकों को विखेर 
कर उन्हीं में अपना मुँह छिपाये पडी थी। 

प्रसाद जी ने स्ली-चरित्रों में प्रतिहिंसा की ज्वाला का अनोखा 
चित्रण किया हैं। उनकी आरम्मिक कहानी “चन्दा' में इसका 
बीजारोपण होता है, नारी के कोमल हृदय में कठोरता का प्रवेश 
होता है । 

चन्दा ने कहा--हां लो में मरती हूँ। इसी छुरे से तूने हमारे सामने 
हीरा को भारा था, यह वही छुरा हे, यह तुझे दुख से निश्चय छुडायेगा--- 
इतना कह कर चन्दा ने रामू की वगल में छुरा उतार दिया वह छटपटाया, 
इतने ही में शेर को मौका मिला, वह रामू पर हट पडा औरउस की इति कर 
आप भी वहों गिर पढ्ा । 

चन्दा ने अपना छुरा निकार लिया और उसको चादनी में रंगा 
देखने लगी। 

फिर खिलखिला कर हँसी ओर कहा--<दरद दिल काही सुनाऊँ प्यारे ए 


श्र्रे 


प्रसाद और उनका साहित्य 


फिर हँस कर फहा--हीरा तुम देखते होगे, पर जब तो यह छुरा ही दिल की 
दाह सुनेगा । इतना कहकर अपनी छाती में छुरा भोंक लिया । 

प्रतिहिंसा का यही परिष्कृत रूप हम आगे चलकर “आकाश- 
दीप! में चस्पा के चरित्र में देखते हैं। 

पेझ्वास ? कदापि नहीं बुद्धयुप्त ! जब मैं अपने हृदय पर विज्वास 
नहीं कर सकी, उसी ने धोखा दिया, तब कैसे कहूँ। में तुम्हें घृणा करती हूँ। 
फिर भी तुम्हारे लिए मर सकती हूँ, अन्येर है जल-दस्यु | में तुम्हें प्यार 
करती हैँ । चम्पा रो पड । 

प्रसाद जी की समस्त कहानियों से मंगछा का चरित्र बढ़ा 
विकक्षण हुआ है। 

मंगला का साथी शराब पी कर बेहोश पड़ा है। वह मुरली से आकर 
कहती है--अच्छा तो सुनो, मैं इस पशु से अब ऊब गई हूँ। मुझे यहाँ से 
ले चले | 

'ल्लौन्‍जीवन की भूख कब जग जाती है; इसको कोई नहीं जानता; मान 
हैने पर तो उसको बहाली देना असम्भव है। उसी क्षण को पकड़ना पुर्षा है। 

मुरली निश्चय नहीं कर पाता । 

'ुप्त डरते हो न! यह कह कर संगला ने कमर से छुरा निकाल ठिवा-- 
अभी झगड छुद्वए देती हूँ” वह झोपड़ी की ओर चली । 

देखिये, केवल दो छाइनों में ही इस कथा का तत्त्व छिपा है- 
देवता छाया बना देते हैं । मुष्य उसमें रहता है, और मुझनसी राक्षती उसमें 
आश्रय पा कर भी उसे उजाड़ कर ही फेंकी दै !' ( चित्र वाले पत्थर ) 


१२४ 


कद्दा निर्या 


प्रसाद जी का द्वितीय कहानी-संग्रह अतिध्वनि! नाम से 
निकछा था । उनकी भावात्मक कहानियों का आरम्भ इसी संग्रह 
से होता है। 

“अकस्मात्‌ आरती बन्द हुई। सरला ने जाने के लिए आशा का उत्सर्ग 
करके एक वार देव-प्रतिमा की ओर देखा। देखा, उसके फूल भगवान्‌ के 
अन्न पर सुशोमित हैं । वह ठिठक गई। पुजारी ने सहसा घूम कर देखा, और 
कहा--“अरे तुम | अभी यहां हो ? तुम्हें प्रसाद नहीं मिला ? लो। जान में 
या अनजान मे, पुजारी ने भगवान्‌ की एकावली सरला के नत गले में ढाल 
दी | प्रतिमा प्रसन्न हो कर हँस पडी ।! 

प्रतिध्वनि 'कहानी-संग्रह” की इस प्रथम कहानी का शीपक 
है-प्रसाद । प्रतिमा प्रसन्न होकर हँस पड़ी-यहीं से हम भावा- 
त्मक कहानी का सूत्र छेकर आगे चलते हैं । 

प्रसाद जी भावात्मक कहानियों का जो निर्माण करते हैं, 
उसका अंकुर इसी संग्रह से आरम्भ होता है। 

उदाहरण के लिए कुछ अंश यहाँ उद्धत किया जाता है-- 

“आप लोग अमीर आदसी हैं। अपने कोमल श्रवर्ेन्द्रियों से पत्थर का 
रोना, लहरों का संगीत, पवन की हँसी इत्यादि कितनी ही सूक्ष्म वातें चुन लेते 
हैं, ओर उसकी पुकार में दत्तचित्त हो जाते हैं। करुणा से पुलकित होते हैं। 
किन्तु क्या कभी दुखी हृदय के नीख कन्दन को भी अन्तरात्मा को श्रवणे- 
न्दिय को सुनने देते हैं, जो कहणा का काल्पनिक नहां, किन्तु वास्तविक रूप 
है ( पत्थर की पुकार ) 


श्र५ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


“यन्द्र-किरणों और लहरियों को बातचीत करने का एक आधार मिला ! 
( उस पार का योगी ) 

“हा, और यह भी कह देना कि तुम सरीखी अविश्वासिनी ब्रियों से मैं 
ओर भी दूर भागना चाहता हैं, जो प्रलय के समुद्र की प्रचण्ड ऑँधी में एक 
जजेर पोत से भी दुर्बंछ और उस डुवा देने वाली लहर से भी भयानक है।' 
( खंडहर की लिपि ) 

'कलावती फिर लौटी और एक चीनी की पुतछी लेकर उसे पढाने वेठी । 
देखो, मैं तुम्हें दो चार वातें सिखाती हूँ। उन्हें अच्छी तरह र॒ट लेना। 
लरूज़ा कभी न करना। यह पुरुषों की चालाकी है, जो उन्होंने इसे ल्ियों के 
हिस्से में डाल दिया। यह दूसरे शब्द में एक प्रकार का भ्रम है, इसलिये 
तुम भी ऐसा हूप धारण करना कि पुरुष, जो बाहर से अनुकम्पा करते हुए, 
तुम से भीतर-भीतर घृणा करते हैं, वे भी तुम से भयभीत रहें, तुम्हारे पास 
आने का साहस न करें । और इतज्ञ होना दासत्व है। चतुरों ने अपना कार्य 
साधन करने का अन्न इसे वनाया है । इसलिये इसकी ऐसी प्रशंसा की है कि 
लोग इसकी ओर आकर्षित हो जाते हैं, किन्तु यह दासतल शरीर का नहीं, 
अन्तरात्मा का है ******* प्यारी पुतली समझी न !! ( कलावती की शिक्षा ) 

प्रतिब्वनि की पन्द्रहवीं कहानी 'प्रकय” को मैं प्रसाद जी की 
प्रथम रहस्यवादी कहानी भानता हूँ । 

युवक सणि-पीठ पर सुखासीन होकर आसव पान कर रहा है। थुबती 
अस्त नेत्रों से इस भीपण व्यापार की देखते हुए भी नहीं देख रही है। जवा- 
कुसुम सह्ण और जगत्‌ का तत्काल तरल पारद समान रंग बदलना, भयानक 


श्श्द 


कहानियाँ 


होने पर भी युवक को स्ट्ृहणीय था। वह सस्मित बोला-भ्रिये कैसा 
द्श्य है 

“इसी का ध्यान करके कुछ लोगों ने आध्यात्मिकता का प्रचार किया 
था ९ युवती ने कहा । 

बड़ी बुद्धिमती थी |” हँस कर युवती ने कहा । वह हँसी अहगण की 
टक्कर के शब्द से भी कुछ ऊँची थी। 

व्क्यों ९! 

'प्ररण के कठोर सत्य से बचने का बहाना या आढ़ / 

पप्रेये ऐसा न कहो ।' 

'मोह के आकस्मिक अवलम्ब ऐसे ही होते हैं ।” युवक ने पात्र भरते 
हुए कहा। 

(इसे में नही मार्नेंगी' दृढ होकर युवती बोली । 

सामने की जलराशि आलोढ़ित होने लगी । असंख्य जल-स्तम्भशज््य 
मापने को ऊेचे चढ़ने छगे। कण-जाल से कुहासा फैला । भयानक ताप पर 
शीतलता हाथ फेरने छगी । युवत्ती ने और भी साहस से कहा--क्या आध्या- 
त्मिकता भोह है । 

“ैतनिक पदार्थों का ज्वार-भॉटा है। परमाणुओं से भ्थित प्राकृत निय॑- 
न्रण शैली का एक विन्दु अपना अस्तित्व वचाये रखने की आशा में मनोहर 
कल्पना कर छेता है। विदेह होकर विश्वात्ममाव की ग्रद्याशा, ही छुद्र अवयव 
में अन्तर्निहित अन्त करण यंत्र का चमत्कार-साहस है, जो स्वयं नर 
उपादानों को साधन वना कर अविनाशी होने का स्वप्न देखता है। देखो, 


श्र्७ 


घसाद और उनका साहित्य 


इसी सारे जगत्‌ की लय की लीला में तुम्हें इतना सोह हो गया है ? 

अछय! की श्रेणी की प्रसाद जी की तीन कहानियाँ और हैं-- 
ज्योतिष्मती, कछा और रमछा | ये चारो कहानियाँ अन्य कहा- 
नियो-से मिन्न हैँ और किसी अज्ञात रहस्य की डोर में बँधी हुई 
मातम पड़ती हैं । 

ज्योतिप्मती--साहसिक अपनी सफलता पर प्रसन्ष होकर आगे वढना 
चाहता था कि बनलता ने कहा--ठहरो, ठहरो, जिसने चन्द्रशालिनी ज्योति 
ज्यती रजनी के चारो पहर कसी विना पलक लगे पिय की निश्वलल चिंता में न 
विताये हों, उसे ज्योतिष्मती न छूना चाहिये । 

वनलता की इन चातों की बिना सुने हुए वह वलिप्ठ युवक अपनी तल- 
वार की मूठ छढता से पकड कर वनस्पति की ओर अग्नसर हुआ | साहसिक 
की रूम्बी छाया ने ज्योतिष्यती पर पढ़ती चन्द्रिका को दँक लिया। वह एक 
दौध निवास फेंक कर जैसे सो गई । 

बनलता झंझावात से मम्न होते हुए दक्ष की चनलता के ससान बंसुधा 
का आलिट्नन करने लगी और साहसी थुवक के ऊपर कालिमा की लहरें टक- 
रोने लगीं । 

कछा--नगर में आज बड़ी घुमधाम है। जिसे देखो, रंगशाला की 
ओर दौडा जा रहा है' ७००००० कंगाल स्सदेव भी 

कवि रसदेव ने अपने साथी से हँसते हुए कहा--इसक्की अन्तिम और 
मुख्य पदावली यह भूछ गई। उसका अर्थ है--मेरी भूल ही तेरा रहस्य है। 
इसछिये कितनी छी कल्पनाओं में तुझे खोजता हैँ, हे मेरे चिर सुन्दर । 


श्र्८ 


कहानियाँ . 


रमला--प्रशान्त रमला में एक चमकीला फूल हिलने लगा, साजन ने 
आँख उठा कर देखा--पहाडी की चोटी पर एक तारिका रमला के उदास भाल 
पर सौभाग्य चिह सी-चमक उठी थी। देखते-देखते रमछा का वक्ष नक्षत्रों 
के हार से सुशोभित हो उठा । 

साजन ने उछास से पुकारा--रानी । 

प्रसाद के द्वितीय कहानी-संग्रह प्रतिध्वत्ति भें केवछ तीन 
कहानियॉ--गूदुड़ साईं, कलावती की शिक्षा और प्रत्य-को छोड़ 
कर शेप सभी कहानियाँ साधारण कोटि की हैँ । उनमें कहानी 
के सभी आवश्यक गुण नहीं दिखाई पड़ते | रहस्यवादी कहा- 
नियों का आरम्भ इन कहानियों से होता है। 

“इस चौथडे को लेकर भागते हैं भगवान्‌ और मैं उनसे लड़ कर छीन 
लेता हूँ; रखता हूँ फिर उन्हीं से छिनवाने के लिए, उनके मनोविनोद के 
लिए, सोने का खिलोना तो उचके भी छीनते हैं; पर चीथडों पर भगवान्‌ ही 
दया करते हैं ।” ( गूदडसाई ) 

लहरें क्यों उठती और फिर विलीन होती हैं ? बुदुबुद॒ और जल राशि 
का क्‍या सम्बन्ध है ? मानव जीवन बुद्बुद है कि तरह १ बुदूबुद है तो 
विलीन हो कर फिर क्यों प्रकट होता है ? मीन अंश फेन कुछ जल विन्दु 
से मिल कर बुदूबुद का अस्तित्व क्यों बना देता है। क्या वासना और शरीर 
का भी यही सम्बन्ध है ? वासना की शक्ति कहा-कहोँ किस रुप मे अपनी 
इच्छा चरितार्थ करती हुई जीवन को अम्त गरल का संगम बनाती हुई, अन- 
न्तकाल तक दौड़ छगावेगी ? कभी अवसान होगा, कभी अनन्त जलराशि मे 


६ १२५ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


विलीन हो कर अपनी अखण्ड समाधि लेगी । ( अघोरी का मोह ) 

“बन्द किरणों और लहरियों को वातचीत करने का एक आधार मिला।' 
( उस पार का योगी ) 

आकाश-दीप प्रसाद का तीसरा कहानी संग्रह है। इस संग्रह 
में १९ कहानियाँ हैं। कछा; ज्योतिष्मती, और रमछा इन तीन 
रहस्यवादी कहानियों को छोड़ कर अधिकांश कहानियाँ भावा- 
त्मक हैं । 

स्वर्ग के खण्डहर में--असाद ने एक ऐसे स्वर्ग की कल्पना की है, जो 
वैसे वालों का स्वप्न संसार है। जहाँ के बाह्य संसार से अलग पढ़े मनुष्य अपनी 
वासनाओं तथा ऐश्वर्य बिछास को पूर्ण करने के लिए सब प्रकार का प्रयत्न करते 
हैं। शेख उस स्वर्ग का जन्मदाता है। 

इस कहानी में सात पात्र-पात्रियों का चरित्र-विकास हुआ है। गुल, मीना 
भर बहार के क्रीडा और अन्तर्ईन्द्र के साथ कहानी चलती है। शेख, देवपाल 
रूजा और विकम कहानी के मूल रूप रेखा में छिपे हैं । 

यह कहानी घटना प्रधान है, ऐतिहासिक सून्न में बॉव कर प्रसाद ने . 
इसका छाट बड़ा सुन्दर चनाया है। गुल देवपाल का पुत्र है, जो घटनाक्रम 
के अनुसार इस स्वर्ग में आता है और भोना विकम की पुत्री है। छजा देव" 
प्रालल की प्रणयिनी है । 

सब तरह का सुख और विलास को वस्तु अप्त होते हुए भी कोई इसमें 
सन्तुष्ट नहीं। गुल मन ही सन कहता है--मैं क्या करेँ! सव मुझसे रुठ - 

जातें हैं। कही सहृद्यता नहीं । मुझसे सब अपने मन की कराना चाहते हैं। 


१३० 


कहानि पा 


जैसे मेरे सन नहों है। हृदय नहीं है ! प्रेम आकर्षण ! यह स्वर्गीय प्रेम में 
भी जलन ! बहार तिनक कर चली गई, मीना ? वह पहले ही हट रही थी; 
तो फिर क्या जलन ही स्वर्ग है !?* * 

है हडग न बहार ने एक दिन गुल से कहा--चलों द्वाक्षा-मण्डप मे संगीत 
का आनन्द लिया जाय ।' दोनों स्वगोंय मद्रा मे झूम रहे थे। मीना वहाँ 
अकेली बेठी उदासी में गा रही थी । 

धही स्वग तो नर॒क है, जहों प्रिय जन से विच्छेद है । वही रात प्रय 
की है, जिसकी कालिमा में विरह का संयोग है। वह योवन निष्फल है, जिस- 
का हृदयवात्‌ उपासक नही । बह मदि्रि हलाहल है, पाप है, जो उन मधुर 
अधरों की उच्छिष्ट नहीं। वह प्रणय विषदुझी छुरी है, जिसमें कपट है । इस 
लिए हे जीवन ? तू स्प्त न देख, विस्मृति की निद्रा मे सो जा ! सुपुप्ति यदि 
आनन्द नही, तो दु खों का अभाव तो है। इस जागरण से--इस आकाक्षा 
और अभाव के कारण से, वह निहंन्द्र सोना कहाँ अच्छा है, मेरे जीवन !? 

बहार का साहस न हुआ कि वह उस मंडप में पैर धरे, पर गुल, पह 
तो जैसे मूक था । अपराध ओर मनोवेदना के निर्जन कानन में भटक रहा था, 
यद्यपि चरण निश्चल थे । इतने में हलचल मच गई, चारो ओर दौड़ धूप होने 
लगी। माछ्म हुआ, स्वर्ग पर तातार के ख़ान की चढ़ाई हुई है। 

स्वर्ग का ध्वंस हुआ । 

सेनापति विक्रम को उस प्रान्त का शासन मिला; पर मीना उन्हीं स्वर्ग 
के खंडहरों में उन्मुक्त घूमा करती । जब सेनापति बहुत स्मरण दिलाता, तो 
तरह कह देती--मैं एक भटकी हुई वुलबुल हूँ, मुझे किसी दुगी डाल पर अंधकार 


१३१ 


असाद और उनका साहित्य 


बिता लेने दो ! इस रजनी-विश्राम का मूल्य -अंतिम तान सुना कर जाएँगी? 

माहछ्म नहीं, उसकी अंतिम तान किसी ने सुनी या नही । 

इस कहानी के सम्बन्ध में महाराजकुमार रघुवीर सिंह के इस कथन से 
मैं पूर्ण सहमत हूँ कि 'यह वह कहानी है, जिसको अपने साहित्य कोष में देख 
कर भत्येक हिन्दी भाषाभाषी को गये होना चाहिए । 

आकाददीप--प्रसाद जी की यह कहानी पूर्ण रूप से भावनात्मक है। 
इसमें प्लाट थोढ़ा है और चरित्र-चित्रण अधिक । संक्षेप में-चम्पा एक क्षत्रिय 
वालिका है। उसके पिता वणिक्‌ सणिभद्र के यहाँ श्रहरी का काम करते थे । 
जलदस्यु बुद्धगुप्त ने जब आक्रमण किया, तव चम्पा के पिता ने ही सात दस्युओं 
को मार कर जल-समाधि ली। वणिक्‌ सणिभ्द्र की पाप वासना ने चम्पा को 
बन्दिनी बनाया । 

बुद्धग॒प्त क्षत्रिय था। लेकिन दुर्भाग्य से जलद॒स्यु वन कर जीवन बिता 
रहा था। बन्दी अवस्था में वन्दिनी चम्पा से उसकी भेंट हुई। दोनों कीशल 
से स्वतंत्र हो गये । 

चम्पा के संसग में आने पर बुद्धगुप्त का पत्थर-सा हृदय एक दिन सहसा 
चन्द्रकान्त मणि-सा द्रवित हुआ । माया, ममता ओर स्नेह-सेवा की देवी चम्पा 
भी जलदस्थु को प्यार करने लगती है। साथ ही वह बुद्धगुप्त से घ्णा भी 
करती है; क्योंकिवह समझती है किवही उसके वीर पिता की झुत्यु का निष्ठर 
कारण है । 

बुद्धनुप्त कहता है--मैं तुम्हारे पिता का घातक नहीं हूँ चम्पा | वह एक 
दस्यु के शत्त से मरे । 


श्श्र्‌ 


कहानियाँ 


कम्पित स्वर में चम्पा वोली--यदि में इसका विश्वास कर सकती ! 
बुद्धगुप्त ) चह दिन कितना सुन्दर होता, वह क्षण कितना स्पृहणीय ! 

बुद्धगुप्त अनुभव करता है कि वह चम्पा के पास रह कर अपने हृदय 
पर अधिकार न रख सकेगा, इस लिए वह भारतवर्ष लोट जाता है । 

विसाती-शौरी, जुलेखा की सखी है। अपना अवशगुंठन उलठते हुए 
जुलेखा ने कहा--शौरी ! वह तुम्हारे हाथों पर आकर बैठ जाने वाला घुलघुल 
आजकल नही दिखलाई देता १ 

आह खीच कर शौरी ने कहा-कढे शौत में अपने दल के साथ मैदान 
की ओर निकल गया । वसन्‍्त तो आगया, पर वह नहीं लौट आया /' 

शीरी कल्पना करने लगी--हिन्दुस्तान के एक सम्द्धिशाली नगर के एक 
गली में एक युवक पीठ पर गद्ठर लादे घूम रहा है। परिश्रम और अनाहार 
से उसका मुख विवरण है । 

उसकी इच्छा हुईं कि हिन्दुस्तान के प्रत्येक शहस्थ के पास इतना घन 
रखदें कि वे अनावश्यक होने पर भी उस युवक की सब वस्तुओं का मूल्य 
देकर उसका वोझ उतार दे । भद्दीनों हो गये । 

शौरी का व्याह एक धनी सरदार से हो गया । 

एक दिन दुबं और हरूम्वा युवक पीठ पर गटर लादे सामने आकर पैठ 
गया । शौरी ने उसे देखा, पर वह किसी की ओर देखता नहों। अपना सामान 
खोलकर सजाने लूगा । 


सरदार अपनी भ्रेयसी को उपहार देने के लिए कुछ सामान छॉटने लुगा। 
उसने दाम पूछा । 


१३३ 


प्रभाद और उनका साहित्य 


युवक ने कहा--मैं उपहार देता हूँ, बेचता नहीं। 

सरदार ने तीक्ष्ण स्वर में कहा--तव मुझे न चाहिए, छे जाओ, उठाओ। 

वह कहता है--मैं थका हुआ आ रहा हूँ। थोडा अवसर दीजिए । हाथ- 
मुँह थो छेँ। कह कर युवक चला जाता है, फिर छोट कर नही आता। 

शौरी ने बोझ तो उतार लिया, पर दाम नहीं दिया । 

छोटी कहानियों में इसे मैं प्रसाद की सर्वोत्तम कृति समझता हूँ। 

आँची--यह असाद का चौथा कहानी-संग्रह है। इसमें १९ 
कहानियों संगृहीत हैं। इन कहानियों में विजया, अमिटन्स्ट्ृति, 
ग्राम-गीत और त्त-भंग के अतिरक्त समी कहानियाँ जोरदार हैं। 

विजया में फेवछ इन पंक्तियों से ही कहानी बनती है---समाज से डरो 
मत। अव्माचारी समाज पाप कहकर कानों पर हाथ रखकर. चिह्लाता है, 
वह पाप का शब्द दूसरों को सुनाई पढ़ता है, पर वह स्वयं नहीं सुनता। 

आम गीत में नन्‍्दन भाट की लड़की रोहिणी गाँव के जुमीदार जीवनर्तिंह 
के प्रेम में पड कर पगली हो जाती है। उसी भावावेश में वह स्वयं गीत 
बनोती हुई गाती फिरती है। 

बरजोरी बसे हो नयनवाँ में । 

द्ीट बिसारे बिसरत नाही, कैसे बूँ जाय बनवाँ में ॥ 

बरजोरी बसे हो। 

रोहिणी गंगा में कूद पढ़ती है। हतबुद्धि जीवन देखते रहे। रोहिणी 
चन्द्रमा का पीझ कर रही थी और नीचे उस छपाके से उठते हुए कितने ही 
बुदूबुदों में प्रतिविम्बित रोहिणी की किरणें विलीन हो रही थी। 


११४ 


कहानियाँ 


चन्द्रमा का पीछा रोहिणी जैसे करती है, पेसेही रोहिणी अपने उन्मत्त 
ग्रेम के कारण जीवनसिह के लिए भटकती है। यही डोर बॉध कर श्रसाद जी 
ने इसका भावनात्मक अन्त किया है, किन्तु कहानी विशेष कला पूर्ण नहीं। 

आधी, दासी और पुरस्कार एक श्रेणी की कहानियों हैं। इन कहानियों 
की नायिकाएँ क्रमश लैला, इराबती और मधूलिका हैं। इनके अंतस्तल में 
एक ही आग धघकती है, लेकिन उनका सामाजिक स्वर भिन्न है। लैला, 
ईरानियों की लडकी है, जो चलते फिरते घरों को जानवरो पर लादे फिरते 
रहते हैं | इरावती मुल्तान की छूट मे म्लेच्छों द्वारा पकड़ ली गई। ऋ्रीत दासी 
मधूलिका वीर सिहमित्र की एकमात्र कन्या है, जो वाराणसी युद्ध में मारे 
गये। लेलछा अपने ढंग से सभ्यता की गोद में पले रामेश्वर से प्यार करती 
है। बाद में रामेश्वर ग्रहस्थ वन जाता है। लेला जब रामेश्वर के विश्वाराधात 
की वात सनती है, तव उसका चेहरा क्रोव से तमतमा उठता है। आँखों से 
ज्वाला निकलने लगती है, उसे रामेश्वर के मित्र सलाह देते है कि तुम 
रामेश्वर को भूल जाओ। (ुम भूल सकते हो, में नही, मैं खून कहूँगो ।” 
उसकी आंखों से ज्वाला निकल रही थी। इसके बाद लेला अधौर होकर 
कहती है---मैं उसकी एक वार देखना चाहती हैँ 

मैं उसे दिखा दूंगा, पर तुम उसकी कोई बुराई तोन करोगी ? 
मित्र पूछते हैं । 

हुआ ! लेला ने काछी आंखें उठा कर देखा । लेछा से ओखें मिलते ही 
रामेश्वर के मुँह पर क्षण भर के लिए एक घबराहट दिखाई पडती है। लेला 
रामेश्वर की बच्ची के गले मे मूँगे की माला पहना कर उसका मुँह चूमती हुई 


१३५ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


उठ5 खड़ी होती है। इसके बाद लेला उन्मादिनी बन जाती है। उसके सम्बन्धी 
उस पर आसेव का असर देखते हैं। वे क्या जानें कि उसके अन्दर कैसी 
आँधी चल रही है। एक दिन लेला सचमुच की ऑधी का सामना करती है, 
पीपल की एक बड़ी डा उस पर गिर पड़ती है। 

भधूलिका के हृदय मे प्रेम और राजमक्ति का इन्द्र चलता है। वह 
अरुण कुमार से प्रेम करती है, जो मगध का विद्रोही राजकुमार है और 
जिसके सामने छलनाओं तथा आकांक्षाओं का चित्र है। वह मधूलिका से 
कहता है---मैं तुम्हे कोशल के सिंहासन पर बिठा कर अपनी राज रानी वना- 
ऊँगा। सघूलिका कॉप उठती है। वह अरुण कुमार के घड्यंत्र में सम्मिलित 
हो जाती है। लेकिन बाद में उसकी सुख की कल्पना नष्ट हों जाती है। वह 
सोचती है, श्रावस्ती दुर्ग एक विदेशी के अधिकार में चला जायगा। मगध 
कोशल का चिर-शतन्नु। मगध की विजय । सिंहमित्र कोशल राज्य का रक्षक 
चीर । उसी की कन्या आज क्या करने जा रही है। 'मधूलिका | मधूलिका ” 
उसे लगा, जैसे उसके पिता उस अंधकार में पुकार रहे हैं, वह कीशल नरेश 
से सारा षड्यंत्र बता देती है। उसका प्रेमी अरुण-कुसार पक जाता है। 
उसे प्राणदंड़ की आज्ञा होती है। फोशल नरेश प्रसन्षता से मघूलिका से 
कहते हैं----तुझको जो पुरस्कार मॉगना हो, माँग मधूलिका पगली-सी कहती 
है--मुझे कुछ न चाहिए, राजा कहते हैं--नहों ! मैं तुझे अवश्य दूंगा, 
मॉग ले ।! 

तो मुझे प्राणदंड मिले ”/ कहती हुई वह बन्दी अरुण के पास जा 
खड़ी हुई । 


१२६ 


कहानियाँ 


कुछ छोग प्रसाद जी की अधिकांश कहानियों में अस्वाभावि- 
कता का दोषारोपण करते हैं, किन्तु मेरी समझ में तो यही आता 
है कि जिन कहानियों का सूत्र किसी रहस्य की छाया में फूछता- 
फलता है, उनमें स्वाभाविकवा और अस्वाभाविकता का अश्न ही 
नहीं रहता । जब हम वास्तविक जगत्‌ के हंसते-बोलते हुए पात्रों 
को अपने सम्मुख चलते फिरते देखते हैँ, तभी उन्हें स्वाभाविकता 
की कसौटी पर कसते हैं। भाव छोक में भ्रमण करने वाले कवि 
प्रसाद वास्तविक चित्रण में कितने सफल हुए हैं, इसी का विवरण 
मैं यहों दे रहा हूँ । 

आधी संग्रह में प्रसाद जी की चार कहांनियॉ--मधघुआ, 
घीसू, वेड़ी और नीरा--अन्य कहानियों से भिन्न हैं। इनमें 
यथार्थवाद की नई धारा बहती है। उनका दृष्टि कोण समय और 
युग की मांग के साथ अधिक विस्तृत होता है । 

भधुआ' के सम्बन्ध में तो स्वयं प्रेमचन्द्‌ जी ने छिखा था 
कि असाद जी ऐसी कहानी लिख सकेंगे, ऐसा मुझे विश्वास नहीं 
था। मैं उसे उनकी उत्कृष्ट रचना समझता हूँ । 

इसमें सन्देह नहीं कि शराबी का यथाथवादी चित्रण सभी 
को पसन्द आया। उसका यह स्वाभाविक दीन सिद्धान्त कितना 
सरल है। 

'सरकार | भौज बहार की एक घड़ी, एक हूम्बे ढु.ख पूर्ण जीवन से 
अच्छी है। उसकी खुमारी में रूखे दिन काट लिये जा सकते हैं । 


१३७ 


प्रलादु और उनका साहित्य 


उस निरीह बालक मधुआ के सम्बन्ध में शराबी नियति के पंजे से 
अलग न हो सका । उसने तिरूमिला कर मन-ही-सन प्रश्न किया--किसने ऐसे , 
सुकुमार फूलों को कष्ट देने के लिए निर्दयता की सुूष्टि की ? भाह री 
नियति | तव इसको लेकर मुझे घर बारी बनाना पड़ेगा क्या ...... 

घीसू का चरित्र भी अनोखा हुआ है, घीसू रेजगी और पैसे 
की थेलली लेकर बैठता । एक पैसा शायद बद्ा लिया करता। विन्दो 
गंगा नहाने आती । कभी रेज़गी पैसे छेने के लिये वह घीसू के 
सामने आकर खड़ी हो जाती, वह कहती-'दिखो घिसे पैसे न 
देना ।” 

वाह बिन्दो | घिसे पैसे तुम्हारे ही लिए हैं ? क्यों !? 

6ुम तो घीसू हो ही, फिर तुम्हारे पैसे क्यों न घिसे होंगे ” कह कर 
जब वह मुस्करा देती, तो घीसू कहता विन्दो, इस दुनिया में मुझसे अधिक 
कोई न घिसा होगा, इसी लिए तो मेरे माता-पिता ने घीसू नाम रवखा था 

यथाथवादी भूमि पर पैदा होकर भी घीसू काल्पनिक सुख , 
से सुखी होता है । 

घीसू नगर के बाहर गोधूलि की हरी-भरी क्षितिजरेखा में *“उसके सौन्दर्य 
से रंग भरता, गाता, गुनगुनाता और आनन्द लेता। घीसू की जीवन-यात्रा 


का वदह्दी सम्ब॒छ, वही पार्थेय था । 
सन्ध्या की शत््यता, बूटी की गमक, तानीं की रसीली गुज्नाहद और नन्‍्दू 


चादू को बीन, यही सव विन्दो की आराघना की सामग्री थी। घौसू कत्पना 
के खुख से सुखी होकर सो रहता। 


श्श्८ 


कहानियाँ 


वैरी! कहानी की घटना तो बड़ी स्वाभाविक है। मैने स््य॑ उन दोनों 
मिखारी पात्रों को देखा है । प्रसाद जी की दूक्ान पर जब हम छोग बंठते तो 
कमी एक ९, १० बर्ष का लढका अन्धे की लाठी पकड़े हुए आता । उसे कुछ 
मिलता और चला जाता । 

कुछ भहीनों वाद उस लकके के पैर में वेढ़्ी डाल दी गई थी, और वह 
मटखट वालक धीरे-धीरे लाठी के सहारे अपने पिता को आगे लेकर वढता । 
हम लोग आश्चर्य से देखते । इस दृश्य का प्रभाव प्रसाद जी के ऊपर इतना 
पडा कि उन्होंने एक छोटी सी रचना की । 

'त्तीरा कहानी में यथार्थवादी दृष्टिकोण का अधिक स्पष्ट चित्रण 
है। नीरा और उसके वृढ़े नास्तिक पिता का चरित्र बड़ी कुणछता 
से लेखक ने सम्मुख रक्खा है। दरिद्रता ओर छगातार दु.खो से 
मनुष्य अविश्वास करने छगता है। यही इस कहानी का सत्र है । 

द्रिद्रता के वणन में ये पंक्तियाँ कितनी जोरदार ह--बुड्ढा 
लाई फॉक रहा था, रूखे होठों पर दो एक दाने चिपक गये थे, 
जो उस दरिद्र मुख में जाना अस्वीकार कर रहे थे । 

साधारण कोटि के पात्रों का चरित्र-चित्रण करते हुए, उन पात्रों 
के प्रति लेखक की सहानुभूति छिपे रूप में चल रही हो, यही 
यथार्थबादी साहित्य का सिद्धान्त है । 

प्रसाद ने 'आँधी” संग्रह की जिन चार कहानियों में इस दृष्टि 
कोण को उपस्थित किया है, वे उनके पॉचवें कहानी-संग्रह इन्द्र- 
जाल में पूर्ण हुआ है। 


१३६ 


असाद और उनका साहित्य 


इस संग्रह की पहली कहानी “इन्द्रजाल” है और इसी कहानी 
पपर संग्रह का नास रक्खा गया है। अतएव स्वयं लेखक यह व्यक्त 
करता है कि इस संग्रह की यह कहानी उसकी दृष्टि में विशेष ध्यान 
देने योग्य हे । 

“इन्द्रजाल” यथार्थवादी कहानी है) बंजरों के चलते फिरते 
दल में से बेछा और युवक गोली के चरित्र की धारा बड़ी उम्ज्बल 
और स्वाभाविक हुई है। ऐसा प्रतीत होता है कि लेखक इस श्रेणी 
की मनोधृत्ति का पूर्ण ज्ञाता है. । किन्तु प्रसाद की किसी कोटिकी 
कहानियों में मावुकता की मात्रा न हो, यह असस्भव है। इस 
'कहानी में देखिए--- 

“उस नि्जन ध्रान्त में जब अन्धकार खुले आकाश के नीचे तारों से 
-खेछ रहा था, तब बेला बैठी कुछ गुनगुना रही थी ।' 

ववेढा सांवडी थी, जैसे पावस की मेघमाला में छिपे हुए आलोक पिण्ड 
का प्रकाश निरखने की अद॒म्य चेष्ठ कर रहा हो, वैसे ही उसका यौवन , 
-सुगठित शरीर के भीतर उद्देलित हो रहा था । 

'नोली जब चॉसुरी बजाने छुगता, तब बेला के साहित्य-हीन गीत 
जैसे प्रेम के भाधुर्य की व्याख्या करने छंगते । 

आगे चल कर “सलीम! में सी प्रसाद ने यथार्थवाद की भावना 
उपस्थित की है। 

सलीम--पश्चिमोत्तर-सीमाप्रांत में एक छोटी सी नदी के किनारे पह्वियों 
से घिरे हुए छोटे से गाँव में खत्रियों, श्राह्मणों और पठानों की वस्ती थी। 


१४० 


कहानियाँ 


नद्राम, जिसका हृदय प्रेमकुमारी के प्रेम से ल्लिग्ध और कोमछ हो गया था, 
घोडे के व्यापार के लिए यारकंद गया था। प्रेमकुमारी दौप-दान दे रही थी, 
जब व्यक्तिगत आवश्यकताओं से असन्तुष्ठ, हिजरत से लाटा हुआ थुक्तप्रान्त 
का एक मुसलमान सलीम अपनी कोमल काया से ऊपर आ निकला। प्रेम- 
कुमारी को देख कर वह स्तव्ध रह गया। गाँव के सुखिया के लडके अमीर 
ने, जो प्रेमकुमारी को बहन कहता था, उससे कहा--भूखा है ? चल तुझे बावा 
से कहकर कुछ खाने को दिलवा दूँगा । लेकिन सलीम के हृदय में विप छट-- 
पटा रहा था। उसने वजीरियों से मिल कर हट मार मे पुरस्कार स्वरुप प्रेमा की 
पाने की कल्पना की | लेकिन वजीरियों से लडाई मे नन्दकुमार की जीत रही। 
सलीम झाडियों मे छिप गया। एक धार्मिक वजीरी ने उससे कहा--तू भूखा 
परदेसी घन कर इसके साथ जाकर घर देख आ। नन्‍्द्राम ने सरल भाव से 
सलीम को भी अपने ऊँट पर विठा लिया । 

मनुष्यता का एक पक्ष यह भी है, जहाँ वर्ण, धर्म और देश को भूल कर 
मनुष्य, मनुष्य को प्यार करता है । सलीम सूफी कवियों-सा सौन्दर्योपासक 
बन गया। नसन्दराम के घर का काम करता हुआ, वह जीवन विताने 
लगा, उसने भी घुते काफिरं को अपनी संसार-यात्रा का चरम लक्ष्य 
वना लिया। 

एक दिन सलीम को लंगड़ा वजीरी मिला। प्रतिक्रिया आरम्भ हुई। 
वह फिर से कट्टर सुसछमान बन गया । अस्सी वजीरियों का दल चारों तरफ 
से गाव को घेर कर भीपण शोलियों कौ बौछार करने लगा । अमीर और 
नन्द्राम वगल में खड़े होकर गोली चला रहे ये। बजीरियों ने मोचो छोड 


१४१९ 


असादु और उनका साहित्य 


दिया। सहसा घर में चिह्माहट झुनाई पड़ी। बन्द्राम भीतर चला गया। 
उसने देखा, भ्रेंमा के वाल खुले हैं। उसके हाथ में रक्त से रंजित छुरा है। 
अनन्‍्द्राम ने कहय-ठहरो असीर, सलीम हमलोगों का शरणागत है। लेकिन 
तब तक अमीर ने सलीम की कलाई ककड़ी की तरह तोड़ दी । इसके वाद 
चहुत दिनों तक वह भौख माँग कर खाता और जीता रहा । 
गुंडा--यह कहानी अठारहवों शताब्दी के अंतिम भाय की है, जब समस्त 
आ्याय और वबुद्धिवाद को शत्नवल के सामने झुकते देख कर, काशी के विच्छित्त 
और निराश नागरिक जीवन ने एक नवीन संप्रदाय की सृष्टि की, जिसे लोग 
गुंडा कहते थे। नन्हकूसिंह इसी संग्रदाय का एक अतिष्ठित जमींदार का पुत्र 
था। वाल्यावस्था सें उसके विवाह की चचो पन्ना से चली, लेकिन अल्याचारी 
बलवंतसिंह द्वारा पन्ना रानी बनाये जाने पर उसने चिरकुमार रहने कौ 
प्रतिज्ञा की । वह एक निर्मीक, उच्छूडुछल और अपनी बात पर अड़ जाने 
वाला युवक वन गया। तसोली की दुकान पर बैठ कर वह वेश्याओं के गौत 
चुनता, लेकिन कभी ऊपर नहीं जाता । हेस्टिंग साहव ने जब काशी पर 
धघावा किया, जब नगर में सय और सन्नाटे का राज्य छा गया, चिथहसिंह 
की हवेली अपने भीतर काशी की वीरता को बंद किये कायरता का परिचय 
दे रही थी, उस समय नन्‍्हकूसिंह अपने थोड़े से साथियों को लेकर राजमहल 
की ओर बढ़ गया । राज परिवार मंत्रणा में ड्वा था । नन्हकूसिंह ने कहा- 
महारानी कहाँ हैं, उन्हें डोगों पर वितईए । नीचे अच्छे मह्यह तैयार हैं। 
राजमाता पच्ना डोंगी पर चैठ गईं । चेत्तसिंह ने खिड़की से डोंगी पर उतरते 
हुए देखा कि नन्हकूसिंह बीसों तिलंगों की संगीनों में अविचल खडा होकर 


श्ष्टर 


कहानियाँ 


तलवार चला रहा है उसका एक-एक अंग वही कठ कर गिरने लगा । वह 
काशी का एक गुंडा था। 

प्रसाद ने कहानियाँ लिखने की कछा को बहुत ऊंचे स्थान 
पर उठाया है. । उनकी कहानियों में हिन्दी में प्रथम बार आधुनिक 
लेखन कला का उदाहरण मिलता है । 

कहानी-कछा की कसौटी के अनुसार कहानी-लेखक की 
सफलता इस बात पर निभेर करती है कि वह कहाँ तक अपनी 
इच्छा के अनुकूल पाठकों में वही भावनाएँ संचारित कर सकता 
है, जो कहानी की रचना के समय उसके अंतस्तल में आंदोलछित 
हो रही थीं। भावनाभिव्यक्ति की कुशछता के साथ ही एक आधु- 
निक कहानी लेखक से यह भी आशा की जाती है कि चह कहानी 
को इस प्रकार चित्रित करे कि पाठक को यह अनुभव न हो कि 
कोई तीसरा व्यक्ति कहानी कह रहा है, बल्कि वह अपने को 
एक दर्शक की स्थिति में समझे, जिसके सामने रंगमंच के समान 
कहानी की घटनाएं स्वतः घटती जाती हों । 

प्रसाद ने जिस समय लिखना आरम्भ किया, उस समय 
हिन्दी में इस तरह कहानियाँ लिखी जाती थीं-'हाय मालती 
तुम्हारी क्या दशा हो गई ९? “प्यारे पाठकों, जब रामकिशोरसिंह 
ने कमला की ओर देखा, तब उस समय उनके हृदय की हाछूत 
अजब हो गई।” “अहा ! कैसा मनोर्म रूप है।” कहानी के घटना 
संगठन और रचनाक्रम पर भी कुछ ध्यान न दिया जाता था। 


१४३ हु 


प्रसाद जौर उनका साहित्य 


प्रसाद जी ने हिन्दी कहानियों को आधुनिक रूप प्रदान किया है। 

प्रसाद अपनी प्रांजल भाषा और अद्भुत व्यज्ञन कुशलता के 
कारण बहुत शीघ्र पाठकों को अभिभूत कर छेते हैं। 

(१ ) सालवती कहानी के छुछ पुत्रों का चित्रण । 

थे लोग सम्ध्रान्त कुलपुत्र थे। कुछ गम्भीर विचारक से वे युवक 
देव-गन्धवे की तरह रुपवान थे। लम्बी-चोड़ी हड्डियों वाले व्यायाम से सुन्दर 
शरीर पर दो-एक आभूषण और काशी के बने हुए बहुमूल्य उत्तरीय, रत 
जटित कटिबन्ध में कृपाणी रूच्छेदार बालों के ऊपर सुनहरे पतले पटवन्द्‌ 
और वसन्तोत्सव के प्रधान चिह्न स्वरूप दूबो और सधूक पुष्पों कौ झुरचित 
मालिका । उनके सांसल भुजदंड, कुछ-कुछ आसव-पान से अरुण नैन्न, ताम्बूल 
रंजित सुन्दर अधर, उस काल के भारतीय शारीरिक सीन्द्य के आदश 
प्रतिनिधि थे । ( इन्द्रजाल ) 

(२) रूप की छाया! सें सरला का चित्रण । 

गंया के स्थिर जल में पैर डाले हुए, नीचे की सीढ़ियों पर सरजा बैठी थी। 
कारु-कार्य-खचित-कंचुकी के ऊपर कन्धे के पास सिकुड़ी हुई साड़ी, आधा खुला 
हुआ सिर, बद्धिममऔवा और मस्तक में कुंकुस-बिन्‍्दु-सहीव चादर में सब 
अलग-अलग दिखाई दे रहे थे। मोटी पलकों वाली बड़ी-बड़ी ओंखें गंगा के 
हृदय में से मछलियों को ह/ँढ निकालना चाहती थी। ( आकाद-दीप ) 

प्रसाद की कहानियों के चरित्र का विकास अधिकतर संकेत 
रूप में होता है। कुशल चित्रकार की भाँति थोड़ी सी रेखाओं में 
बह अपने चरित्र की सम्पूर्ण झोकी दिखा देते हैं। 


श्डष्ठे 


कट्टानियाँ 


(३ ) इन्द्रजाल में वंजरों के सरदार का चित्रण | 

वंजरो का सरदार मैकू लम्बी-चोढ़ी हृह्टियोवाछा एक अधेड पुरुष था। 
दया-माया उसके पास फटकने नहीं पाती थी । उसकी घनी दाढी और मूछों के 
भीतर प्रसन्षता की हँसी भी छिपी ही रह जाती । गाँव में भीख मॉगने के लिए 
जब वंजरों की ल्लियाँ जाती, तो उनके लिए मैकू की आना थी कि कुछ मिलने 
पर अपने बच्चों की निर्दयता से गृहस्थ के द्वार पर जो स्नी न परक देगी, उस 
को भयानक दण्ड मिलेगा । ( इन्द्रजाल, ) 

(४ ) गुंडा कहानी में नन्‍्हकूसिंह का चित्रण । 

वह पचास वर्ष से ऊपर था, तव भी युवकों से अधिक वलिप्ठ और दृढ़ 
था। चमडे पर झुर्रियाँ नही पड़ी थी। वर्षा की झडी में, पूस की रातों की 
छाया मे, कड़कती हुई जेठ की धूप में, नंगे शरीर घूमने मे, वह खुख मानता 
था। उसकी चढी मूछे विच्छ के डंक की तरह, देखने वालों की आंखों में 
चुभती थीं। उसका सॉवला रंग, सॉप की तरह चिकना ओर चमकीला था। 
उसकी नागपुरी धीती का छाल रेशमी किनारा दूर से ही ध्यान आकर्षित करता। 
कमर मे वनारसी सेल्हे का फेटा, जिसमें सीप की मूठ का विछुआ खुला रहता 
था। उसके घुँघराले वालों पर सुनहले प्ले के साफे का छोर उसकी चौोडी पीठ 
पर फैला रहता। ऊेँचे कन्घे पर टिका हुआ चौड़ी धार का गैंडासा, यह थी 
उसकी घज | पंजों के वल जब वह चलता, तो उसकी नर्सें चटाचट बोलती 
थों। वह गुंडा था। ( इन्द्रजाल, ) 

वर्णन के अछावा प्रसाद चरित्र-चित्रण यथावश्यकता संकेत, 
घटनाओ और वाताछाप का भरी सहारा लेते हैं । 


१० श्ष्५ 


प्रसाद और उसका साहित्य 


शरदू की पूर्णिमा में बहुत से लोग उस सुन्दर हृदय को देखने के लिए 
दूर दूर से आते युवतियों और युवकों के रहस्यालाप करते हुए जोड़े, मित्रों 
की मंडलियाँ, परिवारों का दक उनके आनन्द कोलाहल को उदास हो कर 
देखता । डाह होती, जलन होती, तृष्णा जग जाती, में उस रमणीय दृश्य का 
उपसोग न करके पलकों को दवा लेता । कानों को बन्द कर लेता । (इन्दरजाल) 

प्रसाद की कहानी की घटनाएँ बहुत सुसंबद्ध होती हैं। यथा 
मधुआ कहानी सें प्छाठ बहुत थोड़ा है। शराबी के एकांत जीवन 
सें एक माता-पिता-बिहीन अनाथ बाछक का प्रवेश होता है; जिसे 
देख कर उसके हृदय में दया और बाद को समता का संचार 
होता है। शराबी ने उसी दिन ठाकुर साहब से एक रुपया पाया 
था, जिसमें वह शराब का अद्भा खरीदना चाहता था। लेकिन 
बह सारे पैसों की बालक के लिए मिठाई आदि खरीद छाता है। 
इसके बाद बालक के भरण-पोषण के निम्ित्त वह शराब छोड़ देने 
की प्रतिज्ञा करता है और बालक के साथ सान रखने का काम 
करते ऊगता है। 

प्रसाद की अधिकांश कहानियों में घटना बहुत न्यून होती है। 
चह थोड़ी सी ही सामभ्री पर अपनी अद्भुत शैली से अपना प्रासाद 
निमित्त करते हैँ। वह एक छोटी सी बात को भी कवित्व सय 
ढंग से चित्रण करते हैं। उसकी कहानियों में भाषा शैली का 
लोच एक विशेषता है। ह 

प्रसाद, जीवन की एक घटना के चित्र को संपूर्ण हप से चित्रित करते हैं। 


१४६ 


फद्ानियाँ 


लेकिन जहां वह मनोवैज्ञानिक दृष्टि से समाप्त हो जाती है, वही कहानी का 
अंत कर देते हैं। यह उनकी एक कला है । 

रामनिहाल अपना विखरा हुआ सामान चाधने में छया था। जंगल से 
धूप आकर उसके छोटे से शोशे पर तडफ रही थी । अपना उज्ज्वल आलोक 
खण्ड, वह छोटा-सा दर्पण इद्ध की सुन्दर प्रतिमा को अर्पण कर रहा था। 
किन्तु प्रतिमा ध्यानमप्त थी। उसकी ओखें धूप से चोंधियाती न थी। प्रतिमा 
का शान्त गम्भीर मुख और भी भ्रसन्न हो रहा था। किन्तु रामनिहाल उधर 
देखता न था। उसके हाथों में था एक कागज़ों का वंडल, जिसे सन्दुक में 
रखने के पहले वह खोलना चाहती थी। पढ़ने की इच्छा थी, फिर भी न 
जाने क्यों हिचक रही थी और अपने मन को मना कर रही थी, जैसे किसी 
भयानक वस्तु से बचने के लिए कोई बालक को रोकता हो । 


१४७ 





प्रृत्वेक देश का नाटक-साहिल्य वहाँ की विचित्र सामाजिक 
परिश्थितियों के अनुसार उत्पन्न हुआ है। साहिदय के अन्य 
अंगों के विपरीत यह अपने विकास के लिये जनता की शिक्षा 
और सम्यता पर अधिक निर्भर है। गीत; काव्य, उपन्यास, देशेन 
आदि जन समुदाय तक पहुँचने के लिये समय ले सकते हैं; प्रका- 
शित होते ही उनके लिये यह आवश्यक नहीं कि जनता उन्हें 
तुर्त समझ भी छे । जब साहित्य छपता न था, तब ढोगों को 
उसका आनन्द लेने के लिए सामूहिक रूप से उससे गीत या 
अभिनीत रुप में परिचय श्रप्त करना होता था । इस ढिये तब 
नाटक को प्रथमतः दशकों को सुबोध होना आवश्यक था । 
प्रीस में जब वहां के विश्व विख्यात नाटककारों ने अपने 
नाटक लिखे, तब वहीँ साहित्य से परिचय प्राप्त करने का प्रधात 
साधन नाटक ही था। ग्रीक ढोग एक नाटक तीन-तीन दिन तक 


श्ध््् 


नाटक 


देखते थे । नाटक उनके गीतकाव्य का एक नवीन रूप था। जिस 
कथा-बस्तु को छोग गायकों के मुंह से सुनते थे; उसे अब मंच पर 
अभिनीत देखने छगे और कथा की पूर्णता के लिए वे उसे तीन 
खण्डो में विभाजित कर, उसका तीन दिन तक असिनय करते थे। 
इस छिए उनके नाटकों में 'कोरस' का प्रमुख स्थान हैं; एक या 
अधिक व्यक्ति मिल कर दशकों को कथा समझा देते हैं, तथा 
घटनाओं पर टिप्पणी भी करते चलते हैँ.। कुछ छोगों का मत है 
कि इन कोरसों के गीत ही नाटकों की सार कविता है। उनके 
कोरस नियति की निर्देयता के करुण गीत गाते हुए नाटकीयत्व 
के साथ गीततत्व का अच्छा समन्वय करते हैं | 

जिस प्रकार होमर के गीत-काव्य के वाद ऑस्काइलस, सोफो- 
छीज और यूरीपिडीज़ ने अपने नाटक लिखे, उसी प्रकार संस्कृत 
में पौराणिक गायाओं के वाद कालिदास और भवभूति ने अपने 
प्रसिद्ध नाटक लिखे; किन्तु उनमें गीतकाव्य को ग्रीक नाठकों 
जैसी प्रधानता नहीं है. । इसका कारण यह था कि अपनी भावा- 
मिव्यक्ति के लिये उन्तके पास महाकाव्य वाला एक दूसरा साधन 
भी था। कालिदास ने शकुन्तला के साथ 'सेघदूत” भी लिखा। 
संस्क्व नाटक खेले जाते थे या नहीं यह विवादास्पद है। उनमें 
सी तथा अन्य विशिष्ट पात्नो के लिए प्राकृत का प्रयोग है। इससे 
मालूम होता है कि जन साधारण की भाषा प्राकृत हो चुकी थी । 
ये नाटक था तो विद्वजनन समाज के मनोविनोद के लिये या केवल 


१४५ 


असाद और उनका साद्ित्य 


काव्य के लिये लिखे गए थे। उग्ते प्राकृत साहित्िक में उत्तका 
वही स्थान रहा होगा जो आज कल के साहित्य में प्रसाद जी के 
नाटकों का है | 

भीक समाज जितना सुरुचिपूर्ण और सुसंस्कृत था, वैसा अन्य 
देशों का समाज कम रहा है। अंग्रेजी के प्रसिद्ध एलिजाबेथन युग 
में समाज उतना सुसंरक्ृत न था। इसीलिए उस काल के नाठकों 
में कुरुचि का प्रदर्शन बहुत बड़ी मात्रा में हुआ है। शेक्सपियर 
के नाटक भी अपवाद नहीं हैं। इसके साथ जनता की रुचि के 
अनुसार मद्दे-से भद्दे सार काट और रक्तपात के कथानक चुने 
जाते थे। इससे उस काछ के नाटककारों की कठिनाइयों का पता , 
चलता है। समाज की भसंस्क्ृति से उत्पन्न बाधाओं के होते हुए 
भी उन नाटकों में तब के लेखक बहुत कुछ-कविता भर सके | 
आज जो वे नाटक ग्रसिद्ध हुए हैं, उसी कविता के बल पर; जिस 
घटना प्रधान सनसनी से भरे कथानक पर उस समय का समाज 
मुग्ध होता था, उस कथानक के बल पर नहीं | 

प्रसाद जी के नाटक उन्हीं नाठकों की श्रेणी में आते हैं जो 
अपनी कविता के कारण प्रसिद्ध हुए हैं। आज जो शेक्सपियरः 
युरिपीडीज़ या कालिदास के नाटकों का मान है, वह इस लिए नहीं 
कि वे मंच पर सफछ हुए बल्कि इस लिए कि युग-युग से लोग 
उनकी कविता पढ़ते और उससे आनन्दछाभ करते रहे हैं | 

आधुनिक हिन्दी साहित्य का युग रोमांटिक युग रहा है | भ्रसाद/ 


१५० 


नाटक 


पन्‍त और निराला उसके प्रतिनिधि कवि रहे हैं, उनकी साहित्यिक्त 
व्यञ्ञना का माध्यम प्रधानतः कविता रही है । प्रसाद जी ने अपने 
भावों छो व्यक्त करने के लिये काव्य, गीत, मुक्तक, उपन्यास और 
कहानी के साथ नाटक को भी अपना माध्यम चुना | पुरानी 
संस्कृति का नवीन खप्न उन्होंने अपने नाटकों में रक्खा । इसमें 
सन्देह नहीं कि अभिनय कछा के प्रदशन के लिए प्रसाद जी के 
नाटकों में गुंजाइश है, छेकिन हिन्दी रंग मंच विकसित न होने से 
उनको प्रसिद्धि अभिनय पर निर्भर नहीं रही | इसके साथ जनता 
की अशिक्षा ओर पारसी कंपनियों और उनके बाद सिनेसा की 
छोकप्रियता भी प्रसाद जी के नाटकों के अभिनीति न होने के 
लिए उत्तरदायी हैं । 

फिर भी जैसे ग्रीक, संस्कृत और अंग्रेजी के एलिज्ञाबेथन 
नाटकों की ख्याति उनकी कविता के कारण हैं, उसी प्रकार प्रसाद 
जी के नाटकों में उनकी कविता के सभी गुण पूण मात्रा में विद्य- 
मान हैं। उनकी महत्ता उनकी कविता के कारण है, जैसे सर्वेत्र 
रोमांटिक या पोएटिक ड्रामा की रही है। शैली का ओ्रोमिध्यूस - 
अनबाउन्ड' और गेठे का 'फाउष्ट' पोएटिक ड्रामा के दो सुन्दर 
निद्शन हैं। ये अपनी कविता के लिए संसार प्रसिद्ध हैं, उन्हें मंच' 
पर खेलना प्रायः असम्भव है । इच्सन और शो के नाटक सामा- 
जिक और राजनीतिक प्रश्नों को लेकर एक विशेष प्रकार के प्रचार 
कार्य के लिए छिखे गए हैं । ऊंचे चरित्र चित्रण और सुन्द्र काव्य 


१५१ 


भसाद और उनका साहित्य 


के अभाव सें ये नाटक केवछ अपने विचार और प्रचार के बढ 
पर पुराने नाटकों के समकक्षी हो सकते हैं या नहीं, यह अभी तक 
विवादास्पद है । जो भी हो, प्रसाद जी के नाटकों का उनसे संतुलन 
अनावश्यक है। दोनों ही नितान्त विभिन्न श्रेणियों के साहित्य हैं। 
पहली श्रेणी में प्रसाद जी के नाटक अपनी भावपूर्ण कविता के 
बल पर ऊँचा स्थान पाते हैं । 

प्रसाद के विविध नाटकों की कथा एक दूसरे से मिन्न हैं, 
परन्तु अदृश्य रुप में उनमें एक ही डोर दौड़ती है। प्रसाद जी ने 
भिन्न-मिन्न पात्रों की अवतारणा केबछ अपने विचारों की पुष्टि के 
लिए की है। प्रसाद जी मे अपने विचारों को व्यक्त करने के 
लिए अधिकांशतया ऐतिहासिक कथानकों को चुना है। इन 
कथानकों को रोचक बनाने के लिए उन्होंने अपनी ओर से कुछ 
तोड़-सरोड़ भी की है, लेकिन उतनी ही मात्रा में जितनी एक 
नाटककार के लिए आवश्यक है। प्रसाद जी की सदैव यही चेश्ठ 
रही है कि वह ऐतिहासिकता की तथा उस प्राचीन वातावरण की 
सजीच अवतारणा करते हुए अपना संदेश व्यक्त करें ।- 

यह प्रसिद्ध है कि दाशनिक क्षेत्र में भसाद जी रहस्यवादी थे, 
उनके रहस्यवाद की तह में एक विश्वमंगलकारी आशावाद का 
संदेश है। उनका नेराश्य, करुणा और विश्व प्रेम की भावनाओं का 
संचारक है। उनका मत है, 'क्षमा से बढ़ कर और किसी बात में 
पाप को पुण्य बनाने की शक्ति नहीं है । जिसे काल्पनिक देवत्व 


श्ण्र 


नारक 


कहते हैं, वह शुद्ध मनुष्यता है । इसी प्रथ्वी को स्वग होना हे, 
इसी पर देवताओं का निवास होगा 

प्रसाद जी के संपूर्ण चरित्रों को तीन श्रेणियों में बांदा जा 
सकता है । 

(१ ) देवता 

(२) राक्षस 

(३ ) मलुष्य 

देवता चरित्रों में गौतम, प्रेमानंद और वेद्व्यास की गणना 
की जा सकती है। थे संसार में रहते हुए भी उससे असंलप्न रहते 
हैं। उनमें वैराग्य और निर्वेद की भावना प्रधान रहती है । उसके 
साथ एक सात्विक वातावरण रहता है। वे आधारभूत दाशेनिक 
तत्वों और धमम सूत्रों को तक के द्वारा प्रतिपादित करते हैं और 
उनके संसर्ग में आकर दुष्ट चरित्र भी सुधर जाते हैं. । 

जन्मेजय का नाग यज्ञ' में वेद॒व्यास अंधरुढ़ियों और मिथ्या 
जातीय अभिमान के विरुद्ध उपदेश देते हैं। उनका कथन है, 
“असट् युक्त आज्ञा, चाहे वह किसी की हो, नहीं माननी चाहिए, 
क्योंकि अन्त में वही विजयी होता है। जो छोग सत्य पर आरूढ़ू 
रहते हैँ, विश्वात्मा उनका कल्याण करती है।? 

“अजातशज्ञ! में गौतमबुद्ध भी यही उपदेश देते हैं. 'सत्य सूर्य 
को कोई चलनी से नहीं ढंक सकता! “हमें अपना कर्तव्य करना 
चाहिए, दूसरों के मलिन कार्यों के बिचार से भी चित्त पर सलिन 


१५३ 


असाद और उनका साहित्य 


छाया पड़ती है!। “विशाख' में प्रेमानन्द कहते हँ-'सत्य को 
सामने रक्‍्खो, आत्मवल पर भरोसा रक्‍्खो, न्याय की सांग करो। 

राक्षस (अथवा दुष्ट ) चरित्रों में काश्यप, देवदत्त, शांति- 
मिछु, विरुद्धक आदि की गणना की जा सकती है। मनुष्यों में 
सत्‌ और असत्‌ दोनों प्रकार की भृत्तियां होती हैं, परन्तु इनमें 
से जब एक पछड़ा भारी हो जाता है, तब हम अपनी कल्पना के 
अनुसार देवता अथवा राक्षस चरित्रों का अनुमान करते हैं। 
राक्षस चरित्र भी परिस्थितियों के संघर्ष में आते हैं और अपनी 
अबछ तामसी भावनाओं के कारण उन परिस्थितिओं तक को अपने 
बड में कर सारा वातावरण कलुषित वना डाछते हैँ | असफलता 
प्राप्त होने पर भी जुआरी की भांति एक वार और का दांव खेलते 
हुए अपनी घात को सफल वनाने की चेष्टा करते हैं, परन्तु अन्त 
में अपनी दुर्वित्तियों की पराजय अथवा सांसारिक लिप्साकी 
निस्सारता के कारण उनमें बैराग्य की भावना उत्पन्न होती हे 
और वे देवता चरित्रों की शरण लेते हैं । 

प्रसाद जी के नाटकों के विधान में इन राक्षस चरित्रों का 
चहुत महत्व है, क्योंकि उनसे प्रकट होता है कि उनमें सभी मनुष्यों 
के अन्दर एक कोमल हृदय होने की अवस्था कितनी ग्रवक थी। 

देव चरित्रों और राक्षस चरित्रों के साथ ही प्रसाद जी ने 
एक ऐसे चरित्रों का अवतरण कराया है, जो दुनियां की तंरगों पर 
बहते हं। वे स्मणीय प्रछोभन और भयानक सौन्दर्य के सामने 


१०४ 


भारक 


घुटने टेक देते हैं। उनमें मनुष्य की सभी स्वाभाविक कमजोरियां 
प्रतिविम्बित होती हैं। असाद जी ने ऐसे चरित्रों के प्रति अपने 
हृदय की समस्त सहानुभूति जढ़ेल दी है। 

प्रसाद जी के चरित्र चित्रण की एक विशेपता यह है कि वह 
उनके सहजाता संस्कारों का परिचय कराते हुए रंगमंच पर उनका 
प्रवेश करा देते हैं । इसके बाद परिस्थितियों के संघर्ष में आकर 
इन पात्रों के चरित्रों का विकास होता है । 

- चरित्र चित्रण के चार साधन हैं १. वारतालछाप। २, स्वगव 
कथन | ३. दूसरों का कथन | ४. कार्य व्यापार। प्रसाद जी ने 
अपने चरित्र चित्रण में चारों साधनों का उपयोग किया है। कथो- 
पकथन वहीं आकषक होता है, जिसका काय व्यापार से सम्बन्ध 
हो। दाशेनिक विवेचन के समय उनके पात्र कभी-कभी बहुत 
लम्बे भाषण खगत कथन के रूप में कर जाते हैं। इससे रंगमंच 
पर अभिनय की दृष्टि से अवश्ये नाटक में कुछ शिथिलवा आती 
है, परन्तु साहितिक दृष्टि से ये स्थक बड़े रोचक बन पढ़े हैं । - 

प्रसाद जी ने अपने जीवन काल में ११ सुन्दर नाटक निर्माण 
किये । उनका क्रम इस प्रकार है | 


सजन--. रचनाकार १९१० ई० 
करुणालय--- 95 १९१२ ३० 
प्रायश्वित-- 9. १९१३ ई० 
राज्यश्री-- 9. १९१४ ई० 


१५० 


असाद और उनका साहित्य 


इसके अनन्तर प्रसाद जी ने सात वर्ष तक फोई भाटक नहीं 
छिखा। सन्‌ १९२१ ई० में विशाख और २२ में अजातशत्रु लिख 
कर चार वर्ष तक बह फिर नाटककार के रूप में हमारे सामने 
नहीं आए। सन्‌ १९२६ ६० से उन्होंने फिर नाटक लिखना आर- 


सभ कर दिया और उनकी सूची इस प्रकार है। 
जन्मेजय का नाग यज्ञ--१९२६ ई० 
कामसना-- १९२७ ई० 
चन्द्रगुप्त-- १९२८ ई० 
स्कन्द्गुप्त-- १९२८ ई० 
एक घूंट-- १९२९ ई० 


इसके वाद फिर चार वर्ष का अन्तर देकर सन्‌ १९३२ ई० 
में उनका ध्रुव स्थामिनी नाटक लिखा गया; और उसे ही हम 
उनका अन्तिम नाटक कह सकते हैं। इन नाटकों के काल के 
अनुसार ही उनमें ऋमशः कछा का विकास भी द्वोता है। हम , 
उनके सम्पूर्ण नाटकों को चार भागों में विभक्त कर सकते हैं। 


पहला खण्ड 
सज्यन--यह उनका प्रथम नाटक है । इसकी रचना प्राचीन नाठकों 
की शैली के अजुसार ही हुई है। सून्नधार आता है। चारो ओर देख कर- 


अहा ! आज कैसा मंगलमय दिवस है, हमारे प्यारे सजनों की मंडली बेठी 
हुई है, और सत्‌ प्रवन्ध देखने की इच्छा प्रकट कर रही है। तो मैं भी 


१०६ 


भाटक- 
अपनी प्यारी को क्यों बुलाऊँ। नेपथ्य की ओर देस कर प्यारी, अरी मेरी 
प्राणप्यारी ! 

नटी--क्या है | क्या । 


सूत्रधार--यहददी है कि जो है सो. .....सिर सुजलाता है । 
नटी--कुछ कहोगे कि फेवल जो ऐ सो । 


साराश यह कि नाटक उसी पुराने टरें पर चलता हुआ, बात-बात में 
पारसी स्टेज की तरह गद्य के साथ पद्म का पुट देकर आगे बढता हैँ । उदा- 
हरण देखिए । 
दुर्योधन--अद्दा ! हा ! यह स्थान भी कैसा मनोरम है, सरोवर में 
खिले हुए कमलों के पराग से सुरभित समीर दस वन्य प्रदेश को आमोदमय 
कर रहा है। 
नील-सरोवर बीच, इन्दीवर अवली सिली । 


३. 


कण-- सन्ु कामिनी कच घीच, नीलम की बेन्दी लसे। 
हे दुर्योधन-- जलमहेँ परसि सुहात, कुसमित णाखा तरुन की । 
कण-- सन्त दर्पण दरसात, निज चूमत कामिनी । 
दुर्योधन-- सारस करत कलछोछू, सारस को अवलीनमय । 
कणे-- मनु नरपति के गोछ, चक्रवर्तों विहरण करे । 


समष्टि में उनका ग्रथम नाटक हिन्दी रंगमंच की पुरानी रीति नीति के 

साथ ही साथ चलता है, इस नाटक में ५ दृश्य हैं । पांडवों के प्रति 

. पढ्य॑त्र और उनकी हत्या के अयत्न मे दुर्योधन, कर्ण, शकुनी आदि की सहा- 
यता से सफल होना चाहता है । घटनावश दुर्योधन गन्धवराज की आजा 


१५७ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


की अवहेलना कर आखेट के लिये जाता है । गन्धबराज इसी कारण उस पर 
कुंद्ध हो उसे युद्ध में हराकर अपना बन्दी बना लेता है । युधिष्ठिर को पंता 
चलता है। वह अपनी स्वाभाविक सज्जनता वश अजुन की उसको रक्षा के 
लिये भेजते हैं और इस तरह दुर्योधन को मुक्ति मिलती है। 

सज्जन की रचना के पश्चात्‌ प्रसाद ने कहणालय गीत नाट्य लिखा। 
सजन को पढ़ने ही से यह प्रतीत होता है कि आरम्भ में पद्ष की ओर प्रसाद 
की रुचि अधिक थी। सजन में पद्य भाग अधिक है। पात्रों द्वारा पथ में ही 
कई स्थानों में वार्ता होती है। अतएवं गीत नाट्य लिखने की उनकी रुचि 
सज्जन की रवना करते समय ही हुई है, ऐसा विख्वास होता है। 

करुणारूय--अयोध्या के महाराज हरिश्वन्द्र अपने पुत्र रोहित की बह 
देने के लिए प्रस्तुत हो जाते हैं, किन्तु रोहित जंगलों मे भ्रमण करता हुआ, 
अजीगर्त के आश्रम में पहुँचता है। अकाल में सब पीड़ित हैं। रोहित के 
कहने पर एक सौ गाय के बढ्‌छे में अजीगर्त अपने मध्यम पुत्र छः शेफ की 
बलि चढ़ाने के लिए दे देता है। रोहित झनः शेफ को लेकर आता है। 

यज्ञ-मण्डप में हरिश्न्द्र, रोहित, वसिष्ठ, होता इत्यादि बैठे हैं। श॒नःशैफ 
यूप से बंधा हुआ है। शक्ति उसे वध करने के लिए बढता है, पर सहता 
झुक जाता है। 

इस समय झुनः शेफ कारुणिक ढंग से प्रार्थना करता है--दे ज्योतिष्षय- 
स्वामी, क्यों इस विश्व की रजनी में तारा प्रकाश देते नहीं इस अनाथ को, जो 
असह्ायय पुकारता पड़ा दुख के गत बीच अति दीन हो हाय ! तम्हारी केशगी 
को भी क्‍या हुआ जो न दिखाती स्नेह पिता का पुत्र से । 


श्ण्दध 


नाटक 


उसी समय आकाश सें गन होता है। सब शक्तिहीन और चस्त होते 
हैं ।विद्वामित्र का प्रवेश होता है। अन्त में कथा का रहस्य इस तरह खुलता 
है कि विश्वामित्र की गन्धर्व विवाहिता ज्ली सुब्रता के गर्भ से झ॒नः क्षेफ उत्पन्न 
हुआ था और ऋषि आश्रम में उसे छोढ़ कर खुबता अन्त.पुर में दासी वनी । 

शुन शेफ का घन्धन आप से आप खुल जाता है । 

प्रायश्रित्त-प्रसाद जी का तीसरा नाटक है, इसमें जयचन्द के कुचक द्वारा 
वीर पृथ्वीराज का अन्त होता है। केवल ६ दृश्यों में यह समाप्त हो जाता 
है। पृथ्वीराज की चिता जल चुकी है, जयचन्द्‌ अपनी हिंसा की आग बुझाने 
वहां जाता है। उसकी राख को वह अपने पैरों से कुचलना चाहता है । 

कई बार आकाशवाणी होती है। कोई कहता है-प्ृथ्वीराज की खोपड़ी 
एक पिशाच के हाथ में दे और संयोगिता की तू छे, दोनों लड़ा कर देख कौन 
फूठती है। 

संयोगिता की याद कर उसे पश्चाताप होता है। अपने दुष्कर्म के प्राय- 
श्वित के लिए उसे केवछ आत्मवध ही दिखलाई पड़ता है। वह मुहम्मद गोरी 
ऐसे विश्वासघाती के ऊपर आक्रमण करने के लिंए सेना भेज देता है। पुर- 
स्कार में साम्राज्य मिलने की आशा में प्राण भी संकट में पड़ा, यह देख कर 
जयचन्द सब कुछ छोड़ कर गंगा में कूद पढ़ता है। 

श्रायश्वित! में मुझे सब से आश्चर्य की एक बात यह मिली कि मुहम्मद्‌- 
गोरी के दरबार में जो वार्ताछाप होती है, उसकी भाषा उ्दू मिश्रित है। प्रसाद 
के किसी नाटक में खोजने पर भी ऐसी भांघा न मिलेगी, किन्तु यह उनका 
आरम्भिक अयोग है, सम्भवतः इसी लिए ऐसा हुआ हो । देखिए--- 


१०५९ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


मुहम्मद--बहादुर शफुकत १ आज सचमुच हिन्दोस्तान हलाली झंडे के 
नीचे आ गया और यह सब तो एक बात है, दर असल खुदाए पाक को 
जीनत देना मन्जूर है। नही तो भला इन फोलादी देवजादे हिन्दुओं पर फतह 
घाना क्या मुमकिन था 

सज्जन और आयश्वित छोटी नाटिकायें हैं। जैसे छोटी कहानी का प्छाट 
नाटकौय वर्णन द्वारा प्रस्तुत किया जाय तो नाटिका बन जाती है और उप- 
न्यास का प्लाट नाटक के रुप में परिवर्तित करने पर नाटक बन जाता है। 
अतएव ग्रायश्वित और सज्जन नाटकौय कहानियां हैं। 

प्रसाद की इन आरम्भिक रचनाओं पर दृष्टि डालने पर यह भली भांति 
विदिंत होता है कि छेखक कौ प्रतिभा मार्मिक स्थलों पर प्रकाश डालने में 
अत्यन्त अवीण है। 

राज्यश्री-इसकी रचना राज कवि वाण के हर्ष चरित और चौनी यात्री 
सुएनच्वाँग के विवरण के अनुसार ही की गई है। विकटघोष और सुरमा को 
छोड़ कर सभी पात्र ऐतिहासिक हैं । लेखक की भूमिका में यह स्पष्ट है। सुझे 
तो ऐसा अतीत होता है कि विकटघोष ओर सुरमा के काल्पनिक चित्रण में 
प्रसाद अधिक सफल हुए हैं।लेखक के शब्दों के अनुसार इस रूपक का प्रधान 
उद्देश्य राज्यश्री का चरित्र चित्रण है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि राज्यश्री 
का आदी चरित्र सम्पूर्ण हुआ है। 

राज्यश्री के प्रथम संस्करण में केवल तीन अंक ही थे और दूसरे संस्क- 
रण मे कुछ दृश्य और एक अंक वढा दिया गया । शान्ति मिक्छ (विकटघोष ) * _ 
सुरमा ओर सुएनच्वाग ये तीनों पात्र बाद में जोडे गए हैं। यही कारण है 


१६० 


नाटक 


कि उस आरम्मिक रचना में प्रतिमा की परिपक्षता के काल में जोड़े गए पात्र 
अधिक प्रभावशाली हुए हैं। दूसरे संस्करण में नांन्दी आदि को भी स्थान 
नहीं मिला है । 

राज्यश्री कन्नौज के राजा अहवमों की रानी है। राजा का मन उदासीन 
रहा करता है। वह राज्यश्री से कहता है--इस विर्वव्यापी वेसव के आनन्द 
में यह मेरा हृदय सशंक होकर मुझे आज दुबल बना रहा है । 

वह अपने मनोविनोद के लिए सीमाप्रात के जँगलों में अहेर के लिए जाता 
है और मालव सेना द्वारा सीमा पर ही उसका अन्त होता है। इधर मालव का 
राज्ञा देवगुप्त अपनी सेना सहित घडयंत्र द्वारा राज्यश्री और ढुगे पर अधि- 
कार कर लेता है । 

राज्यश्री का भाई स्थाण्वीइवर का बड़ा राजकुमार राज्यवद्धंन सेना के 
साथ अपनी बहन की सहायता के लिये आता है। गोड़ का राजा नरेन्‍्द्रगुप् 
भी सहायक होता है । देवगुप्त अपना अधिकार जमा कर सुरमा के साथ 
मदिरा पान कर रहा था। 

शान्तिदेव अब विकटघोष बन कर राज्यश्री को बन्दी घर से निकाल ले 
जाता है। देवगुप्त मारा जाता है। नरेन्द्रमुप्त अपने स्वार्थ के लिए ग्रलोभन 
दे कर विकटथोष और सुरमा द्वारा राज्यवद्धन की हत्या कराता है और अन्त 
में बह भी मारा जाता है। 

विकटघोष सुर॒मा को पाकर हत्या आदि अपराधों में और भी अधिक 
उत्साह से भाग लेता है। राज्यश्री को दो डाकू साथियों के आधीन छोड़ कर 
विंकटघोष धन की लालसा में व्यग्न रहता है । 


११ १६१ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


दिवाकर मित्र के द्वारा राज्यश्री डाकूओं से मुक्त होकर उसी महात्मा के 
आश्रम में रहती है। राज्यवरद्धन का छोटा भाई हर्षवर्द्धन अपनी वहन का पता 
लगाते हुए वहा पहुँचता है। राज्यश्री उस समय अपने जीवन का अन्त करना 
चाहती थी, किन्तु हर्षवर्धन के बहुत समझाने पर राज्यश्री मानव जाति के 
कल्याण कौ कामना लेकर जीवित रहना स्वीकार करती है । हर्षवर्दन ओर 
राज्यश्री दान में अपनी सम्पत्ति बांट देते हैं । दोनों बोद्ध धर्म महण करते हैं । 

हर्षवर्दन धर्म राज्य का शासन करने के लिए राज मुकुट ओर दण्ड 
अहण करता है । 


दूसरा खण्ड 


प्रसाद के भ्रथम काल में रचित नाटक अथवा रूपक विशेष महत्व पूर्ण 
नहीं हैं। उनमें उस महान लेखन कला और भावुकता का अंकुर मात्र ही 
'दिखलाई पड़ता है। द्वितीय काल में पदार्पण करते ही 'विशाख' से उनका 
ऐतिहासिक अन्वेषण भी आरम्भ होता है । 

विशाख को ही पहला नाटक समझना चाहिये, क्योंकि राज्यश्री भी 
'नाटिका के रुप में ही है, संस्कृत साहित्य को लरब्घ श्रतिष्टित राजतर॑ंगणी की 
एक ऐतिहासिक घटना पर ही विद्ञाख की रचना हुई है। 

प्रमाणों द्वारा प्रसाद ने यह निर्णय किया है कि यह घटना सम्बत्‌ १८०० 
वर्ष पहले की है। उस समय कौ रीति नीति का परिचय देना कठिन है, फिर 
भी जहाँ तक हो सका है, उसी काल का चित्रण करने का प्रयल किया 
गया है । 


श्द््र 


नाटक 


आगे चल कर हम प्रसाद के सभी नाटकों में देखते हैं कि पात्रो की वातों 
के सम्बोधन, उनकी वेश भूषा और उनका नागरिक जीवन इत्यादि सभी वातों 
में उस काल का चित्रण करने मे प्रसाद हिन्दी साहित्य के सफल लेखक हैं । 

अपने ऐतिहासिक पात्र पात्रियों के जीवन के मिन्न-मिन्न अंगों पर प्रकाश 
डालने की आवश्यकता के कारण, प्रसाद को ऐतिहासिक अन्वेषण की ओर 
बढ़ना पढ़ा। यही कारण है कि उनके कल्पित पात्र भी कही-कही ऐतिहासिक 
पात्रों की समानता करते हुए दिखलाई पढ़ते हैं । 

ब्राह्मण नागरिक विशाख से कल्पित भहापिज्वल कहता है--मैसे नाटकों 
के पान्न स्वागत जो कहते हैं, वह दर्शक समाज वा रंग-मंच सुन लेता है, पर 
पास का खडा हुआ दूसरा पात्र नही सुन सकता, उनकी भरत बाबा की शपथ 
है, उसी तरह राजा की बुद्धि देश-भर का न्याय करती है, पर राजा को न्याय 
नहीं सिखा सकती । 

विशासख--थुरुकुल से शिक्षा समाप्त करके, काइमीर के राजा नरदेव के राज्य 
में ब्राह्मण नागरिक विशाख अ्रमण करता है। एक दिन चन्द्रलेखा से उसका 
सामना होता है । सुन्द्री चन्द्रलेखा नाग सदर सुभ्रवा की कन्या है। राजा ने 
उसकी समस्त भूमि छीन कर बोद्ध विहार को दे दी थी। वह निराश्रय होकर 
अपनी दोनों पुत्रियों चन्द्रढेखा ओर इरावती के साथ किसी तरह अपना दिच 
काट रहा था । घटनाक्रम के अनुसार कानीर विहार का बोद्ध महन्त सत्यज्षील 
एक दिन चन्द्रलेखा के सोन्दर्य पर मुग्ध होकर उसे अपने विहार में बन्दिनी 
बनाता है। 

विज्यास्र के प्रयज्न से किसी तरह वह मुक्त होती है तो राजा नरदेव उस 


श्हव३ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


पर आकर्षित होता है। अन्त में प्रजा का विद्रोह राजा का सुधार करता है। 
विशाख, चन्द्रढेखा के साथ गृहस्थी बना कर सुखी होता है। 

अजातशब्ु--अजातशत्रु का यह सप्तम संस्करण है। इसके प्रत्येक संस्क- 
रण में लेखक ने संशोधन और कुछ परिव्तेन किया है। अतएवं इस नाटक 
में आरम्मिक कृति की झलक नही दिखलाई पड़ती है। 

प्रसाद के नाटय कला सम्बन्धी सिद्धान्तत अजातशतन्नु से ही आरम्भ होते 
हैं। अजातश्नत्रु में अधिक सफलता का एक कारण यह भी है कि उसका 
कथानक अन्तरदुन्द्र की डोर में इस तरह बँधा हुआ है. कि कहीं से भी शिथि- 
लता आने नही पाई है । 

यह स्पष्ट है कि प्रसाद की 'रुचि बोद्ध धमौवलम्बित शासकों का चित्रण 
करने में अधिक रही है। मैंने प्रायः उन्हें बौद्ध साहित्य और इतिहास का 
अध्ययन करते देखा है। अजातशत्रु के कथा प्रसंग में प्रसाद स्तय॑ लिखते हैं- 
भारत का ऐतिहासिक काछ गौतम बुद्ध से माना जाता है, क्योंकि उस काल की 
बौद्ध कथाओं में वर्णित व्यक्तियों का पुराणों की वंशावलौ में भी असंग आता , 
है । इसलिये छोग वही से श्रामाणिक इतिहास मानते हैं । 

कथाभाग--मगघ के सम्राट विम्बसार की दो रानियाँ थी, वासवी और 
छलना। छलना को प्रेरणा ओर कुचकों द्वारा ही उसका पुत्र अजातशत्रु सम्राट 
होता है, और विम्बसार अपना अधिकार छोड़कर भगवान्‌ की उपासना में दिन 
व्यतीत करते हैं । गोतम बुद्ध के उपदेश से ही ऐसा होता है । 

वासवी अपने पति को नि सहाय अवस्था में देखकर दहेज में कौशल 
नरेश से मिली हुई काशी प्रान्त की आय, अपने पति के लिये सुरक्षित रखना 


१६४ 


नादक 


चाहती है। इसी प्रश्न को लेकर मगध और कौशल में युद्ध छिड़ता है। 

अजातशन्रु की भांति कोशल नरेश का पुत्र विरुद्धक भी पिता के विरुद्ध 
विद्रोह करता है। डाकू बन कर महिका के पति कोशल सेनापति वंधुल की 
इत्या काशी जाकर करता है। इसमें दो रहस्य हैं, एक तो मह्लिका के प्रति वह 
आकर्षित था, दूसरे अजातशच्चु का सहायक हुआ। 

वासवी को पुन्नी पद्मावती का विवाह कोशाम्वी के राजा उदयन से हुआ 
था। उसकी तीन रानियोँ थी। मागन्धी के घडय॑त्र से उदयन पद्मावती की 
हत्या करने को प्रस्तुत होता है। उस पर झूठा अपराघ लगाया जाता है कि 
वह सर्प द्वारा राजा का प्राण लेना चाहती है, किन्तु रहस्य खुल जाता है। अन्त 
में उदयन पद्मा से क्षमा मॉगता है ओर मागन्धी वहाँ से भाग जाती है। वह 
काशी में आकर वेश्या बनती है। विरुद्धक जो अब शैलेन्द्र डाकू के नाम से 
विख्यात है, उस पर वह र्यामा वेश्या आसक्त द्ोती है। अन्त में एक दिन 
शैलेन्द्र गला दवा कर उसे मरी समझ कर चला जाता है, किन्तु भगवान्‌ बुद्ध 
की शक्ति से वह जीवित होती है और मिछणी बन जाती है । 

राजा प्सेनजित्‌ और उदयन दोनों मिछकर मगध पर आक्रमण करते हैं। 
अजातशत्रु बन्दी बना कर कोशल भेजा जाता है। एक दिन अचानक 
अजातशज्नु को वन्दी गृह में देखकर कोशल कुमारी बाजिरा उस पर भुझ्घ 
होती है, और उसे मुक्त करना चाहती है, किन्तु उसी समय वासवी और 
कोशल नरेश वहाँ आकर अजातश्नत्रु को मुक्त करते हैं। वासवी इसी प्रयत्न के 


ढछिए कोशछ गई थी। वाजिरा से अजातशञ्नु का विवाह करा कर वासवी दोलों 
को लेकर मगध लौठती है। 


श्दद 


असाद और छउनका साहित्य 


कोशल सेनापति की हत्या सें राजा प्रसेनजित्‌ का सी कुछ हाथ था, किन्तु 
मह्लिका उसे क्षमा कर देती है और उसी के प्रयत्न से विरुद्क तथा उत्तकी 
माता को भी राजा क्षमा करते हैं। 

अजातदात्ु को जब पुत्र उत्पन्न होता है,-.तब वह पिता के महत्व को सम- 
झता है और विम्बसार के सम्मुख जाकर क्षमा सागता है । 


तीसरा खण्ड 


जनमेजय का नाग यज्ञ--कलियुग के आरम्भ काल की यह पौराणिक 
चटना है। भगवान कृष्ण के आदेशाहुसार अझ्छुन ने खाडव वन में आग लगा 
कर नायों की भस्म किया । उसी को प्रतिहिंसा रूप में नागराज तक्षक द्वारा 
अजुन के पुत्र राजा परिक्षित भारे गये थे । 
परीक्षित का पुत्र जनमेजय अपने पिता का बदला लेने के लिये नाग जाति 
का विष्वंस करना चाहता था । 
वेदऋषि के गुरुकुछ में अपनी शिक्षा समाप्त करने पर उत्तंक गुत्दक्षिणा 
के लिये प्रस्ताव करता है। गुरुदेव कहतें हैं कि में तुम्हारी तेजस्विता से असन्न 
हूँ, अपनी गुरुपल्ी से पूछो | दामिनी उसे अपनी वासना का शिकार वनाने मे 
असमर्थ हो कर उससे रानी का मणिकुंडल चाहती है। 
लोभी काइयप अपनी झुमन्त्रणा के कारण पुरोहित के स्थान से हटाने पर 
मी महाभिषेक की दक्षिणा राजा द्वारा प्राप्त करता है । 
रानी वपुष्टया की दान झीलता के कारण उत्तंक को मणिकुंडल मिल जाती 
- है, किन्तु तक्षक को काइयप से जब यह पता चलता है कि उससे हरण की हुई 


१६६ 


नाटक 


मणिकुंडल उत्तंक के पास है तो वह उसकी हत्या करके उसे लेना चाहता है। 
सहसा वासुकी और सरमा के आ जाने पर वह ऐसा नहीं कर पाता । उत्तंक 
मणिकुण्डल गुरुपली को देता है। 

एक दिन शिकार खेलने जनमेजय जाता है और घोखे से वाण लगने के 
कारण जरत्कार ऋषि की र॒त्यु हो जाती है। ब्रह्मह॒त्या के आ्रायश्वित स्वरूप 
अव्वमेध यज्ञ की योजना होती है, उसी समय तक्षक की कन्या सणिमाला को 
जनसेजय देखता है। दोनों एक दूसरे पर आकर्षित होते हैं । 

उत्तंक राजा के यहाँ जाकर उसे तक्षक के प्रति उत्तेजित करता है । जन- 
मेजय प्रतिज्ञा करता है कि अख़मेघ के पहले नाग यज्ञ होगा। अपने तीन 
भाइयों को तीन ओर अश्वमेध यज्ञ के लिये विजय प्राप्त करने के हेतु मेजता 
है और स्वयं नाय जाति पर आक्रमण करता है। 

काइ्यप के स्थान पर सोमश्रवा राज पुरोहित होता है और काइयप तक्षक: 
से मिल कर राजा के प्रति षडयंत्र र्वता है। जरत्कारु ऋषि की पत्नी, नाग 
सरदार वासुकी की वहन मनसा, वासुकी की यादवी पत्नी सरमा और दोनों के 
पुत्र माणवक ओर आस्तीक भी इस षडयंत्र में सम्मिलित होते हैं। नागों 
द्वारा रानी और अश्वमेघ का घोड़ा पकड जाता है। युद्ध होता है। तक्षक 
इत्यादि पकड़े जाते हैं। काइयप की कुटिल नीति के कारण राजा ब्राह्मणों के 
निर्वासन की आज्ञा देता है और अस्वमेध के पहले नायों को आहुती में देना 
निश्चित होता है। उसी समय वेदव्यास वहाँ आते हैं ओर उनके उपदेश के 
कारण जनसेजय अपना विचार बदलता है। वेद्व्यास रानी की पवित्रता का 
प्रमाण देते हैं। अन्त में रानी द्वारा ही तक्षक की पुत्री मणिमाल्ता से जनमे- 


१६७ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


जय का विवाह होता है। उसी समय से आर्य और नाग जाति दोनों सम्मि- 
लित ह्वोती हैं ! 

कासना--क्रामना जैसी उत्कृष्ट रवना केवल दो सप्ताहों में ही समाप्त को 
गई थी। श्रसाद की भावुकता उन दिनों उच्च शिखर पर पहुँच गई थी। वह 
दिन रात अपनी कल्पनाओं में छीन रहते थे । बातें करते हुए भी वह अपरी 
नोटबुक में कुछ लिख लिया करते थे। 

कामना पाइचात्य दृष्ान्त की कथा के ढंग का रूपक है। जिसमें निए- 
कार भावनायें एवं विचार साकार पात्नों के रूप में प्रकट होकर किसी सिद्धान्त 
की स्थापना करता है । 

समुद्र तट पर फूलों का एक द्वीप है, वहाँ के निवासी सांसारिक अपराधों 
और माया से मुक्त हैं। वे प्रकृति के अंचल में फूले-फले हैं। एक दिन विदेश 
से नाव पर बैठा हुआ एक युवक भाता है। कामना उसे देखती है । युवक 
विलास अपना स्वर्ण पट खोल कर युवती कामना के सिर परभी बाँध देता है । 

तारा की इन भोली भाली संतानों में स्वणे ओर मदिरा का प्रचार करके 
विल्लास उन्हें अपनी ओर आकषित करता है। 

लीला भी चमकीली वस्तु स्वर्ण की चाह करती है। कामना उसे दिलाने 
का वचन देती है। संतोष के साथ निश्चित होने पर भी कामना की इृच्छानुसार 
विनोद के साथ लोला का विवाह होता है । 

कामना वहाँ के छोनों की उपासना का नेतृत्व करती थी। विलास उसे 
रानी वना कर नवीन शासन कौ व्यवस्था करता है। विनोद राज्य का सेना- 
पति बनाया जाता है । 


श्ध्ट 


नाटक 


विवेक सब को सावधान करता है, लेकिन उसे पागल समझ कर कोई 
. उसको बात नहीं सुनता । 

शान्तिदेव के पास बहुत सा सोना है। अतएव कुछ लोग उसकी हत्या 
करते हैं। अपराध की सृष्टि होती है। कारागार की उत्पत्ति होती है । 

- सन्तोष विवेक से कहता है--छिपकर वातें करना, कानों में मंत्रणा करना, 
छुरों की चमक से आँखों में त्रास उत्पन्न करना, वीरता नाम के किसी अदू- 
भुत पदार्थ की ओर अंधे होकर दौड़ना युवकों का कर्तव्य हो रहा है। वे 
शिकार और जुआ, मदिरा और विलासिता के दास होकर गव॑ से छाती फुलाये 
घूमते हैं, कहते हैं, हम धीरे-धीरे सभ्य हो रहे हैं। 

कामना विलास को चाहते हुए भी उससे विवाह नही कर पाती । रानी 
की पविन्नता के नाम पर वह अविवाहित रहती है । छालसा के साथ विलास 
का विवाह होता है । 

स्वर्ण के लिये युद्ध होता है। स्वर्ण और ज््री, विजय में मिलती है । 
विलासिता का प्रचार इतना बढ जाता है कि नागरिक जीवन मे पुत्र पिता से 
मदिरि मांगता है । 

अन्त में भूकम्प से नगर का वह भाग उलछट पलट हो जाता है। 

विवेक की बातें अब लोगों के समझ में आने छगी, वह कहता है--उस 
दिन भ्रतीक्षा में कठोर तपस्या करनी होगी, जिस दिन ईख़र और मनुष्य, 
राजा और श्रजा, शासित और झासकों का भेद विलीन होकर विराट विर्व, 


जाति, और देझ के वर्णो से स्वच्छ होकर एक सधुर मिलन क्रीडा का अमि- 
नय करेगा 


१६९ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


बहुत से छोग अपने स्वणोभूषण और भदिरा के पात्र तोडते हैं। 
बिलास और लालसा नौका पर बैठ कर अन्य देश में जाना चाहते हैं। सब 
नागरिक उस पर स्वर्ण फेंकते हैं। नाव डगमगाती है । | 

कामना, सन्तोष का हाथ पकढ़ती है । 

स्कन्दणुप्त विक्रमादित्य--ऐतिहासिक नाटक है। अजातशत्रु कौ तरह 
इसमें भी अन्तरद्वन्द् को प्रधानता है। बड़ी रानी देवकी के प्रति अनन्तदेवी 
छोटी रानी का षडयंत्र चलता है। मगध सम्राट्‌ कुमारगुप्त विछासिता के 
कारण शासन व्यवस्था पर ध्यान नहीं देते । 

युवराज स्कन्दगुप्त का राज्य के प्रति उदासीन भाव रहता है। वह सम 
झतें हैं कि अधिकार सुख कितना मादक और सार-हीन है । 

इधर भालव नरेश विख्वकम्मों की युद्ध में सहायता करने के लिये स्कन्द- 
गुप्त जाता है और पुष्प मित्रों के आक्रमण से सेनापति पर्णदत्त समस्त सेना 
लेकर मगध को सुरक्षित रखेंगे। 

अनन्तदेवी अपने पुत्र पुरगुप्त को राज्याधिकारी बनाना चाहती है। 
उसके षडयंत्र में महा सेनापति मटाक भी सम्मिलित होता है, किन्तु यह 
समाचार गुप्त रखा जाता है । 

मंत्री प्थ्वीसेन, महा दण्डनायक और भहा श्रतिहारी सहसा रोकने पर 
भी प्रवेश करते हैं । वही अन्तर्विद्रेह न करके तीनों छुरा मार कर आत्म- 
हत्या करते हैं । 

अनन्तदेवी के कुचकों द्वारा देवकी की हत्या का पडयंत्र सवा जाता है, 
किन्तु ठीक समय पर स्कन्दगुप्त के आ जाने पर वेसा नहीं हो पाया। 


१७० 


नाटक 


स्कन्दगुप्त अपनी माता के साथ उजयिनी जाता है। सम्राट्‌ होने पर 
स्कन्दगुप्त अपराधियों को क्षमा करता है । ; 

बौद्ध कापालिक प्रप॑च बुद्धि इमशान पर एक बलि देना चाहता है।' 
बिजया अपने द्वेष के कारण बहला कर देवसेना को वहाँ छे जाती है, किन्तु 
उसी समय स्कन्दगुप्त वहों पहुंच कर उसे बचाता है। 

म्लेच्छ राज्य का विध्वंस होता है। अनन्तदेवी हों से मिल कर 
स्कन्दगुप्त पर आक्रमण कराती है। मटारक गहरा धोखा देता है। स्कन्दगुप्त 
और उसको सेना शत्रु का पीछा करते हैं, किन्तु बांध तोढ़े जाने के कारण 
सब नदी में बह जाते हैं। 

स्कन्‍्कगप्त बहुत दिनों तक इधर उधर भटकता है। देवकी का अन्त 
होता है। विजया स्कन्दणुप्त से प्रेम का तिरस्कार पाकर आत्महत्या करती 
है। मालव कुमारी देवसेना भीख मांग कर दिन काट रही थी। स्कन्दगृप्त 
को रत्नगृह प्राप्त होता है। मटाक पश्चाताप करते हुए आत्महत्या करना चाहता 
है । स्कन्दगुप्त के रोकने पर वह फिर से सेना का संकलन करता है। हूणों से 

फिर युद्ध होता है। स्कन्द्गुप्त विजयी होकर आजीवन अविवाहित रहता है । 

चन्द्रगुप्त--चन्द्रगुप्त नाटक में चाणक्य का विशेष स्थान है । तक्षशिला 
के गुरुकुल में मगघवासी चन्द्रगुप्त, मालव राजकुमार सिंहरण, गान्धार के 
राजकुमार आम्भीक, राजकुमारी अलका तथा चाणक्य एक दूसरे से परिचित 
होते हैं। 

सगध नरेश नन्द विछासिता तथा अत्याचार का प्रदर्शन करते हुए 
शकटार, चाणक्य तथा मौय्ये आदि प्रतिष्ठित राज्यकर्मचारियों को बन्दी बनाता 


१७१ 


असाद और उनका साहित्य 


है। चाणक्य तथा चन्द्रगुप्त नन्द की राजसभा में यवनों के प्रतिकार का 
सुगम उपाय बताते हैं, किन्तु मगध नरेश द्वारा वह अस्वीकृत होता है। 
“शिखा खीची जाने पर, चाणक्य नन्दवंश के नाश की प्रतिज्ञा करता है। 

आम्भीक सिकन्दर का पक्ष लेता है तथा पर्वतेश्वर सिकन्‍्दर के विरुद्ध 
रहता है। बीच ही में पोरव तथा सिकन्द्र से सन्धि हो जाती है। चाणक्य 
पर्वृतेश्वर का साथ छोड़कर कूटनीति को प्रारम्भ करता है। मालव तथा झूदक 
मैत्री कर, चन्द्रगुप्त के सेनापतित्व में सिकन्द्र को रोकने का अय्न करते हैं। 
-मालब दुर्ग में सिकनन्‍्दर घायल होता है. और छौटा जाता है। सिंहरण तथा 
अलका वैवाहिक बन्धन में बँध जाते हैं। 

कल्याणी, मालविका तथा कार्नेलिया तीनों ही चन्द्रगुप्त के प्रति आकर्षित 
'होती हैं और चन्द्रगुप्त मी उनके श्रति आकर्षित माहस पड़ता है। चाणक्य 
पर्वतेश्वर को आत्महत्या करने से बचाता है और आधे मगध का लोभ देकर 
“अपनी तरफ कर छेता है। राक्षस को भी छल से वह रोक रखता है। मगध 
"में विप्लव की सम्पूर्ण तैथ्यारी हो जाती है। 

चाणक्य के कुछुमपुर पहुंचने पर शकटार, भालविका, मौय्ये, वररुचि 
“आदि, शकटार के बनाए हुए मार्ग से, बन्दीश॒ह से बाहर आते हैं। चाणक्य 
"की कूटनीति से राक्षस नन्द द्वारा बंदी किया जाता है। इससे अजा में उत्ते- 
-जना फैलाई जाती है। राजसभा में सभी पहुंचते हैं। नन्‍्द पहले तो बंदी 
किया जाता है। परचात्‌ शकटार द्वारा मार दिया जाता है। परिषद चन्द्रगुप् 
“को गद्दी देता है। कल्याणी द्वारा पर्वतेखर मारा जाता है तथा वह स्वयं भी 
आत्महत्या कर लेती है। 


श्र 


नारक 


चन्द्रगुप्त के दक्षिणापथ विजय करके लोटने पर राक्षस उसे मार डालने 
का पडयन्त्र रुवता है, किन्तु उसके स्थान पर मारी जाती है--मालविका । 
. सिकनन्‍्दर के मरने पर सेल्यूकस भारत पर चढ़ाई करता है। आम्भीक की 
सहायता से चन्द्रगुप्त युद्ध में सेल्यूकस को बन्दी बनाता है। दोनों में सन्धिः 
होती है. और कार्नेलिया से चन्द्रगुप्त का विवाह होता है। राक्षस को प्रधान 
सन्त्री नियुक्त कर, चाणक्य बन को चला जाता है। 

एक घूंद--स्वास्थ्य, सरकता तथा सोन्दय के प्राप्त कर छेने पर प्रेम-प्याले' 
का एक घूंट”! पीना पिलाना ही आनन्द है। इसकी पूर्णता वंधन-युक्त होने 
ही पर सम्भव है । 

अरूणाचल आश्रम का एक सधन कुछ है। बनलता बैठी हुई, नेपथ्य में होते 
हुए गाने को ध्यान पूर्व॑क सुन रही है। वह समझती है-रसाल उसको भूल गया है । 
रसाल आनन्द के स्वागत में होने वाले अपने व्याख्यान की सूचना बनलता को 
देता है । 

आनन्द स्वच्छन्द प्रेम का उपासक है। आश्रम में कुछ दिनों से इसीकाः 
प्रचार कर रहा है । 

व्याख्यान होने पर चन्दूल विदूधक अपने वेवाहिक जीवन का उल्लेख 
करते हुए, नियमित प्रेम की सफलता दिखलाता है। झाड्ू बाला भी अपनीः 
सनी के साथ आकर बन्धन युक्त ग्रेम का समर्थन करता है। 

बनलता अपने अभाव पर विचार कर रही है। आनन्द उससे प्रेम के 
प्याले की एक घूँट माँगता है। छिपा हुआ रसाल प्रकट होकर बनलता के 
साथ एक हो जाता है। 


१७३ 


असाद और उनका साहित्य 


आनन्द चिरपरिचित की खोज में निमग्न, प्रेमलता के हाथ से एक 
शूंटः पीकर अपने स्थच्छन्दू प्रेम को बॉधता है । 


चौथा खरखड 


प्र॒वस्वामिनी- यह्द असाद जी का अन्तिम नाटक है ! 

गूंगी वनी हुई दासी, एकान्त में, प्रुवस्वामिनी से चन्द्रगुप्त का प्रेम वत- 
लाती है। रामगुप्त छिपा हुआ सब छुनता है । 

मंत्री शिखर स्वामी शकराज की संधि की शर्तों को खनाते हैं। महादेवी 
के साथ अन्य ख्रियों भी सन्धि में मॉगी जाती हैं। 

रामगुप्त शर्तें! से सहमत हो जाता है । ध्रुवस्वामिनी आत्महत्या के लिये 
अस्तुत होती है । 

चन्द्रगुप्त छश्नवेपी सामन्‍्त कुमारों के साथ, ध्रुवस्वामिन्ी के रूप में जाता 
है। शकराज को भार कर दुर्ग पर अधिकार कर लेता है । 

राज्यपरिषद के निर्णयाहुसार रामगुप्त के स्थान पर चन्द्रगुप्त राजा घोषित 
होता है। 

रामगुप्त धोखे से चन्द्रयुप्त को मारना चाहता है, किन्तु एक सामन्त 
कुसार द्वारा खय॑ मारा जाता है । 


श्ष्ष्ट 





प्रसाद जी के निबन्धों को हम तीन श्रेणी में बांट सकते हैं, 
पहली श्रेणी में वे पांच कथा प्रबन्ध हैं, जो आरम्भिक काल में 
लिखे गये हैं और “चित्राधार! में प्रकाशित हुए हैं, इन कथा प्रब- 
न्‍थों में पहले “बह्मर्षि' में विश्वामित्र और वशिष्ठ के इन्द्र का 
कथानक है, वशिष्ट की महानता के कारण विश्वामित्र स्वयं 
लज्त होते हैं, दूसरी पंचायत में स्कन्द और गणेश दोनो में कौन 
बड़ा है, इसका निर्णय कराने के लिए नारद; शंकर के पास जाते 
हैं। अन्त में ज्रह्मा इसका निर्णय करते हैं कि जो इन दोनों में से 
समस्त विश्व की परिक्रमा करके पहले आवेगा, वही बड़ा होगा, 
गणेश जी विज्ञयी होते हैं । 

शेष तीन गद्यकाव्य के रूप में हैं प्रकृति सौन्दर्य” में कवि की 
जिज्ञासा देखिए-- 

ओर यह क्या * देवि | यह कैसा अदभुत दृश्य | कहां वह इ्याम-घन 
में सौदामिनि माला, कहां स्वच्छ नील गगन में पूर्ण चन्द्र ! अहा यह मुझे 


श्७५ 


प्रसाद भौर उनका साहिद 


ही अमर हुआ, यही तो शारदीय स्वरुप हैं ! वह देखो भगरों को सोमा के 
बाहर तथा नदी के तट पर कास का विकास, और निर्मेल जल-पूरित नदियों 
का मन्द अवाह, शारदीय चन्द्र का पूर्ण अकाश, सरोवरों में संरोजगण का 
विकास, कुछ शीत वायु, छिटकी हुई चन्द्रिका का हरित वृक्ष, उच्च आसाद नहीं, 
पर्वत, कटे हुए खेत, तथा मातृ धरणी पर रजत मार्जित आभास ! वाह | 
वाह ! यह कैसा नटी की तरह यवनिका परिवरततेन ) शीत का हृदय कंप्ाने 
वाला वेग, हिम पूरित वायु का सन्नाटा, शस्यक्षेत्र में मुक्ताफछ समान जोस 
की दूँदे, उन पर प्रभात सूर्य किरण की छाया। यह सव दृश्य कैसा आनन्द 
देता है, पुनः कृष्ण पक्ष के शिशिर शर्व॑री में गंभीर शीतवादु का प्रवन्ड वेग 
गाढ़ान्धकार, जिसमें कि सामने की परिचित वस्तु देखने में भी वित्त मय से 
कांप जाता है। 

सरोज! का अन्तिम अंश हैं--तुस से बढ़ कर संसार कानन में अन्य 
कौन कुसुम है 

'भक्ति में लेखक भगवान्‌ के प्रति अपना प्रारम्भिक ज्ञान इस तरह उप- 
स्थित करता है--मक्ति क्या है? भक्ति ईख़र में अनन्य ग्रेम को कह सकते 
हैं और भक्ति को परीक्षा ज्ञाय भौ फह सकते हैं, ज्ञान के विना भुफ्ति नहीं 
होती, किन्तु सुक्ति से क्या है, मुक्ति से मह॒ष्य इख़र से मिल सकता है। 

ऊपर के उद्धरणो से सहसा विश्वास नहीं होता कि प्रसाद के 
ढिखे हुए ये प्रबन्ध हैं, कारण उनकी शैली आकर्षक नहीं, उनके 
भाव विशेष उज्जवछ नहीं हैं और उनकी भाषा साधारण है, किंठु 
यह मानना पड़ेगा कि यह उनके युवावस्था के लिखे हुए गध का 


१७६ 


निबन्ध 


उदाहरण है । आगे चल कर उनके भाव कितने गहन और साषा 
कितनी प्रांजल हुईं है, यह हम भछीभांति समझते हैं । 
दूसरी श्रेणी में हम उन निबन्धो को रख सकते हैं, जो उन्हों- 
ले अपने नाटकों की भूमिका के रूप में लिखा है अथवा यह कहना 
चाहिये कि उन्हीं निबंधों के अन्वेषित ऐतिहासिक आधार पर ही 
उन नाटकों की रचना हुई है। चंद्रगुप्त, स्कन्दगुप्त, अजातशन्रु, राज्यश्री 
और घुवस्वामिनी का कथा प्रसंग अथवा भूमिका भाग पढ़ने ही से 
प्रखाद जी की अध्ययन शीछता और प्रकांड बिह्वत्ता का पता चलता है। 
प्रसाद जी का एक और ऐतिहासिक लेख 'प्राचीन आर्यावतें 
और उसका अथम सम्राद! कोषोत्सव स्मारक प्रंथ में प्रकाशित 
हुआ था। कामायनी महाकाव्य समाप्त करने के पश्चात इन्द्र! 
पर एक नाटक लिखने का उनका विचार था। उस नाटक के छिए 
जो सामग्री उन्होंने एकन्नित की थी, उसी का साराशं इस लेख में 
: है। इस छेख में उन्होंने प्रमाणित किया है कि (इंद्र! ही प्राचीन 
आयोववते के प्रथम सम्राद्‌ थे। यहां उसका अन्तिम अंश देना मैं 
आवश्यक समझता हूँ। 
वह आये सभ्यता के इतिहास का प्रारंभिक अध्याय है, जब इंद्र ने आत्म- 
वाद का प्रचार किया, अछुरों पर विजय भ्राप्त की और आयावत में साम्राज्य 
स्थापन किया | 
त्रिसप्क प्रदेश कौ बसनेवाली मिन्न-मिन्न आर्य संस्थाओं का, जो अपना 
स्वतंत्र शासन करती थीं और आपस में लब्ती थी, सम्राट्‌ बन कर इंद्र ने 


श्र श्ष्७ 


प्रसाद भौर उनका साहित्य 


एक में व्यूहन किया और वैदिक काल की भरत, तृत्सु, पुर आदि वौर मंद- 
लियां एक इंद्रप्वज की छाया में अपनी उन्नति करने लगी। संसार में इंद्र पहले 
सम्राट्‌ थे । पिछले काल में असुरों ने उन प्राचीन घटनाओं के संस्मरण से 
अपना पुराण चाहे विकृत रूप में बनाया हो, परंतु है वह सत्य इतिहास, 
आया का ही नही, अपितु मनुष्यता का, जब मनुष्य में आकाशी देवता पर 
से आस्था हटा कर आरयसत्ता का विश्वास उत्पन्न हुआ | 

तीसरी श्रेणी में प्रसाद के अन्य आठ निबंध हैं, जिनका 
संग्रह उनके स्वर्गबास के वाद प्रकाशित हुआ है। काव्य और कला 
तथा अन्य निबंध ही उनकी अन्तिम पुस्तक मानी जाती है। प्रसाद 
के प्रथम श्रेणी, और तीसरी श्रेणी में रखे गये निवं॑धों में लगभग 
बीस वर्ष के समय का अंतर पड़ता है । बीस वर्षो में लेखक की 
प्रतिभा और शैली का विकास, अपनी पूर्णता तक पहुँच जाता है। 
यह आरंभिक और अन्तिम रचनाओं का अध्ययन करने पर भी- 
भांति ज्ञात हो जाता है। 

प्रसाद के इसी निबंध संग्रह के आधार स्वरूप हसने उनका 
सिद्धांत और मत इस पुस्तक में उपस्थित किया है। अतएवं अब 
यहां फिर से उनके संक्षिप्त विवरण की आवश्यकता नहीं प्रतीत 
होती । केवल निबंधों की सूची ही पर्याप्त होगी--१., काव्य और 
कला २. रहस्यवाद ३. रस ४. नाटकों में रस का प्रयोग ५, नाटकों 
का आरंभ, ६. रंगमंच, ७. आरंभिक पाठ्य काव्य, ८, यथार्थवाद 
और छायावाद । 


९७८ 


निबन्ध 


इसमें कोई संदेह नहीं है कि अपने ढंग की यह अकेली 
रचना है और हिंदी में साहिल की आलोचना का बदला हुआ 
दृष्टिकोण अपने वास्तविक रूप को परखने में समर्थ होगा । 





१७५९ 





लेखक की कृति पढ़ते समय तीन घातों पर ध्यान अवश्य 
ही रखना पढ़ता है; उसके भाव व्यक्त करने की प्रणाली, 
शब्दों का संकलन तथा वाक्य-रचना और विपय प्रसंग। यही 
साहित्य में ऋमशः शेली, भाषा तथा विषय के नाम से प्रसिद्ध हैं । 
इनमें भाषा और शेली श्रमुख हैं । इस लिए इनका स्पष्टी करण 
आवश्यक है | 
शब्दकोष में एक ही शब्द के अनेक पय्योयवाची शब्द होते हैं; 
किन्तु भ्त्येक पय्योयवाची शब्द द्वारा भिन्न-भिन्न चित्र अंकित होते 
हैं. और प्थक-प्रथक भावों की अभिव्यक्ति होती है। यदि केवल 
पय्योयचाची होने ही के कारण एक शब्द के स्थान पर दूसरे शब्द 
का प्रयोग किया जाय, तो यह सम्भव नहीं कि लेखक अपने भावों 
को उचित रूप से व्यक्त कर सके। अतएव शब्दों का संकलन 
लेखक के लिए आवश्यक है। उन्हीं शब्दों का प्रयोग किया जाय, 
जिनके द्वारा अभिलिषित भाव पूण्ण रूप से व्यक्त हों । 


१८० 


भाषा और शेली 


शब्दों के संकलन में केवल यही एक बात नहीं है, किन्तु 
शब्दों की ध्वनि का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है। कुछ 
शब्द किसी स्थान पर कट्ठु हो सकते हैं और दूसरे समानार्थी शब्द 
उसी स्थान पर मधुर । यह स्वाभाविक है कि मधुर को छोड़ कर 
कटु को कोई भी पसन्द न करेगा । 

वाक्य-रचना भी भाषा का एक भ्रम्मुख अंग है। शब्दों को 
वाक्य में नगीने की तरह बैठाना भी एक कला है। प्रत्येक शब्द का 
वाक्य में अपना-अपना स्थान होता है और जब वे उचित स्थान पर 
नहीं बैठाये जाते तब उनकी आभा मन्द्‌ पड़ जाती है. और भाव 
धरंधले । उनको विचार पूरक बैठाने में लेखक की सफलता छिपी 
रहती है। लेखक का व्यक्तित्व सी इसी से झलकता है। प्रत्येक 
छेखक की अपनी लिखने की प्रणाली होती है । 

वाक्यों को पैरा में उचित रूप से व्यवस्थित करना आवश्यक 
है। एक वाक्य का दूसरे से सम्बम्ध रहता है और एक दूसरे को 
स्पष्ट करते हैं। यदि उनके क्रम में कोई चुटि हुई तो अर्थ का 
अनथे हो जाता है। असम्बद्ध होने पर उनके द्वारा भावों को 
व्यक्त करना असम्भव हो जाता है। अतएवं वाक्यों को भी 
व्यवस्थित रूप से सजाना भाषा का मुख्य काये है | 

भाषा की सुन्दरता के लिए अन्य बातों पर भी ध्यान देना 
आवश्यक होता है। भाषा सरहू तथा अलंकृत होने से ही आक- 
षेण उत्पन्न करती है। सरलता के साने यही हैं कि वह भाषा जो 


१८१ 


अखसाद और उनका साहित्य 


सावों को ऐसे रूप में व्यंजित करे, जिसको छोग हृदयब्म 
कर सके। 
अलंकार से भाषा का सौन्दर्य विकसित होता है; किन्तु किसी . 
तरुणी को नख से शिख तक अलंकारों ही से विभूषित कर दिया 
जाय तो भद्दा माल्म होता है। इसी तरह भांपा को भी आवश्य- 
कता से अधिक अलंकझृत कर देना अस्थाभाविक है। उतने ही 
' अलंकार उपयुक्त हैँ, जितने भाषा की सुन्दरता बढ़ा सके | अहं- 
कारों के द्वारा भाषा में सरलता भी आ जाती है। यह मुख्यतः 
उपसाओं का ही कार्य है। उनके द्वारा भाव स्पष्ट हो जाते हैं 
ओर पूरा चित्र आखों के सम्मुख उपस्थित हो जाता है। 
परन्तु उदाहरणों और उपम्ाओं में जो अन्तर है, उसका ध्यान 
रखना चाहिए। उपमाएं जितनी स्पष्टता से भावों को व्यक्त कर 
सकती हूं, उतने उदाहरण नहीं | 
मुहावरों तथा वाक्य खंडों द्वारा भी भापा में सरकता तथा 
स्पष्टता आ जाती है । वही पुराने मुहाविरे तथा वाक्य-खंड बहुत 
दिनों से उसी रूप में प्रयुक्त होने के कारण कुछ वृद्ध से माह्म 
पढ़ते हें। अगर उन्हीं को शब्दों के हेर फेर द्वारा नवीन रूप में 
उपस्थित किया जाय तो भापा में नया ओज आ जायगा | 
इन सिद्धान्तों को सम्मुख रखकर अब हम प्रसाद जी की 
आपषा का विवेचन करेंगे। प्रसादजी की भाषा के सम्बन्ध में कहने 
के पूर्व उनकी कुछ विशेषताओं को समझ छेना आवश्यक है । 


श्८र्‌ 


भाषा और शेछी 


इसमें सन्देह नही कि प्रसाद जी हिन्दी के युग प्रवत्तेक लेखक 
और साहित्य ख्रष्टा थे। समीक्षक, अध्ययनशीऊ और दाशनिक होने 
के कारण उनके पास परिपक्व विचारों तथा भावी की निधि थी, 
जिसे उन्हें साहित्य को समर्पित करना था। प्रसाद जी ने साहि 
और समाज का पूर्ण रूप से विवेचनात्मक अध्ययन किया था। 

प्रसादजी की कल्पनाएं प्रायः बहुत ऊँची होती हैं. । इसका 
मुख्य कारण अध्ययनशीछता और अनुभूति ही है। अतएव उनकी 
प्रायः सभी कृतियाँ बहुत ही पुष्ट और परिमार्जित रूप में प्रस्तुत 
हुईं हैं। उनके शब्दों का सकछन, वाक्य रचना अथवा भाषा भी, 
उसी तरह पुष्ट और प्रभाव पूर्ण है। 

कवि होने के कारण उनकी भाषा कुछ छोगों को छिं्ट प्रतीत 
होतो है; किन्तु छिष्टता के भी दो रूप हैं । यदि किसी रचना 
में छ्िष्टता वर्तमान है तो वह रचना साहिलिक भी हो सकती है , 
और असाहित्यिक भी | यह विचारणीय है कि वास्तव में रचना 
साहित्यिक है अथवा नहीं ? यदि रचना साहित्यिक है तो छिप्टता 
छिष्टता नहीं रह जाती | खय॑ प्रसाद जी का कहना है-- 

पान्नो की संस्कृति के अनुसार उनके भावों और विचारों में तारतम्य 
होना भाषाओं के परिवर्तत से अधिक उपयुक्त होगा । देश और काल के अनु- 
सार सास्क्ृतिक दृष्टि से भाषा में पूर्ण अभिव्यक्ति होनी चाहिए । 

लेखक की विचार धारा भावो की परिपकता और अध्ययन की 
गति के अनुसार ही उसकी भाषा भी गम्भीर तथा भाव पूर्ण होती 


१८३ 


भसाद और उनका साहित्य 


जाती है। प्रसाद जी की कृतियों की भी यही चिशेषता है। 

अजातशत्रु में देखिए---आह, जीवन की क्षण-भंग्रुरता देख कर भी मानव 
कितनी गहरी नौंव देना चाहता है। आकाश के नीले पन्न पर उज्ज्वल अक्षर. 
से लिखे हुए अदृष्ट के लेख जब भीरे-धौरे छप्त होने लगते हैं, तमी तो महुण 
प्रभात समझने छुगता है, ओर जीवन संग्राम में अबत्त होकर अनेक अकाढ- 
तांडव करता है। फिर भी अकृति उसे अंधकार की गुफा में ले जा कर 
उसका शान्तिमय, रहस्यपूण भाग्य का चिट्ठा समझने का प्रयत्न करती है। 
घह कब मानती है ! मनुष्य व्यर्थ ममत्व की आकांक्षा में मरता है; किन्तु 
अपनी नौची किन्तु सुदृढ़ परिस्थिति में उसे सनन्‍्तोष नहीं होता, चीचे से ऊंचे 
चढ़ना ही चाहता है, चाहे फिर गिरे भी तो क्या 

लेखक कितने संक्षिप्त रूप में जीवन के तत्व की विवेचना 
कर रहा है। “जीवन-संग्राम', “अकांड-तांडव”, “अदृष्ट के लेख! 
इत्यादि जितने शब्द अथवा वाक्य-खंड हैं, उनमें जीवन के एक- 
एक अंग के चित्रों का विश्लेषण है। 

अ्रसादजी की रचनाओं में गूढ़ वाक्य प्राय: सूत्र की तरह प्रतीत होते हैं- 

१. रत्न मिश्टियों में से ही निकलते हैं। स्वर्ण से जड़ी हुई मब्जूपाओं ने तो 
कभी एक भी रत्न उत्पन्न नहीं किया। ( विशाख ) २. मनुष्य को अपने 
व्यक्तित्व में पूर्ण विस्वास करने की क्षमता होनी चाहिए । उसे बाहरी सहा- 
यता की आवश्यकता नहीं। ( तितली ) ३, अपनी घोर आवश्यकताओं में 
कृत्रिमता वढ्ाकर, सभ्य और पश् से छुछ ऊँचा द्विपद्‌, मनुष्य, पश्य बनने से 
चच जाता है। ( स्कन्दगुप्त ) 


१८४ 


भाषा और शैली 


प्रसाद के वाक्य उनकी विचार धारा के साथ चलते हैं, 
विचारों की गति के अनुसार ही उनका क्रम बनता है। अतएव 
जब उनके विचार स्पष्ट रहते हैं; तो कैसे कहा जा सकता है कि 
उनके वाक्य जटिल हैं ९ 

शैली का साधारण तात्पर्य छेखक के भाव व्यक्त करने की 
प्रणाली से है । प्रत्येक छेखक का वर्णन करने का अपना निजी 
हंग होता है। शैली द्वारा ही लेखक का व्यक्तित्व उसकी रचना 
में चित्रित होता है। इसीलिए कहा गया है कि शैली ही लेखक है, 
और लेखक ही शैली है। 

शैली पर समय की गति का भी प्रभाव पड़ता है । अत्येक युग 
की अपनी रौछी होती है और वह उस युग के रीति रिवाज पर 
निर्भर करती है। छेखक कभी-कभी अपनी अपरिपक्वता के कारण 
अपनी शैली निर्धारित नहीं कर पाता। वह स्वभावत: सामयिक 
धारा में बह जाता है। 

सफल लेखक की शैली की कुशलता इसी में छिपी रहती है कि 
कभी-कभी व्यगात्मक और तकपूर्ण विचारों को वह इस तरह से 
उपस्थित करता है कि पाठक उसके मनोभावों से सहमत होकर 
उसकी सराहना करने छगते हैं। लेखक का व्यक्तित्व और ज्ञान 
जब तक अपनी सीमा तक नहीं पहुँच जाता तब तक उसकी शैली 
भी अधूरी रहती है । 

भाव-व्यञ्ना की प्रणाली में स्पष्ट और सरकृता भी आव- 


१८५ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


श्यक गुण है। इसी लिए कि लेखक की विचार धारा के साथ 
पाठक भी उसी गति में चल सके । भावों का तारतम्य ऐसा होना 
चाहिये कि वे एक दूसरे का समीकरण करते रहें अन्यथा यदि 
किसी भाव का उद्रेक अधिक हुआ तो वह असद्य हो जाता है। 

शैली में जब तक ओजस्विता ओर परिमार्जित शब्दों का प्रयोग 
न होगा तब तक पाठकों के हृदय में उसका पूर्ण प्रभ्नाव न पड़ेगा। 
रचना के आवेग के कारण ही शैली रोचक होती है । वर्तमान युग 
में राष्ट्रभाषा के नाम पर हिन्दी का रूप विक्रत बना दिया गया है 
और पुष्ट और परिमार्जित रूप को छोग छक्िष्ट तथा पथरीछी 
कहने लगे हैं । 

भाव-व्यंजना लेखक की अनुभूति का परिणाम है। अतण्व 
जितनी सुन्दर अनुभूति होगी उतनी सुन्दर व्यंजना होगी । अपने 
भावों को छेखक किस तरह उपस्थित करता है, यही उसके व्यक्त 
करने की कछा है । 

प्रसाद की रचनाओं में ऐसा कोई स्थल नहीं दिखाई पड़ता, 
जहाँ उनके भाव अस्पष्ट हों; किन्तु यह बात दूसरी है; कि पढ़ने 
के पहले ही छ्िप्टता का भाव मन में रखकर कोई उसके वाह्म 
खरूप से ही घबड़ा उठे । 

प्रसाद की आरम्मिक कृति विशाख में उनकी शैली अपना 
स्वरूप बना छेती है। देखिये-- 

शैशव | जब से तेरा साथ छूटा तब से असन्तोष, अतृत्ति और अहृठ अभि- 


१८६ 


भाषा और शेली 


छाषाओं ने हृदय को घोंसला बना डाला । इन विहज्मों का कखख मन को 
शान्त होकर थोडी देर भी सोने नहीं देता। यौवन खुख के लिये भाता है- 
यह एक भारी भ्रम है। आशामय भावी सु्खों के लिये इसे कठोर कम्मों का 
संकलन ही कहना होगा । उन्नति के लिये मैं भी पहली दौड लगाने वाला हैँ । 
देखें , क्या अदृष्ट में है। 

लेखक की भाव-व्यंजना में अटूट”, 'घोंसला? और 'अद्ृष्ट 
शब्द कितने सहायक हुए हैं, यह स्पष्ट है। प्रसाद की युवावस्था 
और सांसारिक जीवन के प्रति क्‍या भावना है, यह समझने में 
कठिनाई नहीं पड़ती । केवल एक अद्ृष्ट शब्द में ही विधाता के 
विधान में विश्वास प्रकट होता है। 

शेली का दूसरा उदाहरण अजातशन्रु में देखिये-- 

महिका | तुम्हें मैंने अपने योवन के पहले ीष्म की अर्द्ध रात्रि मे आलोक 
पूर्ण नक्षत्रोक से कोमल हीरक कुछुम के रूप में आते देखा | विश्व के असंख्य 
कोमल कंठ की रसीली ताने पुकार बन कर तुम्हारा अभिनन्दन करने, तुम्हें 
सम्हाल कर उतारने के लिये नक्षत्रल्ोक को गई थी। शिशिर कक्षों से, रिक्तपवन 
तुम्हारे उतरने की सीढी बना था। ऊषा ने स्वागत किया, चाहुकार मलयानिरू 
परिमर की इच्छा से परिचारक बन गया, और बरजोरी मह्िका के एक कोमल 
वृन्‍्त का आसन देकर तुम्हारी सेवा करने लूगा। उसने खेलते-सेलते तुम्हें उस 
आसन से भी उठाया और गिराया । तुम्हारे धरणी पर आते ही जटिल जगत 
की कुटिल गृहस्थी के आलवाल में आश्वर्यपूर्ण सौन्दर्यमयी रमणी के रूप में 
तुम्हें सब ने देखा। 


श्ट७छ 


असाद और उनका साहित्य 


लेखक की इस शैली में साधारण पाठकों को समझने में कुछ 
कठिनाई अवश्य पड़ेगी ; किन्तु मलिका के पूरे जीवन की आढो- 
चना में लेखक जो कुछ कह रहा है, वह स्पष्ट है | ॒ 

प्रसाद की प्रांजल भाषा यदि वर्तमान हिन्दुस्तानी के सांचे में 
डाछ दी जाय, तो उनकी शैली का पूर्ण सौन्दर्य और मधघुरता नष्ट 
अष्ट हो जायगी, इसे कौन अस्वीकार कर सकता है ? 


कल 





। 


हि संसार में रहस्यवाद्‌ और छायावाद को लेकर बहुत 
वाद विवाद उठ चुका है। कुछ छोगों की यह धारणा है 

कि जो बातें समझ में नहीं आती, वे ही रहस्यवाद हैं । 

अंग्रेजी के मिस्टिसिज्म का अथ छायावाद और रहस्यवाद 
दोनों ही में लगाया जाता है, किन्तु छायावाद और रहस्थवाद में 
बढ़ा अन्तर है | 

“हिन्दी में मिस्टिसिज्म और. सेम्बोलिज्म के प्रभेद को दृष्टिगत न रख 
कर रहस्यवाद और छायावाद का प्राय. समान अर्थ में प्रयोग किया जाता है; 
परन्तु दोनों में सब से बढ़ा भेद शायद यह है कि एक तो एक प्रकार का 
सात्विक आत्मानुभूति का नाम है और दूसरा एक विशेष ढंग की रचना- 
अणाली है, जिसमें प्रकृत के द्वारा किसी अग्रकृत का संदेश रहता है। 

प्रोफेसर शिलीमुख ने दोनों के भेद में शायद छूगा कर स्पष्ट 
किया है । अतएव मैं इस छायावाद के सम्बन्ध में प्रसाद का मत 
उपस्थित करता हूँ :-- 


१८९ 


झसाद और उनका साहित्य 


कुछ लोग इस छायावाद में अस्पष्टवाद का भी रंग देख पाते हैं, हो तकता 
है कि जहां कवि ने अनुभूति का पूर्णतादात्म्य नहीं कर पाया हो वहा अभि- 
व्यक्ति वि्ंखल हो गयी हो, शब्दों का चुनाव ठीकू न हुआ हो, हृदय से 
उसका स्पश न हो कर मस्तिष्क से ही मेल हो गया हो; परन्तु तिद्धान्त में 
'ऐसा रूप छायावाद का ठीक नही कि जो कुछ अस्पष्ट, छाया मात्र हो; वास्तविकता 
का स्पर्श न हो, वही छायावाद है। हो मूल में यह रहस्यवाद भी नहीं है। 
भ्रकृति विश्वात्म को छाया था ग्रतिविम्ब है। इसलिए भ्रकृृति को काव्यगत 
व्यवहार में छे आकर छायावाद की राष्टि होती है। यह सिद्धान्त भी श्रामक 
है। यद्यपि प्रकृति का आलम्बन, स्वाजुभूति का प्रकृति से तादात्म्य नवीन क्व्य 
धारा में होने लगा है, किन्तु प्रकृति से सम्बन्ध रखने वाली कविता को ही 
छायावाद नहीं कहा जा सकता । 

छाया भारतीय दृष्टि से अनुभूति और अभिव्यक्ति की भंगिमा पर अधिक 
निर्भर करती है | ध्वन्यात्मकता, लाक्षणिकता, सौन्दर्यमय प्रतीक विधान तथा 
उपचार वक्रता के साथ स्वानुभूति की विश्वति छायावाद की विशेषतायें हैं। 
अपने भीतर से मोती के पानी की तरह आन्तर स्पर्श करके भाव समर्पण 
'ऋरनेवाली अभिव्यक्ति छाया कान्तिमयी होती है । 

इस प्रकार यह स्पष्ट है कि छायावाद न तो प्रतीकवाद है। न 
अतिविम्बवाद है, न कोरा प्रकृतिवाद है, वह तो आन्तरस्पर्श वाढी 
अभिव्यक्ति का वाद है। 

कुछ आछोचको का कहना है कि रहस्ययाद विदेशी वस्तु है : 

भारतीय भक्ति काव्य को रहस्यवाद का आधार लेकर नहीं चलना पढा | 


१९० 


रहस्यवाद 


यहा के मक्त अपने हृदय से उठे हुए सच्चे माव भगवान्‌ की प्रत्यक्ष विभूति 
को बिना किसी संकोच और भय के तिना प्रतिबिंबवाद आदि वेदान्तीवादों का 
सहारा लिए सौधे अर्पित करते रहे । मुसलूमानी अमलदारी में रहस्यवाद को 
लेकर जो निर्गेण भक्ति की वानी चली वह वाहर से-अरब और फारस की 
“ और से-आई थी। वह देशी वेश में एक विदेशी वस्तु थी। इधर अंगरेजों 
के आने पर ईसाइयों के आन्दोलन के बीच जो ब्रह्मो समाज बंगाल में स्था- 
पित हुआ उसमें भी पोत्तलिकता का भय कुछ कम न रहा । # 

प्रसाद लिखते हैं--- 

रहस्यवाद के सम्बन्ध में कहा जाता है कि उसका भूल उद्बम सेमेटिक 
धर्म भावना है, और इसलिए भारत के लिए वह बाहर की वस्तु है, किन्तु श्याम 
देश के यहूदी, जिनके पैगम्बर मूसा इत्यादि थे, सिद्धान्त में ईश्वर को उपास्य 
और मनुष्य को जिहोवा (यहूदियों के ईश्वर ) का उपासक अथवा दास मानते 
थे । सेमेटिक धर्म में मनुष्य की ईश्वर से समता करना अपराध समझा गया 

है । भारतीय रहस्मवाद ठीक मेसोपोटामियों से आया है, यह कहना वैसा ही 

.. है, जैसा वेदों को 'सुमेरियन-डाकमेन्ट' सिद्ध करने का प्रयास - ...वर्तमान 
रहस्यवाद्‌ की घारा भारत की निजी सम्पत्ती है, इसमें सन्देह नहीं । 

अब प्रश्न उठता है कि यह रहस्यवाद है क्या ? इस सस्बन्ध में 

हिन्दी के अनेक विद्वानों का मत यहाँ मैं उपस्थित कर रहा हूँ : 

( क ) रहत्यचाद अपने मूल प्रयोग में, एक प्रकार की भावना या आन्त- 
रिक अनुभूति का नाम है। जिससे मनुष्य सृष्टि के पदार्थों की प्रेरक एक नित्य 

# देखिए पं ० रामचन्द्र शुक्ल रचित काव्य में रहस्यवाद्‌। पृष्ठ संख्या १०७ 


१९१ 


झसाद और उनका साहित्य 


सामान्य सत्ता की खोज करता है और उसके साथ साक्षात्‌ संस की अनुभूति 
आाप्त करना चाहता है । 

(ख ) रहस्यवाद जीवात्मा की उस अन्तर्हित अब्ृति का प्रकाशन है, 
जिसमें वह दिव्य और अलोकिक शक्ति से अपना शान्त और निह्चल सम्बन्ध 
जोड़ना चाहता है, और यह सम्बन्ध यहाँ तक वढ़ जाता है कि दोनों में कुछ 
अन्तर नहीं रह जाता । 

(ग ) अतएव हम इसी निष्कर्प पर पहुँचते हैं कि रहस्यवाद अपने नप्त 
स्वरुप में एक अछोकिक विज्ञान है, जिसमें अनन्त के सम्बन्ध की भावना का 
प्रादुभोव होता है और रहस्यवादी वह व्यक्ति है जो इस सम्बन्ध के अत्यन्त 
निकट पहुँचता है। उसे कहता ही नहीं, उसे जानता ही नही, वरन उस संबंध 
का रुप धारण कर वह अपनी आत्मा को भूल जाता है । 

(घ ) रहस्यवाद की परिभाषा करना कठिन है। यह एक प्रकार की दृष्टि 
है, जिसके द्वारा आध्यात्मिक रहस्य अपने भीतरी अलुभव में जो कि आय. भाव 
प्रधान होता है, प्रकाशित होते हैं । 

(७ ) रहस्यवाद का विषय भी ऐसा ही है, इस विषय पर सव कवि नहीं 
लिख सकते । स्वयं यह विषय ही साधारण कवियों की अनुभूति के वाहर है, 
और इसलिए जिस कवि ने स्वयं इसका अनुभव नहीं किया, उसका इस विषय 
पर लिखना साहस ही नहीं, दुस्साहस है । जैसे छोटे छोटे छड़के दान तथा 

(क) प्रसाद की नाव्य-कला, प्रष्ठ संख्या ७७ 

(ख) (ग) कबीर का रहत्यवाद, पृष्ट संख्या ७,११, 

(घ) छायाबाद या रहस्यवाद (श्री गुल्ाव राय, एम. ए. विश्मा", १५२८) 


१९२ 


रहस्यवाद 


धर्म के गूढ सिद्धान्तों को नहीं समझ सकते, उसी प्रकार वह कवि, जो दाशनिक, 
अथवा धार्मिक नही है, रहस्यवाद को नहीं समझ सकता और न रहस्यवाद 
सम्बन्धी कविता लिखने में ही वह सफल हो सकता है। 

प्रसाद जी के रहस्यवाद पर पं० पञ्ननारायण आचाये एस०२ ए० 
का मत बहुत ठीक प्रतीत होता है। उन्होंने प्रसाद जी की रचनाओं 
का पूर्ण अध्ययन किया है, यह इस उद्धरण से ही प्रकट होता है। 
यहाँ प्रसाद के मत को ही उन्होंने अपने शब्दो में रख दिया है। 

प्रसाद के रहस्यवाद नामक निवन्ध का अन्त है कि वर्तमान रहस्य- 
वाद की धारा भारत की निजी सम्पत्ति है!। इसी सिद्धान्त वाक्य का सम- 
रन करने के लिये उन्होंने अनुभूति और अभिव्यक्ति दोनों की दृष्टि से 
भारतीय परंपरा का इतिहास खींचा है ओर उसमे दिखाया है कि ऋग्वेद में 
ही काम ओर ग्रेम की उपासना प्रणाली थी। उस समय से ही आत्मानुभूति 
और आन॑ंदानुभूति का रहस्यवाद देखने को मिलता है। धीरे-धीरे उसका 
विकास हुआ आगसों के आनन्दवाद और रहस्य संप्रदाय में । इसी की विरा- 
सत मिली मध्यकाल के सिद्धों ओर संतों को। इस प्रकार धीरे-धीरे काल- 
बल से बलखाती हुईं यह रहस्यवादी काव्य धारा वर्तमान युग में आ पहुँची 
है। यों तो एक दूसरे के साथ सम्पर्क मे आने पर विचारों का थोड़ा बहुत 
आदान-प्रदान होता ही है। अतः हिन्दी वाले रहस्यवाद में भी कुछ पुट 
बाहर का हो सकता है, पर उसकी जीवनघारा भारत के आदि' काल से चली 
आ रही है। यह धारा केवल विचारों में नहीं, प्रतीकों में भी मिलती है। 

(<) कविता में रहस्यवाद (पं० अवध उपाध्याय, सुधा कार्तिक,३०५ तु०सं०) 


१३ १९३ 


प्रसाद भौर उनका साहित्य 


प्रियतम, बहुरिया, पिया की सेज, शृत्य महरू आदि संतों को इजाद नहीं, 
पुराने वैदिक प्रयोगों के अनुवाद हैं। वेदों की अटपटी वाणी, दाम्पत्य भाव 
का दृशन्त और गुद्य बातों को चमत्कार पूर्ण साकेतिक भाषा में कहना . 
आदि यदि आगरमों ओर बानियों का पूर्ण रूप नहीं तो और क्या है ! 

इस प्रकार प्रसाद जी ने नये दृष्टिकोण से रहस्यवाद को देखा है, 
धर प्रतिपादन पूरा न होने से सन्‍्तोष नहीं होता । एक बार इस सरणि का 
अनुसरण करके खोज और विचार करने से ही उनकी टिप्पणियों का मूल्य 
शंका जा सकता है। 

एक बात और भ्रसाद जी ने बड़े जोर से कही है, वह है उनके निबंध 
का पहला वाक्य--काव्य में आत्मा की संकल्पात्मक मूल अनुभूति की मुख्य 
धारा रहस्यवाद है / यह भी उस मत का श्रतिवाद है, जिसके अनुसार 
रहस्यवाद काव्य की एक शाखा है। पर इस कथन के पीछे ठोस प्रमाण 
एक भी नहीं है। उनके निबंध में इसके लिये संकेत हैं । खोजने घाला 
यदि यत्न करे तो उसे उनके बिखरे हुए विचार कण मिल सकते हैं। और 
रहस्यवाद का अध्ययन करने वालों के लिये यह एक विचारणीय पक्ष है। 
रहस्यवाद समझने के लिये प्रसाद के चार निबधों को एक साथ मिला कर 
पढ़ना चाहिये, रस, रहस्यवाद, छायावाद और कला, और 'साथ ही 
पं० रामचन्द्र शुक्ल का काव्य में रहस्यवाद! वाला श्रबंध भी सुपरिचित 
होना चाहिये। ययपि इस पक्ष का समर्थन लेखक इस निबंध में नहीं फर 
सका है तथापि वह अपने काव्य में क्या करता था, यह निबित हो 
जाता है। उसके साहित्य की मुख्य घारा रहस्यवाद है और वह भो है 


१९४ 


रहस्यवाद 

सद्वेतमूलक आनन्दवाद वाली परम्परा की धारा । 

प्रसाद के रहस्यवाद को समझने के लिये सब से पहले रसवाद समर- 
झना चाहिये, क्यांकि आत्मवाद, अजुभूतिवाद, आनन्दवाद और समाधि 
वाला साक्षात्कार आदि वाते दोनों में समान रूप से सान्य हैं । दोनों का संबंध 
चौवागम से है। दोनों ही सहृदय सं॑वेध हैं। 

कबीरदास के काव्य में उपरोक्त रहस्यवाद की पूर्ण सामग्री 
मिलती है । प्रसाद जी ने भी कबीर के सम्बन्ध में लिखा है-- 

हिन्दी के उन आदि रहस्यवादियों की, आनन्द के सहज साधकों को 
चुद्धिवादी निर्मुण संतों को स्थान देना पड़ा। कवीर इस परम्परा के सब से बढ़े 
कवि हैं। कबीर में विवेकवादी राम का अवलम्ब है और सम्भवतः वे भी 
साथो सहज समाधि भली इत्यादि में सिद्धों क्री सहज भावना को ही, जो 
उन्हें आगमवादियों से मिली थी, दोहराते हैं। कवित्व की दृष्टि से भी कबीर 
पर सिद्धों की कविता की छाया है । उन पर छुछ मुसलछमानी अभाव भी पढ़ा 
अवश्य, परन्तु शामी पैगम्बरों से अधिक उनके समीप थे वैदिक ऋषि, तीर्थ- 
: दुरनाथ और सिद्ध । 

प्रोफेसर रामकुमार बर्मा कबीर का एक पद देकर उसका 
रहस्यवाद खोलते हैं । 

जल में कुम्भ, कुम्म में जछ, वाहिर भीतर पानी | 

फूटा कुम्म जल जरूहिं समाना, यह मत कथौ गियानी | 

एक घढ़ा जल में तैर रहा है। उस घड़े भें थोड़ा पानी भी है। घड़े के 
भीतर जो पानी है वह घड़े के बाहर के पानी से किसी अकार भी भिन्न नहीं 


१९५ 


प्रखाद्‌ ओर उनका साहित्य 


है। किन्तु वह इसलिए अलग है क्योंकि घड़े की पतली चादर उन दोनों 
अंझों को मिलने नही देती, जिस प्रकार माया ब्रह्म के दो स्वरुपों को अलग 
रखती है। कुम्भ के फूटने पर पोनी के दोनों भाग मिलकर एक हो जाते हैं, | 
उसी श्रकार भाया के आवरण के हटने पर आत्मा और परमात्मा का संयोग 
हो जाता है। यही अद्वैतवाद कबीर के रहस्यवाद का आधार है * 

कबीर के बाद श्री० रबिन्द्रनाथ ठाकुर का स्थान आता हैः 
भारतीय रहस्यवाद की भावना से प्रेरित होकर उन्होंने वर्तमान 
साहिल्य में एक नई धारा बहाई है। कबीर की रचनाओं का उन 
पर भी काफी प्रभाव पड़ा है । 

रवि बाबू कहते हैं-- 

"सौन्दर्य से, प्रेम से, मंगल से पाप को एक दम समूल नष्ट कर देना ही 
इमारी आध्यात्मिक प्रकृति की एक भाज्न आकांक्षा है... ...उच्च साहित्य अन्त- 
रात्मा के आन्तरिक पथ का अवलम्बन करना चाहते हैं। ऐसे साहित्य स्वभाव 
नि.खत अश्रुजल से कलंक मोचन करते हैं, आन्तरिक छणा से पाप को दरघ 
करते हैं और स्वाभाविक आनन्द से पुण्य का स्वागत करते हैं। | 

असाद के सम्बन्ध में शिलीमुख लिखते हैं---असाद के सम्बन्ध में 
रहस्यवाद का प्रश्न उठने की आवश्यकता न पड़ती यदि सर्वन्न यह प्रसिद्धि 
न होती कि वह आधुनिक रहस्यवाद के मूल प्व्तेक हैं । 
जो लोग प्रसाद के रहस्यवाद के बारे में मतभेद रखते हाँ 
+ कबीर का रहस्यवाद्‌ हैं 
पै' प्राचीन-साहित्य 


१९६ 


रहस्थचाद 


उन्हें प्रसाद के तर्कों द्वारा अपनी हांका का समाधान करना 
चाहिये। अतएव मैं यहाँ रहस्यवाद के सम्बन्ध में प्रसाद का 
निजी मत उन्हीं के शब्दों में रख रहा हूं +-- 

भारतीय विचारधारा में रहस्यवाद को स्थान न देने का एक मुख्य 
कारण है। ऐसे आलोचकों के मन में एक तरह की झुंझलाहट है । 
रहस्यवाद के आनन्द पथ को उनके कल्पित भारतीयोचित विवेक में सम्मल्िति 
कर लेने से आदर्शवाद्‌ का ढाचा ढीला पड़ जाता है। इसलिए वे इस बात 
को स्वीकार करने में डरते हैं कि जीवन में यथार्थ वस्तु आनन्द है, ज्ञान से 
वा जज्ञान से मनुष्य उसी की खोज में लगा है। आदर्शवाद ने विवेक के 
नाम पर आनन्द और उस पथ के लिए जो जनरखव फैलाया है, वही उसे 
अपनी वस्तु कह कर स्वीकार करने में बाधक है । किन्तु प्राचीन आये लोग 
सदेव से अपने क्रियाकलाप में आनन्द, उल्लास और प्रमोद के उपासक रहे, 
ओऔर आज के भी अन्यदेशीय तरुण आययंसंघ आनन्द के मूल संस्कार से 
संस्क्षत और दीक्षित हैं। आनन्दभावना, प्रियकल्पना और प्रमोद हमारी 
: व्यवहायें वस्तु थी। आज कौ जातिगत निर्वा्यता के कारण उसे अ्रहण न कर 
सकने पर, यह सेमेटिक है कह कर सन्तोष कर लिया जाता है । 

बृहदारण्यक श्रुति अनुकरण कर के समता के आधार पर भक्ति की और 
मिन्न अ्रणय की सी मधुर कल्पना भी की। क्षेमराज ने एक प्राचीन उद्धरण दिया--- 

जब, सनी और पुरुष दोनों ही एक प्रकार का आनन्द अनुभव करते हुए 
भिन्न होने पर भी एकता समता का आनन्द प्राप्त करते हैं अर्थात्‌ दोनों एक 
हो कर कास सुख का अनुभव करते हैं,, उसी प्रकार जीवात्मा और परमात्मा 


१९७ 


प्रसाद भीर उनका साहित्य 


दोनों मित्र मिन्त मिन्न होते हुए जब समान सुख का अनुभव करने लगते 
हैं तब द्वेव भी अद्वेत के समान अस्त भाछम होता है। 
यह भक्ति का आरम्भमिक स्वरूप आगमों में अद्देत की भूमिका पर हौ 


इन आगम के अनुयायी सिद्धों ने प्राचोच आनन्द भार्ग को अद्वेत कौ 
भ्रतिष्ठा के साथ अपनी साधना पद्धति में प्रचलित रखा भर इसे वे रहस्य 
सम्प्रदाय कहते थे...... 
रहस्य सम्प्रदाय अद्वेतवादी था। इन लोगों ने पादुपत योग की प्राचीन 
साधना पद्धति के साथ-साथ आनन्द की योजना करने के लिये काम-उपा- 
सना प्रणाली भी दृश्न्त के रूप में स्रीकृत की। उसके लिये भी श्रुति का 
आधार लिया गया । 
तथथा प्रियया स्रीया संपरिष्वक्तो न बाह्य किश्वन वेदनान्त- 
रमू ( बृहदारण्यक ) 
जैसे परम प्यारी ज्री के साथ आनन्द में लिपटा हुआ पुरुष वाहरी मीतरी 
किसी श्रकांर का कुछ भी ज्ञान नहीं रखता उसी प्रकार त्रह्म में लीन योगी। 
इस दाशनिक सत्य को व्यावहारिक रूप देने में किसी विशेष अनाचार 
की आवश्यकता न थी। संसार को मिथ्या मान कर असम्भव कल्पना के पीछे 
भठकना नहीं पढ़ता था। दुःखवाद से उत्पन्न सन्‍्यास और संसार से विराग 
की आवश्यकता न थी । अद्वैत मूलक रदस्यवाद के व्यावहारिक रुप में विस 
को झात्मा का अभिन्न अंग शैवाग्मों में मान लिया गया था। फिर तो सहज 
आनन्द को कल्पना भी इन लोगों ने की । 


१९८ 


रहस्यचाद 


बौवों का अद्वैतववाद और उनका सामरस्य वाला रहस्य सम्प्रदाय, 
|, वैश्णवों का साधुय भाव और उनके प्रेम का रहस्य तथा कामकला की सौन्दर्य 
उपासना आदि का उद्गम वेदों और उपनिषदों के ऋषियों की वे साधन प्रणा- 
लिया है, जिनका उन्होंने समय समय पर अपने संधों में प्रचार किया था । 

अन्त में प्रसाद जी रहस्यवाद का विवरण ( डेफनेशन ) इस 
प्रकार देते हैं-- 

वर्तमान हिन्दी में इस अद्वैतरहस्यवाद्‌ की सौन्दर्यमयी व्यज्ञना होने 
लगी है, वह साहित्य में रहस्यवाद का स्वाभाविक विकास है। इसमें अपरोक्ष 
अनुभूति समरसता तथा प्राकृतिक सौन्दर्य के द्वारा अहं का इदम्‌ से समन्वय 
करने का सुन्दर प्रयत्न है। हाँ, विरद भी थुग की वेदना के अनुकूल मिलन 
का साधन बन कर इसमें सम्मिलित है। 

प्रसाद के कुछ आलोचक उनकी रचनाओं में निराशावाद का 
दोष देते हैं । बाबू श्यामसुन्दर दास लिखते हैं--- 

दूसरी बात जो उनकी ऋृतियों में खटकने वाली है वह उनका सांसारिक 
बातों में एक पक्षिय ध्येय है। सांसारिक जीवन में सब कुछ कलुषित और 
ग्ित नहीं, उसका एक अंश उज्ज्वल और. प्रशंसनीय भी है। असाद जीं 
की रुचि पहले पक्ष की ओर अधिक दीख पड़ती है। 

ऐसा प्रतीत होता है कि यह टिप्पणी कंकाछ पढ़ कर लिखी 
गई है। जिन छोगों ने तितली का उज्ज्वल पक्ष देखा है वे समझते 
हैं कि प्रसाद जी किस तरह जीवन के ऋष्ण और शुक्ल पक्ष को 
देखते थे । 


१९९ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


प्रसाद के भाग्यवाद। निराशावाद और नियतिवाद के 
सम्बन्ध में अनेक मत हैं। प्रसाद के आरम्मिक जीवन पर दृष्टि 
डालने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि वह इतने घीर और गस्भीर 
पुरुष थे कि वह अपना दुख किसी के सामने प्रकट नहीं करना 
चाहते थे। उनका यह विर्‌ह युग की वेदना के अनुकूल मिलन 
का साधन बन कर प्रस्तुत है। प्रसाद के सम्बन्ध में जितने वाद 
प्रचलित हो गये हैं, उन सब का अपने आप निराकरण हो सकता 
है। यदि प्रसाद का आनन्द्याद अथवा रसवाद समझ लिया 
जाय। वास्तव में यही आनन्दवाद ही उनका रहस्यवाद है। 
काव्य का वाद हे । 


'>-ब््छ्ाडतका जा 


(ज्ल्ह्य लूट अखलययाल 
कष 


हिन्द काव्य की तीन धाराएँ मानी जाती हैं। पहला ब्रज- 
भाषा का भ्राचीन स्कूछ। जिसके अन्तिम प्रतिनिधि 
पं० नाथूराम शंकर शर्म्मा और रल्लाकर जी थे । दूसरा द्विवेदी जी 
के युग से चछा हुआ खड़ी बोली का वह स्कूछ जिसमें भाव तथा 
छन्द पुराने ही रहे; किन्तु खड़ी घोढी का आवरण धारण कर 
नवीनता का पथ भ्रद्शक बना । तीसरा स्कूछ छायावादी कविता 
का समझा जाता है । इस स्कूछ के जन्मदाता प्रसाद जी ही माने 
जाते हैं। इससें सन्देह नहीं कि पन्‍्त, निराला; महादेवी 
बसों और रामकुमार व्मो की कविताओं ने इस स्कूछ को अधिक 
शक्तिशाली बना दिया है। 
काव्य के इस तीसरे स्कूछ को अनेकों आलछोचनाएँ व्यंग और 
विरोधों का सामना करना पड़ा है। इसका प्रमुख कारण यही था 
कि भाव ओर भाषा दोनों ही छिष्टता का रूप धारण कर उपस्थित 
हुए थे। अतएवं सर्वेसाघारण के उपयुक्त काव्य की परिभाषा में 


२०१ 


अखाद और उनका साहित्य 


इनके लिए स्थान देना कठिन हो गया था। इस काब्य के प्रथम 
कवि के नाते प्रसाद को ही विशेष रूप से विरोधों का सामना 
करना पड़ता था। 

प्रसाद की जीवनी में मैं छिख चुका हूँ कि आरम्भ में वह 
ज्जभाषा में ही कविता लिखते थे। उनकी आरम्मिक कविताएँ 
चित्राघार में संगृहीत हैँ। चित्राघार का पहला संस्करण समाप्त हो 
जुका था| दूसरा संस्करण चह प्रकाशित नहीं कराना चाहते थे। 

उन्होंने कहा--अब इस संग्रह की क्या आवश्यकता है ! 

मैंने कद्दा--आरम्भिक रचनाओं से छेखक के क्रम विकास 
का अध्ययन करने में सुविधा रहती है। 

अन्त में सेरे आग्रह पर ही चित्राधार के दूसरे संस्करण 
को प्रकाशित करने की अनुमति दी । 

रचना-ऋम के अनुसार प्रसाद के काव्य की सूची इस तरह 
है--(--चित्राधार २--कानन कुसुम ३--महाराणा का महत्व । 
४--प्रेमपथ्िक ६--झरना ७--आऑपू ८--छहर ९--कामायती | 

चित्राधार में तीन घड़ी कविताएँ, अयोध्या का उद्धार, वन- 
मिलन और  भ्रेमराज्य, प्राचीन कथानक के आधार पर रचित हैं। 
पराग में २४ फुटकर कविताएँ हैं । इनके अतिरिक्त मकरन्द बिन्दु 
में समस्या पूर्ति के ढंग के कवित्त हर 

पसाद के काव्य की समीक्षा करने में सभी आलछोचक उनकी 
अजभाषा की कविताओं से विमुख ही रहे हैं । अतएव मैं यहाँ 


श्०२्‌ 


काव्य 


उनकी उन रचनाओं के उद्धरण उपस्थित कर रहा हूँ । 
इस त्रजभाषा के काव्य के आरम्मिक क्रम विकास में रहस्प- 
वादी कबि के अस्तित्व का पता किसे छग सकता है ? यह भी, 
रहस्यवाद की भांति रहस्यमय है। 
कौन अम भूकछि के अमत चलिजञात किसे , 
बिते जनि देहु रजनी को, चित धारिये। 
कबते तिहारी आस लाय एक ढक यह ; 
रूप सुधा प्यासी तासु प्यास निरवारिये ॥ 
राख परवाह ना सराह की तिहारी सौंहँ । 
छखत 'प्रसाद! कौन प्रेम अनुसारिये ॥ 
चित्त चैन चाइत है, चाह में भरी है, चेति , 
चैत चन्द नेक तो चकोरी को निहारिये ॥ 
चैत चन्द और चकोरी का ग्रेम प्रसिद्ध बात है। परंपरा के 
अनुसार ही कवि ने अन्योक्ति के द्वारा प्रेमी हृदय की पुकार सुनाई 
है। उसमें भक्तों वाली रहस्यभावना भी है. कि यह मानव हृदय 
उस “परम सुन्दर का निष्काम उपासक है। चकोरी कहती है--..- 
यह चकोरी का हृदय 'सराह की परवाह नहीं रखता, न जाने 
कोन-सा प्रसाद वह चाहता, उसका भ्रेम तो देखिये। यह चाह 
में भरा है, आप केवलछ एक बार इसे देख लीजिये । बंस और 
कुछ नहीं | 
चकोरी के हृदय में ही कवि का हृदय है। उसका नाता गुद् 


२०३ 


प्रसाद ओर उनका साहित्य 


अम का है। यहाँ यही बात ध्यान देने की है कि यद्यपि अभिव्यक्ति 
का ढाँचा बिल्कुल पुराना है. तो भी उसमें कवि की रुचि और 
प्रवृत्ति की एक झलक है। कवि का ध्यान उस एकान्त और अनन्य 
भावना की ओर है। 
शव इठछात जलजात-पात को सो बिन्दु , 
कैथों खुली सीपी सांहिं सुकता दर है। 
कढ़ी कंज-कोश ते कछोलिनी के सीकर-सों , 
प्रात-हिसकन-सों, न-सीतऊ परस है ॥ 
देखे दुख दूनों उसगत थति भानेंद सो , 
जान्यों नहिं ज्ञाय यहि, फौन-सो हरस है! 
तातदो-तातो कढ़ि रूखे-मन को हरित करे , 
ऐरे मेरे भाँप्‌ ! तें पियूष ते सरस है॥ 
इस दूसरे कवित्त सें कवि की दूसरी विशेषता है। वह है 
'अनुभूति की गहराई तापना। प्रसाद की दो ही तो विशेषताएँ हैं-पूरे 
विश्व में उस एक परम हृदय को देखना और अपने इस छोटे 
जीवन सें अपने बड़े हृदय की थाह छलगाना। एक का नाम 
रहस्य भावना है और दूसरेका नाम है. रसाजुभूति। दोनों में कोई 
“विरोध नहीं है। 
दोनों का साथ भी हो सकता है और प्रायः होता है, पर 
दोनों मैं प्रवृत्ति का भेद है। दूसरी प्रवृत्ति के बिना तो कोई कवि 
हो ही महीं सकता । वही हृदयानुभूति इस कवित्त का आाण है। 


२०७ 


काव्य 


मनुष्य को यह एक विचित्र अनुभव होता है कि आंसू से जी हलकाः 
हो जाता है, मन को बड़ी शान्ति मिलती है, दुःख की झुछठस मिट 
जाती है, जीवन हरा भरा हो जाता है। मनुष्य दुःख से रोया था) 
पर अब उसे यह आंसू का नया अनुभव हुआ । वह इतना प्रसन्न 
और चमत्कृत होता है कि अनेक प्रकार से उसे प्रकट करना चाहता 
है। इस आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति से उसे सुख मिलता है और 
इमी से ऐसी ऋति दूसरे सहृदय व्यक्ति को भी सुख देती है। 

इस कवित्त में यह सुख देने चाछा गुण है। इसी से तो हम 
उसे प्रसाद के अमर गीतों और मुक्तकों का बीज मानते हैं। 
कवि की कछा और बुद्धि का विकास देखने वालों को तो यह बड़ा 
प्रिय छगता ही है; स्वयं कवि को भी यह भोले और सरहू बचपन 
के समान बड़ा प्रिय था। वे इसे अनेक बार अपनी मंडली में 
पढ़ चुके हैं.। 

इस कवित्त में अनुभूति का गांभीयें और आनन्द तो है ही,. 
अभिव्यक्ति की भी एक नूतनता है। पुराने ढंग के रीतिवादी कवि 
जब एक भाव बाँधते हैं. तो उसका पूरा रूप खड़ा कर देते हैं ॥, 
यहां 'पीयूष ते सरस” कहने के लिये वे पियूष के अधिक से 
अधिक गुण और छक्षण घटाने की कोशिश करते, पर छायाबादी 
और ध्वनिवादी थोड़ा कह कर बहुत समझना चाहते हैं। यह 
व्यंजना की शैली इसमें है । समझ वार को “व्यतिरेक का चस-- 
स्कार! समझना चाहिए। इसी ग्रकार व्यतिरेक, विरोधाभासः 


२०५ 


असाद और उनका साहित्य 


आदि अलंकार भी रीति का चमत्कार दिखाने के लिये नहीं, भाव 
की छाया मनोरम बनाने के ढिये आए हैं। इस प्रकार यद्यपि 
छन्द, भाषा; अलंकार सरणि आदि में पुराना पन है तो भी उनमें 
कवि की नूतनता छिपी है । 
प्रेमकी प्रतिति उर उपनी सुखाई सुख 
जानियो न भूलियादहि उलना अनड्र की । 
खैंचि मन सोहन ते काट-पच कौन करे 
चली अब ड्रीक्की वाढ़ श्रेम के पतंग की ॥ 
सृदै दम खोलें किन छाई छबि एक तेसी 
प्यासी भरी आँखें रूप सुधा के तरंग की । 
उन ते रहो न भेद विछुरे मिले में 
भह; विधछुरनि मीन की भो मिलनि पतंग की ॥ 
तीसरा कवित्त तीसरे ढंग का है । इसमें अनुभूति हे। पर 
बह समस्या पूर्ति वाली है। समस्या पूर्ति चौंसठ कछाओं में से 
एक कछा है और इसका पूर्ण अभ्यास हो जाने पर ही मनुष्य 
जीवन की समस्याओं पर कुछ कहने योग्य होता है। प्रसाद जी ने 
इस ढंग को भी अपनाया था । इससे भी बढ़ी चात यह है कि यहां 
भ्रसाद जी ने चही बात दूसरे ढंग से कही है जो आगे चलकर 
उनका भूल मंत्र सी वन जाती है--वह है संयोग और वियोग में 
एक प्रेमयोग--छुख और दुःख दोनों में एक आनन्द की भावना! 
जब प्रेम की प्रतीति! उत्पन्न हो जाती है तब “बिछुरे मिलें में 


»रै०६ 


काम्य 


भेद नहीं रह जाता | पर यह प्रेम “अनड् की छलना” न होना 
चाहिये । 

“चित्राधार' की अधिकांश कविताएं प्रकृति और सौन्दर्य वर्णन 
के आधार पर रचित हैं। यौवन का उलूहना इन पंक्तियों में 
द्खिलाई पड़ता है-- 


प्रानन के प्यासे क्‍यों भये हो इतो रोप करि 

भरि २ प्याले प्यारे भेस रस पीजिये। 
दीजिये प्रसाद! सुख सौरभ को लीजिये जू 

नेकहू तो चित्त में दुया को ठौर दीजिये ॥ 


कवि के सिद्धान्त का उद्गम भी इन दोनों पदों में मिलता 
है। 'करत, सुनत, फल देत, छेत सब तुमहीं, यही प्रतीत' यही 
आरम्मिक विश्वास आगे चलकर प्रसाद की समस्त रचनाओं का 
सूत्र बनता है। “विधाता के विधान भें अटल विश्वास और 
नियति के चक्र में किसी का वश नहीं चल सकता |? यही सिद्धांत 
सबेत्र व्याप्त है। 

ब्रह्म में आस्था रखते हुए भी भावुकता उलहना देती है--ऐसे 
ऋ्रह्म को लेकर क्या करेंगे जो कुछ नहीं सुनता और जो दूसरों का 
दुख नहीं हरता । 

ऐसो बह्म लेइ का करे हैं ! 

जो नहीं करत, सुनत नही जो कुछ, जो जन पीर न हरि हैं ॥ 


२०७ 


असाद और उनका साहित्य 


होय जो पऐसो ध्यान तुम्दारों ताहि दिखाओं भुनि को। 
हमरी मति तो, इन झगड़न को समुझ्नि सकत नहीं तनिको ॥ 
परम स्वार्थी तिनको अपनो आनंद रूप दिखाओ। 
उनको दुख, अपनों आइवासन, सनते सुनो सुनाओ॥ 
करत, सुचत, फल देत, केत सब तुमहीं, यही प्रतीत । 
बढ़े हमारे हृदय सदाही, देहु चरण में प्रीत ॥ 
यह सब झगड़ा समझने में हम असमथे हैं; लेकिन यह जानते 
हैं. कि इन सब के कत्तो धो तुम्हीं हो। इसलिये परम स्वार्थियों 
को भी अपना आनन्द्मय रूप दिखाओ और अपने चरणों में 
प्रीति दो। 
दूसरे पद में कवि के दाशनिक मत का आभास मिलता है। 
युवावस्था में कुछ न समझते हुए भी उस अछोकिक सल का रूप , 
प्रकट होता है। कवि की जिज्ञासा जागृत होती है। .' 
छिपि के झगढा क्यों फेछायों ? 
मन्दिर मसजिद गिरजा सब में खोजत सब भरमायो ॥ 
अस्बर अवनि अनिक भनकछादिक कौन भूमि नहीं भायो । 
कढ़ि पाहन हूँ. ते पुकार बस सबसों भेद्‌ छिपायो ॥ 
कू्चों ही से प्यास बुन्चत जो, सागर खोनन जावैं-- 
ऐसो को है याते सब ही निज निज मति गुन गावें ॥ 
छीलामय सब हौर थहौं तुम, हमको यहै प्रतीत । 
भ्रद्दों प्राणथन, मीत इमारे, देहु चरण सें प्रोत॥ 


२०८ 


काष्य 


छिप कर यह झगड़ा क्यो फैछाया है। मन्दिर, मसजिद और 
गिरजा में तुम्हें सब छोग खोजते हैँ. और सब को तुमने भरमा 
लिया है.। कितने अच्छे ढंग से यह सत्य उपस्थित किया गया है । 
ऐसा प्रतीत होता है. कि कबीर के सिद्धान्त का आरअस्म में ही 
प्रसाद जी पर प्रभाव पड़ा; किन्तु 'देहु चरण में प्रीत' यह आगे 
चल कर लुप्त हो जाता है और फिर कभी कवि “चरण में प्रीत” के 
, लिए बन्दना नही करता और उस दिव्य आछोक को प्राप्त करते हुए 
, अपती सीमा निर्धारित कर छेता है। उसकी आत्मा बोल उठती है-- 
आासीनो दूरं ध्जति शयानो याति स्वतः । 
कस्तं॑ सदामदं देव मदन्यो शातुमहंति ॥ 
( कठ० १२२१ ) 
भावाथ - जो सब के पास रह कर भी दूर चला जाता है अथोत्‌ 
सवेत्र व्याप्त है और जो सोता हुआ भी सब ओर जाता है अथोत्‌ 
निष्किय होकर भी सववेत्र व्यापक है उस मद रहित होकर भी 
मद-युक्त देव आनन्द्मय त्रद्य को मेरे सिवाय कौन जान सकता है ? 
और उसे जान लेने के बाद-- 
हृदय नहिं मेरा झून्य रहे । 
तुम नहिं आओ जो इसमें तो, तव प्रतिधिम्ब रहे । 
प्रिकने का आनन्द मिले नहिं, जो इस मन को मेरे, 
करुण ज्यथा ही लेकर तेरी, निये प्रेम के ढेरे। 
इतना आत्म संतोष हो जाता है कि अगर तुम नहीं तो 


१४ २०९ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


तुम्हारा प्रतिविम्ब ही सही । अगर मिलन सुख न भी प्राप्त हो तो 
व्यथा ही सही ! श्रेम ही अवरम्ब रहेगा | 
जब प्रेम का अवलम्ब मिल जाता है तब भेद भाव नहीं रह 

जाता। उल्टे भेद भाव सम्मुख आने पर तो प्रेमी एक अनोखा 
उलहना देता है-- 

प्रियतम थे सब भाव तुम्हारे क्‍या हुए। 

प्रेम-कंज-किंजलक शुष्क कैसे हुए ॥ 

एम | >म[ इतना अन्तर क्यों कैसे हुआ । 

हा-हा प्राण-भधार छात्र कैसे हुआ।॥ 

कहें. मर्म-वेदना दूसरे से भहो-- 

“जाकर उससे दुःख-कथा मेरी कहो ॥।* 

नहीं कहेंगे, कोप सहेंगे घीर हो। 

दर्द न समझो, क्‍या इतने थे पीर हो ॥ 

सुप रह कर कह दूंगा मे सारी कथा। 

बीती है, हे प्राण ! नह जितनी व्यथा ॥ 

मेरा चुप रहना घुलवावेगा तुम्हे ॥ 

मैं न कहूँगा, वद समझावेगा तुम्हें ।॥। 

जितना चाहो, शान्त वनो, गम्भीर हो। 

खुछ न पड़ो, तब जानेंगे, तुम धीर हो | 

रुखे द्वी तुम रहो; बूंद रस के झरें। 

दम-तुम जब'है एफ, छोक घकते फिरें ॥ 


२१० 


काव्य 


पर वह उलहना देकर; दूसरे से कह कर उसका एकान्त रस 
खोना नहीं चाहता । चाहे उसके लिये कितना ही दुख क्‍यों न 
उठाना पड़े । वह भ्रेमी तक ही सीमित है और सो भी “चुप रह- 
कर! | साथ ही लोगों के बकते फिरने का भी भय नहीं है । क्योंकि 
हम तुम एक जो ठहरे ! 

प्रारम्भ से ही कवि की अममूर्ति कितनी दृद है ! 
इस स्वर सें आध्यात्मिकता है, सूफियों जेसी साधना है। 
कवि की असेदानुभूति और यहीं से हिन्दी काव्य जगत 
में रहस्यवाद और नवीनता की धारा बहती है। भावों में भी; 
उन्दों में भी ! 

द्विवेदी जी ने जिस खड़ी बोली के पद्य का रूप बनाया था, 
उसी खड़ी बोली के काव्य की सीमा के भीतर ही मेथिीशरण 
गुप्त रामचरित उपाध्याय आदि चल रहे थे। मैथिलीशरण जी 
की भारत-भारती के हरिगीतिका छन्द का प्रचार बढ़ रहा था। 
उस समय हिन्दी पद्म साहित्य में अपने छनन्‍्दों के कारण मैथिली- 
शरण जी अधिक विख्यात हुए थे । 

कवि प्रसाद अटछ तपस्वी की तरह निस्वार्थ और निर्भय 
आत्मा के बल पर नवीन छन्‍्दो और नवीन भावों को काव्य- 
जगत सें गुनगुनाते छंगे थे। : 

आरम्भ में अधिक ख्याति न होने पर भी प्रसाद की दृढ़ुता 
भंग न हुईं । जब पद्म साहित्य श्रोढ़ता का रूप धारण करने छगा; 


२११ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


तब बह नवीनता के जन्मदाता समझे गये | 

१९१३ ई० में प्रसाद जी का करुणारूय नाम का एक गीति 
रूपक इन्दु में प्रकाशित हुआ था। मिन्न तुकान्त कविता की ओर 
चह आकर्षित हुए। महाराणा का महत्व” और प्रेम पथिक! 
इसके उदाहरण हैं । 

परिसढ की भूमिका में 'तिराछा/जी ने लिखा है--'कबिता 
कौमुदी में पण्डित रामनरेश त्रिपाठी ने जैसा छिखा है, भिन्न 
घुकान्त ( 827 ५०४७७ ) का श्रीगणेश पहले-पहल हिन्दी में 
प्रसिद्ध कवि बाबू जयशंकर 'प्रसाद” जी ने किया है। उनका 
यह उन्द इक्कीस सात्राओं का है । पण्डित रूपनारायण जी पाण्डेय 
ने इस छन्द का उपयोग (शायद्‌ अपने अनुवाद में ) बहुत काफी 
किया है। पाण्डेय जी से इस छन्द के सम्बन्ध में पूछने पर 
उन्होंने जो उत्तर दिया, उससे इस विषय का फैसला न हुआ 
कि इस हन्द के प्रथम छिखने वाले '्रसादजी हैं या वे ।” 

महाराणा का महत्व” की प्रकाशकीय भूमिका से इस विवाद 
थस्त विषय पर प्रकाश पढ़ता है। 'यह देखकर और भी हे 
होता है कि पण्डित रूपनारायण पाण्डेय जैसे साहित्यिक ने 
हाल ही में 'तारा” नामक गीति रूपक का इसीउन्‍्द में अनुवाद 
कर के उक्त मत की पुष्ठी की है !? 

असाद जी ने इस मिन्न धुकान्त कविता के लिये इक्कीस 
मात्रा का अरिह् उन्द हेर फेर के साथ अधिक पसन्द किया। 


श्श्र 


काव्य 


१९१४ ई० में महाराणा का महत्व” छपा था। इसमें नवीन 
छन्द' और भाषा का प्रवाह दिखलाई पड़ता है-- 

पूर्ण प्रकृति की पूर्ण नीति है क्‍या भी , 

अवनति को जो सहन करे गंभीर हो 

घूछः सदृश भी नीच चढ़े सिर तो नहीं 

जो होता उद्विस्न, उसे ही समय में 

उस रज-कण को शीतल करने का अहो 

मिलता बल है, छाया भी देता चही। 

निज पराग को सिश्चित कर उनमें कभी 

कर देता है. उन्हें सुगन्धित, सहुक भी। 

२५ भ९ है 4 

गुथीं बिजलियाँ दो मानों रण-व्योम में 

पर्षा होने छगी रक्त के बिन्दु की, 

युगल द्वितीया चन्द्र उद्ित अथवा हुए 

घूछि-पटक को जलद॒-जाल सा काद के। 

प्रसाद जी ने प्रेम पथिक” को सम्बत्‌ १९६२ के लगभग 
ज्नजभाषा में लिखा था। आठ वर्ष बाद उसके कथानक में कुछ 
परिवतेन कर के कवि ने अतुकान्त हन्दों में उसे उपस्थित किया । 
इसमें सन्देह नहीं कि उनकी सभी आरम्भिक रचनाओं में ्रेम 
पथिक” को अथिक सहत्व मिला है। 
प्रेस पथिक! सात्विक प्रेम का चित्रण करने वाला काव्य है ।- 


२१३ 


असाद और उनका साहित्य 


पथिक ! प्रेम की राह नोखी भूछ-भूछ कर चलना है 


घनी छाँद है जो ऊपर तो नीचे काँटे बिछे हुए, 
प्रेम यज्ञ में स्वाथ और कासना हवन करना होगा 
तब तुस प्रियदस स्वयं-बिहारी होने का फू पाणोगे ; 
इसका निर्मेक विधु नीलाम्बर-मध्य किया करता-कीड़ा 
चपछा जिसको देख चमक कर छिप जाती है घत-पट में । 
प्रम॒ पविन्न पदार्थ, न इसमें कहीं कपट की छाया हो , 
इसका परिमित रूप नहीं जो व्यक्ति मात्र से बना रहे 
क्योंकि यही प्रभू का स्वरूप है जहाँ कि सब को समता है। 
इस पथ का उद्देश्य नहीं है श्रांत-सवन सें टिक रहना 
किन्तु पहुँचना उस सीमा पर जिसके आगे राह नहीं 
अथवा उस आनन्द-भूमि में जिसको सीसा कहीं नहीं 
थह जो केवल रूप जन्य है सोह, न उसका स्प्धी है 
यही व्यक्तिगत होता है , पर प्रेम व्दार, अवस्त भहो 
उसमें इसमें शेल और सरिता का सा कुछ अन्तर है। 
श्रेस, जगत का चालक है, इसके आकर्षण में जिंच के 

मिट्टी चा जरू पिण्ड सभी दिन रात किया करते फेरा 

इसकी गर्मी मरु, धरणी, गिरि, सिन्धु, लभी निज अन्तर में 

रखते दे आनन्द सहित, है इसका अमित प्रभाव सह्ा। 


इसके बल से तर॒वर पतरकड़ कर वसंत को पाते ई 
इसका है सिद्धान्व-मिटा देना अस्तित्व सभी अपना 


२१४ 


काबष्य 


प्रियतम-मय यह विद्वव निरखना फिर उसको है विरह कहाँ 

फिर तो वही रहा मन में, नयनों में, प्रत्युत जगभर में , 

कहाँ रहा तब दप किसी से क्योंकि विश्व ही प्रियतम हे ; 

हो जब ऐसा वियोग तो संयोग वही हो जाता है 

यह संज्ञायें उड़ जाती हैं, सत्य तत्त्व रह जाता है। 

जिस प्रेम तत्त्व का उल्लेख हम पीछे के उद्धृत पद्यों में कर 
चुके हैं उसी सत्य तत्त्व की सबिस्तर व्याख्या इस ग्रेम-पथिक में. 
है । उनका दाशनिक दृष्टि कोण यहाँ निश्चित हो जाता है । 

झरना? की कविताओं का सग्रह देखने से प्रतीत होता है 
कि कबि के भाव, भाषा और शेलछी में पर्याप्त विकास हुआ है। 
झरना! में कबि के रहस्यवादी स्वर का गान स्पष्ट सुनाई 
पड़ता है। 

आँख बचाकर न “किरकिरा करदो इस जीवन का मेरा । 

कहाँ मिलोगे ? किसी विजन सें ? न हो भीड़ का जब रेला ॥ 

दूर | कहाँ तक दुर ? थका भरपूर च्वुर सब अंग हुआ। 

दुर्गम पथ में विरथ दौड़कर खेछ न था मैने खेला॥ 

कहते हो “कुछ दुःख नहीं! हाँ ठीक, हँसी से पूछो तुम । 

प्रश्न करो टेढ़ी चितवन से, किस-किस को किसने शक्षेल्रा ॥ 

जाने दो मीठी मोड़ों से नूपुर की ऋनकार रहो। 

गलबाहीं दे हाथ बढ़ाओ, कह' दो प्याछा भर दे, ला॥ा 

निदुर इन्हीं चरणों में मैं रत्वाकर हृदय उलीच रहा। 


२१५ 


प्रसाद भौर उनका साहित्य 
पुछकित, प्लाचित रहो, बनो मत सूखी बारू, की बेढ़ा ॥ 


| है" ४ 
कौन, प्रकृति के करण काव्य सा, वृक्ष पत्र की मधुछाया में । 
लिखा हुआ सा धचछ पड़ा है, अस्त सद्ृश नहर काया में ॥ 
अखिल विश्व के कोलाहछ से दूर सुदूर निरुत निज में | 
गोधूली के मल्नान्चछ में, कौन जंगली वेठा वन में ॥ 
शिथिल्ल पड़ी प्रत्यक्षा किसकी, धनुष भग्न सब छिन्म जाछ है। 
बंशी नीरव पढ़ी धूल में, वीणा का भी बुरा ह्वाठ है॥ 
किसके तमभय अन्तरतम में, किल्डी की ऋनकार हो रही । 
स्मृति सन्नाटे से भर जाती, चपछा छे विभ्राम सो रही ॥ 
किसके अन्तःकरण अजिर में, अखिरक व्योस का लेकर मोत्ती। 
आँसू का बादल वन जाता, फिर तुपार की चर्षा होती। 
विपय शून्य किसकी चितदन है, 5हरी परुक भलक में भारप । 
किप्तका यह सूखा सुद्दाग है, छना हुआ क्रिप्तका साहा रस ! 
निपेर कौन बहुत बढखाकर, बिलखाता हुकराता फिरता 
खोज रहा है स्थान धरा में, अपने ही चरणों में गिरता ॥ 
किसी हृदय का यह विपाद है, छेड़ो मत यह सुख का कण है। 
उत्तेजित कर मत दौड़ाओो, ऋरुणा का विश्ास्त चरण है ॥ 
चन्द्रगुप्त नाटक के अन्त में आता है। दो बाछुका पूर्ण 

कगारों के बीच में एक निर्मेंठ सोतस्विती का रहना आवश्यक 

है! । यही प्रसाद का जीवन रहस्य है; प्रेम दशन है। जिस प्रकार 


२१६ 


काव्य 


जछ न रहने पर दोनों ओर सूखी बाढू की बेछा रह जाती है 
उसी प्रकार दो मनुष्यों के बीच यदि प्रेम की नदी नहीं बहती 
तो थे सूखी बाढू के समान हैं-मिट्टी के पुतक्े भर हैं । 

यहाँ इस कविता में 'बालू की बेछा” का अथे है स्नेह हीन 
जीव; कवि ने अपने रहस्यवादी ढंग से अपने प्रेमी को उल 
हना दिया है कि वह आँख बचा कर भागा फरता है और बाल 
के समान ख्ह हीन है। पर साथ ही यह भी कह दिया है कि मैं 
तुम्हारी परवा नहीं करता । मेरा प्रेम सापेक्ष नहीं है। मेरा हृदय 
तो भरा हुआ है। मैं उसके रस से तुम्हें भी नहराया करता हूं। 
चाहता हूँ; तुम भी पुछकित और प्रावित रहो। बस | 

सच्चे रहस्यवादी की एक बड़ी विशेषता है. कि वह जीवन के 
सेल को बुरा नहीं कहता । वह मेल में मिछत का सुख छटता है- 
( कम से कम ) छूटने का यत्न अचश्य करता है'। जीवन का रस 
लेने वार प्रत्येक आदमी यही करता है। केवछ साधक एकान्त 
: में कुछ सिद्ध करना चाहता है। इसीसे तो कवि कहता है कि में 
वह एकान्त साधना बाछा मिलन नहीं चाहता। मैं चाहता हूं, 
तुम इस जीवन की भीड़भाड़ में ही मिलो | देखो यदि तुम आँख 
बचा कर भागोगे तो इस जीवन रूपी मेले का मजा ही किर 
किरा हो जञायगा | 

अब यदि देखा जाय तो इस कविता में रहस्यवाद की सभी 
मुख्य बातें आ गई हैं। रहस्वचादी का सब से पहला रक्षण है 


२१७ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


आत्मानुभूतति का स्वर | वह इसमें है । यही स्वर यहाँ तक बढ़ 
जाता है कि वह समाधि की कोटि वाले अनुभव तक पहुँच 
जाता है | दूसरी बात होती है संसार भर में एक परम हृदय को 
देखना और उसके चरणों में अपना स्वस्ब सॉपना। तीसरी 
वात है साधना और बुद्धि को अयोग्य पाकर हृदय के सहारे 
आगे वढ़ना, और चौथी विशेषता है मानव जीवन को सुंदर सम- 
झना, संसार के सुख-दुःख दोनों को चाँदनी और अंधेरी के समान 
अपनाना-इस बड़े मेछा का आनन्द लेना। इसी जीवनानत्द 
की खोज में झड्डार और करुणा दोनों का क्रम चछा करता है ! 
इसी से रहस्यवादी का पांचवा लक्षण और सब से अधिक 
सुनाई पड़ने वाछा लक्षण है, उसका संगीत | वह कभी संयोग का 
गीत सुनाता है और कभी विरह का करुण क्रन्दून करता है। 

ये सभी बाते इसमें आ गई हैं। इसमें प्रणय की प्राथना है | 
इसी से करुण राग नहीं है। करुणा वाली वात दूसरी कविता में 
अच्छे ढंग से आई है। कबि कहता है कि यह किसी हृदय का 
विपाद है, इसे छेड़ो मत यही उस हृदय के लिए सुख का कण है; 
विषाद में ही सुख है इसे अनुभवी छोग जानते हैं । देखो इसे तंग कर 
के भगाओ मत | यह करुणा का थका हुआ पैर है । जिस उपचार की 
सुकुमारता से चतुर र्लेही किसी दुःखी और थके हुए के पैर की 
सेवा करता है, उसी सावधानी से इस हार्दिक विपाद को भी शान्त 
करने की कोशिश करो | वड़ा सुख मिलेगा । अछोकिक आनन्द ! 


२१८ 


काव्य 


“विषाद' का वर्णन करने के छिए कवि ले एक विषाद से भरे 
भनुष्य का सजीव चित्र खींचा है और यह 'कौन” वाली शैली तो 
रहस्यवाद की बड़ी पुरानी ओर प्रिय शैडी हैे। ऋग्वेद में है, 
भवशूति में है; कबीर में है, परिचमी सन्‍्तों में है और प्रसाद की 
बाद वाली रचनाओं में है। यहाँ एक बात ओर ध्यान देने की 
है कि “ऑसू? कबि को बहुत प्रिय है। प्रारम्भ में हम ऑसू का 
वर्णन पढ़ चुके हैं । ऑसू का उल्लेख यहाँ भी है ओर आगे चढकर 
तो ऑसू पर कोष काव्य ही हम पढ़ेंगे । अतः ऑसू का तत्त्व कवि 
की बुद्धि और कछा के अध्ययन में बड़े महत्व का है। “ऑटधू? 
रस का अनुभाव है। जिस स्थायी भाव की अनुभूति होने से रस 
मिछा उसी का अनुचर भाव है ऑसू। वह रसानंद्‌ तो चला गया 
जसकी स्टति है, उसका अनुभाव याद है। कवि उसी की बार-घार 
घुमा फिराकर चर्चा करता है, उसकी एक रास कहानी कहने 
लगता है और कथा के अन्त में ऑसू को ही पुकार कर कहता है-- 

सबका निचोड़ लेकर ठुस 

सुख से सूखे जीवन सें। 
बरसों प्रभात हिसकन सा 

आँसू हस विश्व सदन सें। 

जैसे प्रभात के हिमकणों में जीवन दब रहता है, मानव जीवन 
का सुख सौन्दर्य और स्वास्थ्य रहता है, उसी प्रकार ऑँू में सूखे 
जीवन को हरा भरा करने की शक्ति रहती है। वह रसायन है ।, 


२५१९ 


प्रसाद भोर उनका साहित्य 


सब का निचोड़ लेकर जो बना है। हृदय का सब कुछ इसी में 
त्तोहे! 

यह आँसू काव्य का अन्तिम पद है। यदि आरम्भ से अन्त 
पक के पद्मों को क्रम से पढ़ा जाय तो आँसू की पूरी कथा तैयार 
हो जाती है। यद्यपि सभी पद्य मुक्तक हैं तथापि उनका क्रम बन्ध 
उनके प्रबन्धार्थ की ओर संकेत करता है। यह १९० पद्मों का 
कोप नहीं, खण्ड काव्य है, इसमें आदि और अन्त की व्यवस्था 
है, आँसू के सर्ग-प्रकय की कथा है, मानव हृदय के चढ़ाव-उतार 
की एक झाँकी है । 

दो तीन बातें ध्यान में रखकर चलने से प्रसाद की भाषा 
और बिचार धारा दोनों सुल्झी हुईं दिखाई पड़ेंगी। इसी से उस 
झाँकी का पूरा दर्शन करने के लिए प्रसाद के प्रतीकों पर सब से पढिले 
ध्यान रखना चाहिए। अभी पीछे झरना की दो कविताएँ समझने 
में बाढ्ल की बेछा और विषाद का अथे स्नेह दीन भीरस व्यक्ति 
और करुणकाव्य सा विषादयुक्त हृदय कर चुके हैँ। इस प्रकार 
के उपचार और अलंकार तो सामान्य बातें हैं, कवि ने सांगए 
पृथ्वी और आकाश के साहश्य पर मन, बुद्धि और हृदय का 
चर्णन किया है। मानस सागर में सुख दुःख की छहरें उठती हैं; 
चुथ्वी के प्रकाश के समान बुद्धि का ज्ञान है और हृदय तो रहस्य- 
पूणे आकाश के समान “नील नीलय' है। इसी प्रकार जब वर्षो 
डोती है. तब समुद्र से उठकर जो उष्णता ( गरम भाष ) आकार 


ब्र्० 


फान्य 


में बादक बन कर छाई रहती है वही तो वरसती है। इस प्राक- 
तिक दृश्य को सामने रखकर कवि ने सालस सागर से लेकर 
विश्वसदन त्तक की चचौ की है। ओऑसू का जन्म उस हृदय ताप 
से होता है जो मानस सागर में उत्पन्न होता है। पर इन छाक्ष- 
णिक और साहिल्िक प्रयोगों को संकेत समझना चाहिए। खींचा 
तानी करके अनर्थ न करना चाहिये। 

ओसू के तो कोई भी पद्म उद्धत किए जा सकते हैं और 
उनकी व्याख्या करने से यह पता चछ सकता है, कवि में हृदय की 
गंभीरता कितनी है। अत: हम थोड़े से उदाहरण देंगे और पहले 
छंद से ही प्रारंभ करेंगे । 

यद्यपि प्रसाद का सिद्धान्त है कि सन में दुःख सुख छिपदे 
सोते हैं तथापि वे कचि हैं करुणा कलित हृदय के--असीमः 
बेदना के-- 


इस करुणा कंलित हृदय में 
अब विकर रागिनी बजती 
क्यों द्वादकार स्वरों में 
चेदना असीम गरजती ? 


मेरे हृदय को करुणा ने सथ डाछा है। उसमें तो अब तड़- 
पन की रागिनी बजती है। केवछ असीस वेदना का हाहाकार 
सुनाई पड़ता है। और-- 


२२१ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


मानस-सागर के तट पर 
क्यों छोछ लहर की घाते 
कल-कल ध्वनि से हैं फहतीं 
कुछ विस्टृत बीती बातें! 
मेरे मानस सागर में ऐसी हलचल है कि भूछी हुई बीती 
बातें याद आ रही हैं। ( जब हृदय में वेदना रहती है तो मन में 
न जाने कहाँ की भूली बातें रह रह कर आया करती हैं। बढ़ी 
स्वाभाविक और मनोवैज्ञानिक बात का यह लाक्षणिक वणन है।) 


आती है शरूल्य क्षितिज से 

क्‍यों छौट प्रतिध्वनि मेरी 
टकराती बिलखाती सी 

पगली सी देती फेरी ! 


मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि शून्य क्षितिज से भी मेरे दाह 
कार खरों की ग्रतिध्वनि छौट कर आ रही है। (इस समय मेरा 
हृदय और मन ही नहीं, बाह्य प्रकृति भी वेदनामय हो गई है। ) 
मेरा हृदय पुकारता है, पर बाह्य संसार में उत्तर नहीं मिलता, 
इसी से वह पुकार विछखाती हुई लौट आती है। 
कस गईं एक बस्ती है 
स्मृतियों की इसी हृदय में 
नक्षन्न-छोक फैला दे 
अैसे इस नील निकय में । 


र्श्र 


काब्य 


और भीतर के हृदय का यह हाल है कि उससें तो स्टवतियों 
की एक बस्ती वस गई है। एक दो वातें नहीं है। तारों के समान 
न जाने कितनी असंख्य अतीत स्मृतियां हैं, जो चमक-चमक कर 
बेदना के अन्धकार को गहरा और अनुभवगम्य बनाती रहती हैं । 

शीतल ज्वाछा जलती है 
ईंधन होता दृश जरूू का 
यह घ्यर्थ साँछ चल-चल कर 
करती है काम अनिल्‍रू का | 

उस वेदना का अनुभव भी बड़ा विचित्र है। में ही जानता 
हूँ, क्या अनुभव कर रहा हूँ। ज्वाछा जछती है, पर वह भी 
शीतछ। अग्नि तो जला कर भस्म कर देती है, पर यह्‌ विचित्र 
अग्नि सदा सुलगा ही करती है। यहाँ जल कर भस्म हो जाने 
का भी सुख नहीं है । एक और विचित्रता है जल से अग्नि 
बुझती है; पर यहाँ आँखों का जल मेरी आग का इंधन हो जाता 
है। और सॉस का चलना पवन के समान संघुक्षण किया 
करता है । यदि यह निगोड़ी सांस बन्द्‌ हो जाती तो अच्छा था। 
यह तो अब व्यर्थ चल रही है। 

इन पाँच पद्मों की व्याख्या से ही हमें यह अनुभव होने छगता 
है कि ऑसू के वर्णन में भाव की कितनी गहराई है। हमारा 
अनुभव है कि यदि व्याख्या करते चलें तो आगे के सभी छन्द्‌ 
ऐसे दी दर्द भरे, सीठे और सोने लगते हैं कि हम सोचते हैं 


२२३ ह 


प्रसाद और उनका साहित्य 


कि एक छन्द और गुनगुना छे। तब वस रहने देंगे, पर अन्त तक 
यह छोभ वढ़ता ही जाता है। इसी से निर्दय आछोचक की तरह 
दिल मसोस कर हम आँसू की उन थोड़ी सी बातों पर विचार _ 
करना चाहते हूँ, जिनसे ऑँसू के सभी पद्मों को समझने में सहा- 
यता सिल्ले । सच पूछा जाय तो इन पाँच पतद्मों की सच्ची व्याख्या 
के लिये ही इतना विचार और दर्शन आवश्यक है। 

प्रो० पं० हरीदत्त दूबे एम० ए० द्वारा लिखित आँसू पर यह 
लेख हस्तलिखित “हिन्दी” के प्रसाद-भंक से उद्धृत किया गया है। 
लेख अलमन्त मार्मिक होने के कारण ही यहाँ दिया जा रहा है। 

आँसू व्यथित हृदय का मूर्त ह्ाहकार है। संसार में ऐसी बहुत कम 
आँखें होंगीं जो आँसुओं के पर्व॑स्नान से पूत न हुई हों, जो द्रवीमूत हृदय 
का मार्ग वनकर कतहत्य न हुई हों । किन्तु ऑल केवल आँखों को ही पवित्र 
नहीं करते; वे समस्त वाह्य ओर आन्तर मानव जीवन के लिए मन्त्रपूत 
अभिषेक का कास करते हैं। हाँ, उनकी यह समस्त जीवन-व्यापिनी पावनता 
साधारण-बुद्धि-प्राह्म वस्तु नहीं है। मनुष्य ने अपने जीवन के उपाकाल में भी 
आँछू बहाये होंगे और आज भी वह ऑसू वहाता है; किन्तु उसने सदैव ही 
इन्हें एक मौतिक वस्तु समझा। संसार के इतिहास में बहुत कम असंग ऐसे आये 
हैं, जब गंभीर विचारकों ने इनकी यथार्थ गंभीरता को समझा और उन्हें भमर 
करने का प्रयत्न किया। मुझे इस समय अच्छी तरह स्मरण है कि वाल्मीकि 
की काव्यकृति उनकी कौश-वध-जन्य वेदना की मूर्त माठिका है. भर भंव्भू: 
ति की कृति विरह-व्यथित राम के रोदन-रस॒ का स्थूछ स्वहप । किन्दु मैं 


ब्र्टे 


काव्य 


आँसूओं को और भी अप्लिक गहराई से भी उत्न्न पाता हूं ओर मेरी शिका- 
यत है कि उस गहराई की और उतना ध्यान नहीं दिया गया है, जितना 
दिया जाना चाहिए था। आधुनिक काल में जयशंकर प्रसाद इस गहराई तक 
पहुँचे थे । आज हम उनके ऑंछुओं की समीक्षा करेंगे । 

संसार में अनेक कारणों से और अनेक रूपों में वेदना का आविभाव 
होता है ! किन्तु वेदना भोतिक संसार की वस्तु न होकर मानस मंसार की 
वस्तु होने के कारण उसके सम्बन्ध में विचार करते समय हम अप्रत्यक्ष या 
प्रत्यक्ष रूप से मनुष्य के मन की ही विवेचना किया करते हैं। अपने वत्तेमान 
प्रसंग के लिए मानवपन की दो विशेषताओं पर हमे ध्यान देना होगा, जिन पर 
हम क्रम से विचार करेंगे। 

जीवन दो भ्रकार के अनुभवों की समष्टि-सा प्रतीत होता है; इन अनु- 
भवों को हम स्थूलतया प्रिय और अग्रिय अनुभव कह सकते हैं । हमारे 
लाख प्रयत्न करने पर भी अनेक अग्रिय अनुभव हमारे सार्ग मे आही पड़ते 
हैं ओर हमारे लाख प्रयत्न करने पर भी उनमें से अधिकांश ठाले नही टलते। 
इतनी बात तो संसार के प्रत्येक मनुष्य के लिए सच है; किन्तु इन अनुभवों 
की मानसिक अतिक्रिया में अंतर है। अधिकांश लोग इन अप्रिय अनुभवों के 
भौतिक पाइवे से ही लड़ने झगड़ने में अपनी सारी शक्ति लगाते हुए अपनी 
जीवन-यात्रा समाप्त करते हैं। कुछ लोग इनकी गहराई में जाकर सोचने का 
प्रयत्न करते हैं; किन्तु उनकी कद्धता से पक्षाहत होकर रह जाते हैं। बहुत 
थोड़े लोग इस कद्धता से अविजित रहकर अपनी खोज में सफल होते हैं। 

बाहरी जीवन में हमें प्रति दिन ही ठेसें छगा करती हैं। यदि हमारे 


१०५ श्र५ 


प्रसाद ओर उनका साहित्य 


मन में आत्माभिमान है तो ये ठेसें हमारे अन्तःकरण में एकत्र हुआ करती हैं 
और उनका प्रभाव संग्रहीत होता रहता है। इस एकत्र प्रभाव के मित्र मिन्र 
अंगों का भान धीरे-धीरे नष्ट होता जाता है और उसकी संहतिमात्र ही 
हमारे मानस अनुभव का विषय रह जाती है। इन अंगों को भिन्नता और 
विविधता एक दूसरे संसार की सी वस्तु जान पड़ने लगती है, केपल स्मृति 
सी मन में छाई रहती है। इसी अनुभव को प्रसाद ने अपने किसी कविता- 
भूणे क्षण में इन अमर पक्तियों में व्यक्त किया थाइ--- 
जो घनीभूत पीड़ा थी 
मस्तक में स्एति-सी छाईं। 
दुर्दिन में भाँसू बनकर 
वह भआाज बरसने आई। 

साधारण छोगों के जीवन में जो ऑसू बहते हैं; वे केवल आँखों से बहते 
हैं और एक ही चोट की ठेस से । एक दो चोटों से विचलित न होना साधो- 
रण हृदय का काम नहीं और प्रायः असाधारण हृदय के ऑसू भी अप्ताधारग 
रूप में बाहर आया करते हैं। ऐसे असाधारण हृदयों की घनीभूत पीझ ढक 
चाहर निकालने का सामर्थ्य दुर्दिन' में ही होता है। देखें यह कौनसा 
डुर्दिन है। 

घनीभूत पीढ़ा अन्तःकरण में एक विचित्र आन्दोलन उत्पन्न करती है। 
बाह्य जीवन की ठेसों का अनवरत पुकार सजग मन का संसार की साखत्ता में 
विश्वास शिथिल करता जाता है और कोई भी जागरूक-प्रकृति व्यक्ति सारहीन 
पविश्व-जाल में उद्देरय-हीन जीवन विताने मे तृप्त नहों होता । थे अतृ्ति 


श्र 


कान्य 


किसी न किसी अंश में समी व्यक्तियों को अनुभूत होती है; किन्तु सब के 
जीवन में वह स्थिर वेदना को सीमा तक नहीं पहुँचती, वल्कि धीरे धीरे 
अभ्यस्त हो जाती है और व्यक्ति दृश्यमान संसार को ही वास्तविक मानकर 
उससे घुल मिल जाता है। कुछ व्यक्ति ऐसा नहीं कर सकते । उनकी आतर 
प्रेरणा इस अकार, संसार में घुल-मिल जाने के लिए तब तक पैयार नहीं होती 
जब तक कि उसकी सारवत्ता में उसका सच्चा विश्वास उत्पन्न नहीं हो जाता | 
गंभीर-प्रकृति व्यक्तियों के जीवन में आंतर तत्त्व अपनी अभविष्णुता जताना 
च्वाहता है और बाह्य संसार में अपना जातीय तत्त्व प्राप्त करने के लिये 
उत्सुक होता है। वाह्य संसार में सारहीनता का अभ्यास उसकी इस परृत्ति 
का स्पष्ट विरोध करता है, जिसे वह सहन नहीं कर सकता । वाह्य जगत्‌ की 
सारहीनता के अभ्यास की वृद्धि के साथ उसकी आकुलछता बढ़ती जाती है । 
यह एक बढ़ा ही मनोहर विरोध है ओर इसका वर्णन वडी ही मनोहर रीति 
से प्रसाद ने किया हैः-- 
सावस खागर के तट पर 
क्यों लोछ लहर की घाते 
कलकछ ध्वनि से हैं कहतीं 
कुछ विस्छृत बीती चाते ? 
शाती है शल्य क्षितिज से 
क्यों छौट प्रतिध्वनि मेरी ? - 
टकराती, बिलखाती सी 
पगलछी-सी देती फेरी ! 


श्२७ 


भ्र्ताद और उनका साहित्य 


क्यों व्यधित व्योम-गंगा-सी 
छिटकाकर दोनों छोरें 
चेतना-तरंगिनि.. मेरी 
लेती है झदुलऊ हिलोर?! 

इस बात को समझने के लिये थोड़ा और विचार करना आवश्यक है। 
मन या चेतना की स्थिति हमारे जीवन में ऐसी जगह है कि वह जीवन को 
दो भागों में बाँटती है, एक है वाह्य गोचर संसार और दूसरा है चेतना के पीछे 
का, उस पार का, रहस्यमय संसार । इन दोनों में सम्बन्ध स्थापित करने का 
साधन है चेब्ननता | इस पर पड़े हुए ग्रोचर संसार के प्रभाव तो हम समझ 
सकते हैं, किन्तु उस पार के रहस्यमय संसार के प्रभाव प्रायः नहीं समझ 
पाते । ये प्रभाव कुछ विस्मघ्ृत बीती-सी बातें” कहा करते हैं । इन प्रभावों का 
अर्थ हूँदने के छिये हमारा मन आतुर हो उठता है और साधारणतया 
बहिर्मुख होने के कारण गोचर-संसार में निकल पता है; किन्तु पहा क्या 
मिलने वाला है ! वह से वह बिलखता-सा, 2करातान्सा, और पागल-सा लोड 
आता है और सारी चेतना-तरंगिणी छुब्ध हो उठती है। व सुन्दर 
रूपक है ! ये व्यर्थ प्रयत्त जिस वेदना की सृष्टि करते हैं, उसने हिन्दीः 
संसार में बड़े सुन्दर काव्य को जन्म दिया है। प्रसाद! के आँसू इसी 
चेदना से निकले हैं। बहुत समय पहिले कवौर इस कौ अशंता कर 
भग्रे हैं:-- 

हँस हँस कैतन पाइया लिन पाया तिन रोय। 
हाँसी खेले पिडउ मिले तो कोन खुहागिन होय ॥ 


श्र्८ 


सुखिया सब संसार है खावै जी सोवै। 
दुखिया दास कबीर है जागे औ रोचै ॥ 
“-कबीर 

इस बेदना का परिणाम यह होता है कि साधक जागता है और रोता दै। 
साथ ही उसे अब तक के सुख-सम्पादक नाम-रूपात्मक संसार में किसी रस 
का अनुभव नहीं होता, आन्तरिक जागरुकता के कारण वास्तविक संसार एक 
स्वप्न-सा दिखने लगता है, उससे एक प्रकार फी दूरी का अनुभव होने लगता 
है और हृदय में एक अमूत्ते संसार की कल्पना जागृत दोती है.--- 

बस गईं एक बस्ती है 
सट्रतियों की इसी हृदय सें । 
नक्षत्र लोक फैला है 
जैसे इस नील निलूय में ॥ 

बेदना बढ़ते बढ़ते विद्व-व्यापिनी हो जाती है। भावाधिक्य का यहदी 
परिणाम होता है । यथार्थ में हमें अपना हृदय ही तो बाह्य संसार में प्रति- 
विम्बित दिखता है। जब हस असन्न होते हैं, तो संसार प्रसन्न हो जाता है 
ओर जब हमारा हृदय रोता है तब सारा संसार हमारे साथ रोता है। कबीर 
को अपनी सिद्धावस्था में सारा संसार अपने प्रिय की लाल्मा से लाल 
दिखता है -- 

लाली मेरे छाछ की जित देखों दित छाल । 
छाली हूँढ़न मैं गई में सी दो गई लाल ॥ 
“कबीर 


२२५ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


परन्तु प्रसाद! तो अभी तक सिद्ध नही 'थे और इसलिए--- 
जब नीकछ निश्चा-अंचल में 
द्विकर थक सो जाते हैं। 
अस्ताचछ की घाटी में 
दिनकर भी खोजाते हैं। 
नक्षत्र डूब जाते हैं 
स्वगंगा की धारा में। 
बिजली बन्दी होती जब 
कादुम्बिनि की कारामे। 
सणि-दीप विश्व-मंदिर की 
पद्दिने किरणों की माछा | 
तुम एक अकेली तबभी 
जलती हो मेरी ज्वाला। 


चातक की चकित पुकारें, 
इयामा-ध्वनि तरर रसीली । 
मेरी करुणाह कथा की 
हुकड़ी आँसू से गीली ! 
सारा संसार द्वी उनके ऑठओं से गीला है ! 
यह है आँसू के सम्बन्ध में लेखक का दृष्टिकोण ; किन्तु इतना कह देने 
मात्र से सध बातें स्पष्ट नहीं हो जाती। कम से कम एक दो बातों का संथे- 


२३० 


काव्य 


करण आवश्यक है। सब से पहिली बात है रीति से सम्बन्ध रखनेवाली १ 
रहस्यवाद के सम्बन्ध में जो आ्राति आज हिंदी-संसार में फेली है, उसका 
सम्बन्ध इसी विषय से है। हम आरंभ में ही देख आये हैं. कि हमारा मन' 
हमारे आंतरिक रहस्यमय संसार और बाह्य भीतिक संसार के वीच मध्यस्थ 
का-सा काम करता है । हमारे जीवन के सच्चे ओर गम्भीर अनुभव बाह्य 
संसार में नहीं, आंतरिक संसार में उत्न्न होते हैं । एक स्थिति आती है; जब' 
हम विश्व के आधार-भूत सार-तत्त्व के लिए लालायित हो उठते हैं और अकृति 
का एक नियम है कि हमारी तीत्रतम छालसाएँ किसी न किसी रूप में बाहर 
निकलने का प्रयत्न करती हैं। किन्तु इस सम्बन्ध में सब से महत्त्व की वात 
यह है कि आंतरिक अनुभवों की व्यक्त करने का मतलब है, एक संसार के 
प्राणियों को दूसरे संसार में उतारना । आतरिक अनुभवों को वाहर आने का 
एक ही मार्ग है और वह है मन। पर सब का मन एक ही सा नहीं होता । 
हमारे शिक्षा-संस्कार आदि का प्रभाव हमारे मन पर पड़ता है ओर यह प्रभाव 
उसमें से निकलने वाले सभी अनुभवों पर अपना रंग चढ़ाता है। बौद्धिक 
शिक्षा के सस्कार से रहित मन एक सीधे साथे कॉच के समान है और 
संस्कृत मन रंगीनकाँच के समान-असंस्क्ृत मन भीतरी अनुभवों को असंस्कृत 
रूप में ही बाहर छाकर रख देता है, पर संस्कृत मन पेचीदा रुपकों आदि 
का सहारा लेकर उन अनुभवों को जीवित करके बाह्य ससार के प्राणी बनाने” 
का प्रयत्न करता है। कबीर कौ रहस्यवादी कविता पहिले प्रकार का 
उदाहरण है ओर 'प्रसादः की रहस्यवादी कविता दूसरे प्रकार का। 
पहिले प्रकार में कविता कम और सूखा सत्यल्ल अधिक रहता है और दूसरेः 


२३१ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


प्रकार में सत्य काव्य की अलोकिक सुषमा का आंच्छादन ओद्कर आता है। 
पहिले प्रकार की कविता रूखी दो; किन्तु उससें आ्रांति की संम्भावना कम 
रहती है। दूसरे प्रकार की कविता सरस होती है; पर उसमें श्रांति की 
सम्भावना भी अधिक रहती है। 'क्षौनी झीनी बीनी चद्रिआ /' और पूँघट 
के पट खोल री तोहे राम मिलेंगे! रूपक हैं, पर इतने स्पष्ट कि उनके 
सम्बन्ध में अन्यथा अहण की संभावना नहीं। यह वात प्रसाद्‌ जी के सम्बन्ध 
में लागू नहीं है। उनका वर्णन इतना सजीव हो गया है कि उनके आत्मिक 
अनुभव भौतिक अचुभवों की आंति उत्पन्न करते हैं। 
इतना सुख्र ले पकछ भर में 
जीवन के अन्तस्तक से 
तुम खिसक गये धीरे से 
रोते जब प्राण चिकक से । 
पं ५ ८ 
हुल॒ क्या था, उनको मेरा 
जो सुख लेकर यों भागे! 
सोते. में छुम्बन लेकर 
जब रोम तनिक सा जागे।! 
सव से अधिक भ्रामक है 'ऑंसूः के १७ वें पृष्ठ पर आरंम होने वाला 
भाग जिसका आरंभ है ' धॉधा था विधु को किसने इन काली जंजीरों से! 
यह स्पष्ट भौतिक सीौन्दर्य-चिन्नण है। सम्पूर्ण भाग मानवनसौन्दर्य 
का अत्यंत अनुरक्त वर्णन है और मुझसे इस वर्णन की आध्यात्मिकता 


श्श्र 


काय्य 


दिखाने के लिए कद्दा जा सकता है। इस सम्बन्ध में मैं अपने पाठकों का 
ध्यान इसके पहिले के भाग की ओर आइृष्ट कहँँगा जिसका अंतिम 
छंद है :-- 
छावण्य शैल राईसा 
जिस पर बारी बलिहारी 
उस कमनीयता कछा की 
सुषमा थी प्यारी प्यारी। 

संसार के आधार-तत्त्व को पाने के प्रयत्न में कवि को किसी अनिर्वेचनीय 
तथ्य आंशिक और क्षणिक अनुभव होता है, किन्तु वह क्षणिक मिलन भी 
इतना सुखकर है कि कवि का पागल हृदय उस रूप का स्मरण करके 
बार बार रस-मुग्ध हो उठता है। यह रस रागातिशय उस सौमा फो पहुँचता 
है, जहां उसे संसार का समस्त एकत्र सौन्दर्य तुच्छ जान पढ़ता है ओर उसका 
अनुभव बुद्धि की सीमा से सम्पूर्णतया स्वतंत्र होकर केवछ रागमंय हो जाता 
है। और यह तो हम जानते ही हैं. कि राग परिचित स्थूल के लिए आतुर 
रहता दहै। परिणाम यह होता है कि कवि अपनी उस गहराई से निकल कर 
एकदम भौतिक पृष्ठ पर दौड़ आता है और किसी परिचित व्यक्तित्व को पकड़ 
लेता है। यह परिचित व्यक्तित्व स्थूल संसार की कोई भी वस्तु हो सकती 
है; मूर्ति, चित्र, प्रेमी, प्रेमिका, स्थान, समाज आदि। जहां भी ऑस में 
ऐसे भौतिक वर्णन मिलते हैं, इसी रागातिरेक के योतक हैं ! हां, कुछ प्रसंग 
ऐसे अवश्य हैं जहां वणेन की स्पष्टता उसके रूपकत्व की ओर एकदम हमारा 
ध्यान आक्ृष्ट कर देती है :--- 


२१३ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


0... 


छायावट छवि-परदे में 
सम्मोहन वेणु.. बजाता 
संध्या कुहुकिनि अंचल से 
कौतुक अपना कर जाता। 
किन्तु इस प्रक्रार के वर्णेन कम हैं । 
इस कार यह स्पष्ट है कि प्रसाद! के आँसू उसी बेदना के परिणाम हैं, 
जिसने कबीर के रहस्यवाद को जन्म दिया था और जिसने दरद' होकर दाद, 
को हैरान किया था। हां, एक बात ध्यान में रखी जाय; 'भाँसू” की रचना तक 
'प्रसाद! छृगभग एक सद्योजात रहस्यवादी हैं। उन्हें अपने प्रियका, इस 
बिखव के आधारभूत तत्त्व का, आंशिक और क्षणिक ही दर्शन प्राप्त हुआ है 
और इसलिए अब तक उनकी बेदना निश्चित और स्थिर सुख में परिवर्तित 
नहों हुई है। अपनी नई भूमिका का उन्हें भान तो होता है; किन्तु वे निश्य- 
पूर्वक उसकी उपादेयता की घोषणा करने में सकुचाते हैं। और ऐसा होना 
स्वाभाविक ही है। “या जग अंधा मैं केहि समुझावों” कह सकने के लिए एक 
निश्चित और स्थिर स्थिति की आवश्यकता है । 
नाविक इस सूने तट पर 
किन छहद्रों में खे राया ! 
इस बोहड़ चेका में क्‍या 
अब तक था कोई भाया! 
इससे घबराहट स्पष्ट है यद्यपि उन्हें अपनी नई श्राप्ति की कल्याण सम्पाद्कता 
में बद्धिंगत विख्वास है :-- 


२३४ 


काव्य) 


निर्मम जगती को तेरा 
संगलमय मिले उजाला । 
इस जछते हुए हृदय की 
कल्याणी शीतल ज्वाका। 
आलछोचक ने “जिस मंगलमय उजाला” की बात छेड़ी है, वह 
कवि की कामायनी में है और है शरद्‌ पूर्णिमा की पूर्णवा 
में, सुंदर ओर साकार | ऑसू और कामायनी में एक ही हृदय की 
दो अवस्थाएँ हैं और इन दोनों के बीच के अज्लुभव लहर में 
बिखरे हुए हैँ । इस प्रकार प्रकाशन का क्रम ही अध्ययन का भी 
क्रम होना चाहिए--आँसू, छहर और कामायनी। इन्हीं तीनों 
कृतियों में कत्तो की बुद्धि ओर कछा का पूरा परिचय मिल 
जाता है। 
आंसू खण्ड काव्य है। चित्राघार, कानन कुसुम और झरना 
में कवि की सावनांएँ अपनी साकार प्रतिमा न खड़ी कर सकी थीं।' 
आँसू में भावनाएँ अपना पूछ रूप प्रदर्शित करती हैं । उन दिनों 
कवि की आत्मा आकुछ थी। वर्षा के दिन थे। प्रसाद जी सदैव 
नोटबुक और फाउन्टेन-पेन अपने साथ रखते थे। कभी नाव पर 
अथवा एक्के पर बैठे ही वह आँसू की पंक्तियाँ छिख कर सुनाते। 
आऑसू की रचना सें छयगभ्रग एक वर्ष का समय छगा है। वह 
इसी तरह फुटकर पंक्तियाँ ही -लिखते गये किसी दिन दो चार 
पंक्तियों से अधिक उन्होंने नहीं लिखीं | 


श्श्५ 


असाद और उनका साहित्य 


ऑसू प्रकाशित होने पर उसकी ख्याति और भ्रचार खूब 
हुआ आँसू का प्रभाव इतना पड़ा कि इस छन्द्‌ में कविताएं 
होने छगीं। बहुतों ने इसका अनुकरण किया। इसके दूसरे 
संस्करण में प्रसाद जी ने कुछ परिवत्तेन किया और आकार भी 
दूना बन गया | 

आँस में ऐसा प्रतीत होता है कि कवि के यौवन में पैभव के 
'बिछास का स्वर करुण मान बनकर गूँजा हे। जैसे रोने के बाद 
मन हलका होता है वैसे ही आँस लिखकर ही कवि की आत्मा 
को शान्ति मिल गई थी। मानव-हृदय की पवित्र निधि में से 
एक ऐक बुन्द निकल कर जैसे बरस पड़ती है। वही रूप आँसू 
के पदों में भी है। 

महादेवी जी मे थामा की प्रस्तावना में सुख-दुख का 
बड़ा ही धार्मिक विवेचन किया है--मेरा हृदय सुख-ढुख में 
सामझस्य का अनुभव करने छुगा । पहले बाहर खिलने वाले फूछ 
को देखकर मेरे रोम रोम में ऐसा पुलक दौड़ जाता था मानो वह 
मेरे ही हृदय में खिला हो, परन्तु उसके अपने से मिन्न अलक्ष 
अनुभव में एक अव्यक्त वेदना भी थी, फिर यह सुख-दुख मिश्रित 
अनुभूति ही चिल्तन का विषय बनने रगी और अन्त में अब मेरे 
मन ने न जाने कैसे उस बाहर भीतर में एक सामजत्य सा ह॥ 
लिया है, जिसने सुख-दुख को इस प्रकार बुन दिया कि एक के भ्त्यक्ष 
अनुभव के साथ दूसरे का अप्रत्यक्ष आभास मिलता रहता है । 


२३६ 


काब्यः 


प्रसाद जी के ऑसू के इस पद्य में इसी'सुख-दुख के साम- 
झुस्य का एक सजीव चित्र है-- 
छिपटे सोते थे मन में 
सुख-दुख दोनों ही ऐसे, 
चन्द्रिका अंधेरी मिलती 
सालती कुञ्ल में जैसे । 
ऑसू में केवल कवि का करुण ऋन्‍दन ही नहीं, उसमें 
सान्त्वना भी है-- 
चैतना छहर य॒॑ उठेंगी 
जीवन समुद्र थिर होगा । 
संध्या हो सर्यग प्रतल्य की 
विच्छेद मिलन फिर होगा ॥ 
प्रसाद जी का विचार था कि आँसू को ही कामायनी का 
एक सर्ग रखें, किन्तु कथानक की कठिनाई के कारण उन्होंने 
चैसा न करके ऑसू को स्वतन्त्र ही रखा । इसमें सन्देह नहीं कि 
ओऑसू की रचना के पश्चात्‌ ही महाकाव्य की प्रेरणा हुई और 
कामायनी उसी का फल हे । 
आँसू के बाद 'लहर' प्रकाशित हुईं। कवि के हृदय की 
विशालता का परिचय इन पंक्तियों में मिलता है। 
तुम हो कौन और में कया हैं! 
इसमें क्‍या है धरा, सुनो। 
२३७ 


असाद भौर उनका साहिल 


मानस जरछूधि रहे चिर चुम्बित- 
मेरे क्षितिज ! उदार बनो। 

हँस! के आत्मकथांक में बहुत आग्रह करने पर भी प्रसाद जी 
'ने अपनी आत्म-कथा गद्य में नहीं लिखी, बह अपनी जीवन गाथा 
का मर्ममय इतिहास अपनी लेखनी से केवल काव्य की छुछ 
पंक्तियों में ही छोड़ गये हैं। यह कविता उनकी आत्म-कथा के 
रूप में हंस के आत्मकथांक में प्रकाशित हुई थी। श्रसाद जी का 
सम्पूर्ण व्यक्तित्व इस कविता में छिपा हुआ है । उनकी सरलता 
और हदृढ़ता का संकेत इस पंक्ति में है--सीवन को उघेड़ कर 
'देखोगे क्‍यों मेरी कंथा की ९ 

सथुप गुन-गुनाकर कह जाता कौन कहानी यह अपनी, 

झुरक्षाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो क्रितती आज घनी। 

इस गम्भीर अनन्त-नींलिमा में असंख्य मानव इतिहास- 

यद्द लो, करते ही रहते हैं, अपना व्यडग्य सक्षित उपहास । 

सब भी कहते हो-कह डाले दुर्बहता अपनी-बीती। 

सुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह् गागर रीती | 

किन्तु कहीं ऐसा नहों कि सुम हो खाली करने वाछे- 

अपने को समझो, मेरा रस छे अपनी भरने वाले। 

यह विडस्वना | भरी सरव्ते तेरी हँसी उड़ाऊँ में। 

मूलें अपनी, था प्रवश्चनना औरों की दिखलाऊँ में। 

उज्ज्वल गाथा कैसे गाडऊँ मधुर चाँदनी रातों की । 


श्रे८ट 


काब्य 


भरे खिल-खिलाकर हँसते होने वाली उन बातों की | 
मिला कहाँ चद सुश्ष जिसका में स्वप्त देखकर जाथ गया | 
आहिज्ञन में जाते-भाते मुसक्‍्या कर जो भाग गया। 
जिसके अरुण-कपोज़ञों की मतवाली सुन्दर छाया सें। 
अनुरागिनी उषा लेती थीनिज सुहाग सधुमाया में। 
उसकी स्छति पाथेय बनी है थके पथिक की पन्‍्था की। 
सीवन को उधेदढ कर देखोगे क्‍यों मेरी कन्‍्था की? 
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाय भाज्ञ कहूँ? 
क्या यदद भच्छा नहीं कि औरो की सुनता में मौन रहूं ? 
सुनकर क्‍या तुस भला करोगे-मेरी भोली आत्म-कथा 
असी समय भी नहीं-थकी सोई है मेरी भौन व्यथा। 
आत्म-कथा भें आप बीती बातों भें से कुछ मर्म की बातें 
चुनछी जाती हैं. और वे इस ढंग से कही जाती हैं कि कहनेवाले 
का सच्चा जीवन सुनने वाले के सामने आ जाय | वक्ता अपनी 
सब से बड़ी बात कहता है चाहे वह अछोकिक और गोपनीय ही 
क्यों न हो। अतः आत्म-कथन में स्वाभाविकता और सचाई के 
अतिरिक्त छेखक की वह निजी छाप रहती है, वह जीवन का मर्म 
रहता है, जिसे हम उसकी अपनी बात कहते हैं, जिससे हम उसे 
पहचानते हैं । 
प्रसाद कबि थे--जीवन के रहस्य को खोजने बाले मनुष्य थे 
इसी से आत्म-कथा में उन्होंने कवि जीवन की उज्ज्वल गाथा गाईं 


२२९ 


प्रसाद भौर उनका साहित्य 


है। वे अपने जीवन की सब से बड़ी बात समझते हैं कवि की दृष्टि 
और अनुभूति वे सीधी और सर आत्म-कथा को विडस्बना 
समझते थे | और सच्चे साहिद्य को हो साहित्यकार की सच्ची 
आत्म-कथा समझते हैं क्योंकि सुख-दुःख वाले जीवन की भपनी 
अनुभूति ही तो साहित्य है। आत्म-कथा न छिखने का दूसरा 
कारण भी कवि ले दिया है। भाई मेरा स्वभाव ऐसा है कि 
औरों की सुनता मैं मौन रहूँ। और मेरी अनुभूति भी ऐसी 
है कि जब वह जागती रहती है, तब तो बोला ही करती है; उसे 
इस असमय में जगाकर अस्वस्थ न करो। आज्ञा से काम 
करना उसका स्वभाव नहीं है। 

इस प्रकार “नहीं नहीं, करने में भी उनके निजी सिद्धान्त 
व्यक्त हो गए हैं। उनकी कला इतनी प्रौढ़ हो गई है कि उससे 
अनजाने ही न जाने क्या क्या सध गया है। कवि को एक संपा- 
दक ने छेड़ा | बार बार आग्रह किया कि कुछ अपने बारे में लि ९ 
दो | उसने खीझकर नाहीं लिख भेजी | खीझ भरा लेख कविता 
बन गया। उससे प्रधान होना चाहिए था विचार, पर हो गया 
कुछ ओर ही । उसमें खीझ् भरा हृदय प्रधान बन गया। इस 
अकार इस कविता में कवि का दशन और काव्य दोनों हैं। यदि 
हम केवछ एक इसी कबिता को ध्यान से पढ़ें तो उनकी बुद्धि और 
कला का पूर्ण विकास देख पड़ता है'। इसी प्रौढ़् भूमिका में आ 
कर उन्होंने अपनी काम्रायनी लिखी है। इस प्रकार अभ्यास और 


२४० 


काव्य 


विकास के विचार से जो चार कार माने जाते हैँ(--आरसम्भ 
काछ २-आंसू के पहले ३-आंसू काल और ४-आंसू के बाद, 
उन में यह चौथे काछ की सिद्ध स्वना है। कबि की अलुभूति 
तो सभी कालछों में पहुँची हुई ओर डूबी हुई है; पर कछा 
इसी काल में भाषा और भाव दोनों का पूर्ण योग सिद्ध कर 
सकी है। 

इन सब ऊपरी बातों से अधिक महत्व की बात यह है कि इस 
छोटी सी रचना में प्रसाद जी ने अपनी बढ़ी कथा कह दी है । 
सब से पहले वे चराचर सृष्टि की ओर संकेत करते हैं और 
प्रकृति से अपना संबंध दिखाते हुए कहते हैं : 

देखो, यह मधुप गुनगुना रहा है। उस का गुनगुनाना ही 
उसकी अपनी प्रेम कहानी है. । दूसरी ओर देखो कितनी अनगिनत 
पत्तियां मुरझा कर गिर रही हैं । एक ओर प्रेम का गीत चछ रहा 
है दूसरी ओर संहार का विराट दृश्य है। थोड़ा और देखो । इस 
गंभीर अनस्त-नीलिसा वाले आकाश में कितने तारे हँस रहे हैं । 
इसी प्रकार न जाने कितने मानव इतिहास नित्य बनते बिगड़ते 
रहते हैं । वे मानो व्यंग की हँसी हँस रहे हैं. कि तुम भी अपना 
इतिहास छिखोगे ? इस अनन्त और गंभीर विश्व को देखो और 
अपने को देखो। 
.. औरें फूलपत्ती आदि प्रकृति की प्रत्यक्ष वस्तुओं और संसार 
के हमारे जैसे ही असंख्य मानवों को देखकर हमारा हृदय तो 


१६ २४१ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


सिहर उठता है। कितने छोटे और दुर्बछ हम हैं। इस विश्व में 
हमारा स्थान ही क्या है | 

तब भी तुम आग्रह करते हो कि अपनी बीती लछिखो | यह तो 
हमारी दुर्बेछताओं का खुला चिट्ठा होगा। हां, उसे सुनने से 
तुम्हें सुख अवश्य मिलेगा । साथ ही तुम यह भी देखोगे कि मेरी 
जीवन रूपी गागर रीती है। उसमें कुछ है नहीं । पर इसी समय 
कवि का आत्म भाव सजग हो जाता है । 

और वह बूढ़े सयाने ग्रहस्थ और चतुर आत्मज्ञानी की भांति 
हँसकर कहता हे कि देखो मैं तो अपनी अपूर्णता दिखा रहा हूँ; 
पर यदि तुम भी अपने जीवन को अच्छी तरह देखोगे तो सम- 
झोगे कि उस में जो रस है तुम्हारा अपना नहीं, दूसरे का हे । 
तुम्हें अपना घड़ा भरा दिखाई पड़ता है और मेरा खाली । इसका 
कारण तुम्हारा असहृदय होना है, यदि तुम सहृदय होकर देखोगे 
तो तुम्हें सभी घड़े भरे दिखाई पड़ेंगे। यदि केवछ ऊपरी आँखों 
से देखोगे कि तुस्हें अपना जीवन तो भरा और पूर्ण दीखेगा, पर 
दूसरों का रीवा और अपूर्ण, अन्ुभव एक दिन वतावेगा इसका 
कारण दूसरे नहीं स्वयं तुम्हीं हो । 

कबि का अभिप्राय यह है कि रस आस्वाद लेने वाले में 
रहता है न कि आस्वाद्य सामग्री में । इसी से यदि कोई कवि के 
अमृत घट में कुछ नहीं पाता तो यह उस भावक की अपूर्णता 
है। यदि उस भावक के पास रस भरा हृदय होता तो वह 


श्षर 


काब्य 


अवश्य कवि के हृदय को पहचान लछेता। 

ऊपर वाले सत्य वचन में कुछ कठुता माल्म होती हे इससे 
सज्जनता और सम्यता का ध्यान रखते हुए विदृग्ध कवि ने बड़े 
सौम्य शब्दों में कहा है कि तुम मेरी गागर रीती पावोगे यह 
सच है, पर ऐसा भी हो सकता है कि तुम्हें अपनी ही अपूर्णता का 
अनुभव होने छगे और यह माछ्म हो जाय कि कवि ने तो दूँद 
बूँद दे डाछा है, इसीके रस से हम भर उठे हैं] अतः यह खाली 
गागर नहीं, आत्मदान दे चुकनेवाला शरद्‌ का प्रसन्न घन है। 
प्रत्येक सहृदय को ऐसा ही अनुभव होता है । जिसे ऐसा अनुभव 
नहीं होता चह सहृदय है। कवि ने किस शिष्ट कौशल से ये दोनों 
यातें कही हैं, देखते ही घनता है । 

आगे कबि कहता हे कि आत्म-कथा क्या होगी, विडम्बना 
होगी ? मेरा जीवन तो इतना सरल हे कि उसकी सरछ और 
भोछी बातें दूसरों को सुनना सरकृता की हँसी उड़ाना हे | सरल 
जीवन के दो ही पक्ष होते हैं भूछें करना और दूसरों की प्रवद्चना 
सहना । इनमें से मैं क्या दिखछाऊँ ? दोनों ही छिपाने की चीज़ 
हैं। केवछ एक बात कहने योग्य है । बह है उस सुहाग रात की--- 
महामिछन की घटना । वह सुख की कहानी अवश्य उज्ज्वल और 
मधुर है। चेत्र-क्षपा के समान उज्ज्वछ और मधुर रातों की और 
उन बातों की जो खिलखिला कर हँसते होती हैं, गाथा गाई 
भी जाय तो कैसे ? एक तो कुछ संकोच होता हे और दूसरे बह 


२४३ 


प्रसाद और उचका साहित्य 


सुख भी पूर्ण रूप से सिला कहाँ ? बह तो स्वप्त था। एक झलक 
भर मिली । अब तो केवल उसकी स्मृति हैं। जिस अकार जागने 
पर स्वप्न की सछोनी स्मृति रह जाती है उसी प्रकार अब हमें 
केवल इतना ही स्मरण हे कि वह आलिंगन में आते आते मुसका 
क्र भाग गया, ऐसे समय में वह भागा कि जब आनन्द की 
पू्णता सी हो रही थी। और उसकी सुन्दरता का क्‍या पूछना 
है। उसके अरुण कपोछों की कान्ति में विश्वसुंदरी उषा भी 
अपना सुहाग छेती थी। उसी परमानन्द और परम सुन्दर की 
स्पृति इन गिरते दिनों में हमारे जीवन का आंधार हे। हम तो 
चलते चलते थक गए हैं। हमें चुपचाप अपनी कन्था सें लिपट 
कर विश्राम करने दो । इस समय बीते दिनों की चर्चा छेड़ना 
कन्था की सीबन को उधेड़ कर देखना है। दया करो। यह न करो। 

भाई, यदि तुम्हें सुनना ही है तो कभी फिर सुन लेना। भाज 
मेरा मन नहीं है। इस छोटे से जीवन की भी एक कथा नहीं; कथाएं 
हैं ओर वे भी छोटी छोटी नहीं, बड़ी बड़ी हैं। इससे मुझे इस 
ससय यही अच्छा लगता है कि मैं औरों की सुनता; स्वयं मौन रहूँ। 
यह भी तो कहो कि तुम भला मेरी भोली आत्म-कथा सुनकर 
करोगे क्‍या ९ 

और फिर यह भी देखो कि अभी समय भी नहीं है। भेरा 
जीवन वेदना और व्यथा का बना है। इस ससय मैं थककर सब 
भूछ गया हैँ | मन सो गया है। ऐसी थकी निद्रा में उसे जगाना 


श्ष्४ 


काच्य 


ठीक नहीं । जब भन जागता रहेगा, उसे स्वृति की वेदना सताती 
रहेगी, तब मेरी कुछ कहानियाँ सुन लेना । मैं तो सदा ही आप 
बीती सुनाया करता हूँ । वहीं तो मेरा जीवन है । 

प्रसाद जी ने मुख्य चार बातें कही हैं । 

१ उनका जीवन बाहरी दृष्टि से रीती गागर है पर सहृदय 
के लिए उसमें रस भरा है। 

२, मेरा जीवन बड़ा सरछ और भोला है.। मैंने भूलें की हैं; 
दूसरों से ठगाया हूँ; पर कभी किसी को ठया नहीं है। 

३. सैंने भी जीवन का मधुर स्वप्न देखा है, पर उसका अनुभव 
इतना सुखद, तरल और क्षणिक था कि उससे मुझे तृप्ति न हो 
सकी | और उसके बीत जाने पर उसकी स्मृति के सहारे जी 
रहा हूँ। 

४. मैं तो सदा ही अपनी व्यथा की कथा लिखा करता हूँ। 
ज्यथा ही तो मेरा जीवन है। इस समय भौन होकर थकान 
'मिटा रहा हूँ । 

इसके साथ ही कवि प्रसाद ने अपने रहस्यवाद, वेद्नावांद, 
इतिहासवाद आदि की कुल्ली बता दी है । कवि संसार भर में 
एक हृदय देखता है, और उसे जो इस एकत्व के अनुभव से सुख 
मिलता है, जब वही व्यवहार में नहीं मिलता तब उसे एक वेदना 
होती है। यही रहस्य भावना और वेदना का मर्स है। इसी 
अकार जब वह किसी काल या व्यक्ति का इतिहास लिखता है तो 


र्४५ 


असाद भौर उनका साहित्य 


वह उसका हृदय अंकित करता है । आगे बढ़ कर यदि इस कविता 
के मसेरपर्शी शब्दों पर मनन किया जाय तो गुनगुनाना, व्यंग्य- 
मलिन उपहास, रांती गागर, उज्ज्वल गाथा, स्वप्न जाग गया, 
छाया, मधुमाया, स्म॒ति, बड़ी कथाएँ, भोली मौन आदि शब्दों में 
भावों, सम्बन्धों और विचारों का सागर भरा हुआ है, एक एक में 
निराली कहानी छिपी है। प्रसाद की व्यज्ञना प्रधान शैली की 
जअद्भुत क्षमता है। जो जितना चाहे ग्रहण करे । 
प्रसाद के पूर्ण विदर्धता का परिचय इस एक उदाहरण से 
मिल जाता है। लहर की रचनाएँ सभी इसी युग की हैं। 
छेचल वहाँ भुरावा देकर, 
मेरे नाविक ! धीरे धीरे । 
जिस निर्जन में सागर लह्टरी | 
अम्बर के कानों में गहरी-- 
निएछल प्रेम-कथा कद्दती हो, 
तज कोलछाहरू की अवनी रे 
जहाँ साँक्षःती जीवन छाथा, 
ढीले अपनी कोमल काया; 
नोछ नयन से छुछूकाती दो, 
ताराभों की पाँति घनी रे । 
जिस गस्भीर मधुर छाया में- 
विद्वव चित्र पट चल माया में-- 


श्ष्टध 


काब्य 


विभुता विभु सी पढ़े दिखाई, 
दुःख-सुख वाली सत्य बनी रे 
श्रम-विश्राम क्षितिज बेला से- 
जहाँ सुजन करते मेरा से- 
अमर जागरण उपा नयन से- 
बिखराती हो ज्योति घनीरे। 
उपनिषद्‌ के ऋषियों और सभी काछों और देशों के सिद्धान्तों 
ने 'यह-यहाँ” और वह-बहाँ में भेद किया है, एक प्रद्यक्ष अनु- 
भूति है, इन्द्रिय गोचर ज्ञान है; बुद्धि का प्रकाश है; दूसरा 
अपरोक्ष अनुभूति है, इन्द्रियातीत प्रातिम ज्ञान है, हृदय का 
अन्धकार है। यहाँ? की बुद्धि से संसार का व्यवहार चलता है, 
संसारी सुख-ठुःख मिलता है और वहाँ के हार्दिक अनुभव से 
संसार के भीतर का रहस्य माछूम होता है, साधारण सुख-दुःख 
से ऊँचा एक विचित्र आनन्द मिलता है। उस आनन्द को चख 
लेने पर मनुष्य सदा उसी के लिये छालायित रहता है। जब-जब 
उस परमानन्द की स्पृति जाग पड़ती है, वह उसे पाने का यत्र 
करता है; कभी तो वह उसके वियोग में आँसू बहाता है और 
कभी अपनी श्रद्धा का सहारा पाकर उस आनन्द छोक का स्वप्न 
देखता है, उसका सुनहला चित्र खींचता है। दूसरे प्रकार का 
मानस चित्र इस गीत में है । 
कवि श्रद्धा है। उसे आनंद छोक में फिर पहुँच जाने का 


श्छ७ 


प्रसाद भोर उनका साहित्य 


पूर्ण विश्वास है। वह अपने अतीत रूपी नाविक से कहता है-- 
'मेरी बुद्धि' यहाँ से जाना नहीं चाहती। तू मुझे भुलावा 
देकर वहाँ छे चछ। वहीं-उसी हृदय छोक में जहाँ बिलकुल 
निजन है, कोई भी नहीं है, प्रथिवी का कोलाहल वहां नहीं है; 
वहां तो एक हृदय की बात गूंजती रहती है और केवछ एक श्रोता 
रहता है। जो सहदय प्रेमी वहां पहुँच जाता है, वह अंबर के 
समान एक निरछल प्रेम कथा सुनता है और वह भी किससे ९ 
किसी सानस सागर की छहरी से। अर्थात्‌ वह शुद्ध मानस लीला 
है, वहां यहां के छल छिद्र और भेद भाव नहीं हैं। 

उसछोक का कहां तक वर्णन करें, वहां जीवन को छाया सांझ 
के समान अपनी कोमल काया ढील देती है और उषा अपनी 
आँख से घनी ज्योति बिखराती है । अथौत्‌ वहीं संयोग का 
उन्मुक्त सुख मिलता है और वहां उषा की सज्जन शक्ति भी देख 
पड़ती है । 

उस छोक की ही मधुर छाया में यह स्पष्ट दिखाई पड़ता है. 
कि दुःख-सुख दोनों सत्य हैं और विश्ु ( व्यापक ) है। दोनों साथ 
ही उस मानस छोक में रहते हैं। जो दोनों में पुछकित होकर स्वाद 
लेना जानता है, उसे वहां पूरा आनन्द मिलता है | 

यदि कविता की पंक्ति-पंक्ति और शब्द शब्द पर रुके और 
देखे तो न जाने कितनी बातें मिलेंगी। व्यज्लना और ध्वनि की 
यहां अपूर्वे छठा है । 

रछ्८ 


५ काव्य 


उस दिन जब जीवन के पथ में , 
छिन्न पात्र ले कम्पित कर में , 
मधु-भिक्षा को रठन अधर से . 
इस अनजाने निकट नगर में , 
भा पहुँचा था एक शअकिश्वन। 


उस दिन जब जीवन के पथ में , 
लोगों की जांखें छलचाई' , 
स्वयं / माँगने को कुछ जाईं। 
मधु सरिता उफनी अकुलाई , 
देने को क्षपना संचित धन। 


उस दिन जब जीवन के पथ में , 
फूर्लों ने पखुरियाँ खोलोीं , 
आँखे करने छगीं ठिठोली , 
हृदयों ने न सम्हाली भोछी:; 
छटठने छगे विककछ पागछ सन। 
उस दिन जब जीवन के पथ में , 
छिन्न पात्र में था भर आता- 
वह रस बरबस था नसमाता , 
स्वयं चकित-सा समर न पाता 
कहाँ छिपा था; ऐसा मधुत्रन ! है 


.... २४९ 


प्रसाद भौर उनका साद्दित्य 


उस दिन जब जीवन के पथ में , 
मधु-मज्बल की वर्षा होती, 
कारों ने भी पहना भोती, 
जिसे बढोर रही थी रोती-- 
आशा, समझ मिछा अपना धन । 
इस गीत में भी उस सुनहले अतीत की झाँकी है, जिसके 
स्मरण मात्र से मनुष्य छक जाता है। यहाँ सी उसी आनंद नगर 
का चित्र है जिसका वर्णन पिछडी कविता में दूसरे ढंग से हो 
चुका है। वह नगर निकट ही हे, क्योंकि मानस छोक पास ही तो 
है, पर वह अनजाना है क्योंकि वह व्यवहार की बुद्धि से तो 
जाना नहीं जा सकता, केवल अनुभव से ज्ञात होता है। इसी से 
उस दिन जब जीवन के पथ में मेरा अकिश्वन चैतन्य हूटा फूटा 
पात्र लेकर उस आनन्द नगर में पहुँच गया तो अद्भुत बातें हुई' । 
उस दिन हमें अनुभव हुआ कि संपूर्ण संसार मधुमय है, मधु की 
वर्षा हो रही है, हमारा पात्र ही छोटा और हूटा फूटा है। उसमें 
रस समाता ही नहीं है। जो मलुष्य मानस छोक की मघुमती 
भूमिका में पहुँच जाता है; उसे यह विचित्र अजुभव होता है. कि 
रस तो चारों ओर भरा है, रस लेने की शक्ति चाहिए। वहाँ 
ऐसा चकित और विस्मित होता है. कि कह उठता है 'अरे, यह 
मधुवन कहाँ छिपा था ९? 
ये कुछ दिन कितने सुन्दर थे ? 


२०० 


काब्य 


सब सावन-घन सघन बरसते- 

इन आँखों की छाया भर थे ! 
सुरधनु-रंजित नव-जरूघर से- 
भरे, क्षितिज व्यापी अम्बर से, 
मिले चूमते जब सरिता के, 
हरित कूछ युग मधुर अधर थे । 

प्राण पपीहा के रुवर वाली- 

बरस रही थी जब हरियाली- 

रस जलकन मालती-मुकुल से- 

जो मद्माते गन्ध विधुर थे। 
चित्र खींचती थी जब चपला, 
नीछ भेघ-पट पर चद विरला, 
मेरी जीवन-स्मथृति के जिसमें- 
खिल उठते वे रूप मधुर थे। 
इस कविता सें उन दिनों का चित्रण है; जब मुझे उस महा- 
मिलन का आनन्द मिला था। उन दिनों की मिठास का क्‍या 
कहें ? जब सघन बरसते सावन घन इन आंखों की छाया भरथे। 
बह सावन की कादंबिनी भी हमारी आंखों की छायामात्र थीं। 
उसकी शोभा भी इन ग्रफुछ आंखों के सामने फीकी थी। इसी 
प्रकार हमारे मधुर अधर इतने रस भरे थे कि उनके सामने बर्षा 
की अद्भुत छठा वाले नदी के कूछ भी कुछ नहीं थे। और जब 


२०१ 


प्रधाद कौर उसका साहित्य 


हमारे यौवन की हरियाढी मदमाते और गन्ध विधुर रस कणों की 
चर्षा कर रही थी । 
मेरी आँखों की पुतली में 
तू बच कर प्रान समा बारे ! 
जिससे कन कन में स्पनदन हो, 
मन में सलयानिक्त चन्दन हो, 
करुणा का नव अभिनन्‍द॒न हो- 
वह जीवन गीत सुना जारे ! 
खिंच जाय अधर पर वह रेखा- 
जिसमें अंकित हो मध्ठ लेखा, 
जिसको यह विश्व करे देखा, 
चह स्मित का चित्र बना जारे ! 
जब मनुष्य मिलन के आनंद में विभोर रहता है; उस समय 
चह और अधिक उसी आनंद में दूबना चाहता है। उसी अद्ुभव 
का यह चित्र है। है प्रियतम, तू मेरी आंखों की पुतछी में आण 
चन कर समा जा | तेरे आने से मेरा हृदय संगीत मय हो जा- 
चेगा और मेरे अधर पर वह मुसकाम खिलेगी जिसे यह विश्व 
देखता ही रह जावेगा । अथीत्‌ मुझे अद्भुत आनंद मिलेया और 
दर्शकों को विस्मय | 
लहर की इन चुनी हुईं कविताओं से एक वात स्पष्ट हो जावी 
है कि जब उनकी आंसू वाली व्यथा मौन सो रही है, इस समय 


रण 


0 


काव्य 


संयोग की स्वृति भी आशा और वासना वनकर सान्‍्त्वना दे रही 
है। जीवन में ऋंगार के दो पक्ष होते हैं (संयोग! और “वियोग! । 
योग” की अनुभूति तो दोनों में ही होती है; पर प्रेम योगी का 
जीवन स्थिर और शान्त तभी होता है, जब बह दोनों का अनुभद 
करके विदग्ध हो जाता है, दोनों का समत्व और सामझस्य सम- 
झकर इसी मानव जीवन भें मानस छोक का परमानन्द पा जाता 
है। सच्चा मानव जीवन ही उसका योग जीवन हो जाता है | 
कबि ने भी अपने काव्य जीवन में इसी ढंग से कार्य किया है । 
आंसू में वियोग का हाहाकार है; लहर में मुख्यतः संयोग की 
मिठास है; अन्त में कामायनी जीवन की समरसता-मानद 
जीवन की पूणता प्रत्यक्ष करके दिखाती है। 

कासायनी की पूरी कहानी ही एक कविता है। उसमें एक 
हृदय रस है, सानव जीवन का एक अखण्ड सधुर रस--चाहे 
उसे #ंगार कहा जाय अथवा शान्त | इसीलिए यह ऐतिहासिक 
कहानी--सख्यात वृत्तवाली पुरानी रूपक सी बन गई है। उससें 
कवि की बुद्धि और कछा ने ऐसा रंग भरा है कि वह किसी भी 
सानव जीवन का इतिहास बन सकती है। 

इसमें दिए हुए पूरे इतिहास को पढ़ चुकने पर. एक वात निग्चित 
हो जाती है कि बुद्धि और तक से सब कुछ मिल सकता है; पर सच्चा 
आनन्द नहीं मिछठसकता। सच्चा आनन्द सानस होता है और बह 
श्रद्धा से मिलता है; इसी से श्रद्धासय पुरुष ही पुरुष कहलाता है 


र५३ 


असाद और उनका साहित्य 


क्योंकि उसे ही पुरुष का सचा सुख मिलता है। कवि ने महा- 
काव्य के अन्त में यही एक दृश्य तो दिखाया है कि सारस्वत 
प्रदेश की रानी बाहक सानव को छेकर तीथयात्रा करते हुए 
भानस सरोवर के पास जा निकलती हे और वहां आनन्द विभोर 
हो उठती है । केवछ वही नहीं; सभी वहां आनंदी हैं, वह तो 
आनन्द का ही लोक है । 
इस प्रकार इस अन्तिम दृश्य से हमें यह विश्वास हो जाता 
है कि इस उलझी हुई नर गाथा में श्रद्धा रूपी नारी की बातें ही 
सिद्धान्त की बातें हैं, वे ही मानस छोक में पहुँचने की सीढ़ी हैं । 
अतः कामायनी का जीवन सिद्धान्त समझने के लिए श्रद्धा का 
व्यवहार और विचार देखना चाहिए। 
श्रद्धा अपने पुत्र मानव को उपदेश देती है-- 
“हे सोम्य ! इड़ा का शुचि हुलार, 
हर लेगा तेरा ब्यथा मार; 
यह तकंमयी तू अ्रद्धासय, 
तू सननश्ील कर कम्ते अभय; 
इसका तू सब संताप निचय, 
हर छे, हो सानव भाग्य उदय, 
सब की समरसता कर प्रचार । 
मेरे सुत ! सुन सा की पुकार ।” 
सैं तेरी मां हूँ ! तू मेरी आत्मा हे। स्वभाव, संस्कार, रीति- 


र५४ 


फकाग्य 


नीति आदि सभी तेरी मेरी ही हूं । अब बेटा, तुझे संसार में 
बढ़ना है, कुछ करना है। यहां बुद्धि के सहारे चलना दोगा। 
इसी से अब तुझे इड़ा को सॉप रही हँ। इसे ही तू माँ समझ । 
इसका पवित्र दुलार तेरा दुःख दव दूर करेगा। संसार में बुद्धि 
के मेल से सफछता मिलती है। वह मेल यहां जुट गया है | तेरी 
माँ तर्क सयी है और तू श्रद्धामय हे। तू अपने पिता मनु के 
समान सननशील सी है; अभय होकर कर्म कर, अवश्य विजय 
होगी। तू अपने अच्छे कर्म से अपनी माँ का सब संताप मिटाने 
की कोशिश कर। बस, मानव भाग्य का उदय अवश्य होगा। 
अन्त में एक बात और कहती हूं कि मेरे छाछ, सब की समरसता 
का प्रचार करना, सुख, दुःख, जड़; चेतन सभी में वह' आनंद 
रस है, इसका पूरा प्रचार करना यही माँ की हार्दिक पुकार 
है। मुझे पूरा विश्वास है कि तू इस पुकार को अवश्य सुनेगा। 
ज्ञान दूर कुछ, क्रिया भिन्न हे हुं 
इच्छा क्यों पूरी हो मन की; 
एक दूसरे से न मिर सके 
यह विडस्थना है जीवन की। 

समरसता और योग के अभाष में जीवन विडम्बना हो जाता 
है। नारी अपने नर देव से कहती है कि जब ज्ञान और कर्म दूर 
रहते हैँ, उनमें उचित योग नही होता, तब मन की इच्छा कैसे 
पूरी हो सकती है। सच्चे जीवन में ज्ञान, कर्म और इच्छा तीनों 


रण 


प्रसाद और उनका साहित्य 


का अपता-अपना स्थान है; उसे न भूलना चाहिए। नहीं दो 
जीवन असफल खिलवाड़ हो जाता है । 

जो ज्ञान और कर्म के योग को अपना कर निर्भय जीवन 
यात्रा करता है, उसे उस आनंद छोक की छाया तो सदा ही मिला 
करती है, पर यदि उसका उसे पूरा दशन और अनुभव करना हो 
तो बुद्धि रानी के सारस्वत प्रदेश को छोड़कर हृदय के मानसरो- 
बर की यात्रा करनी होगी । 


है वहाँ महा-हद निर्मल 

जो भन की प्यास बुझाता ; 
सानल उसको कहते हैं 

सुख पाता जो हैं जाता। 


माँ इडा बालक सानव को सामने का दृश्य दिखाकर कहती 
है कि वहाँ एक बड़ी भील है, वह निर्मछ है, उसका जल तन की ही 
नहीं, मन की प्यास भी बुझाता है। उसको “मानस” कहते हैं । 
जो वहां जाता है, सुखी होता है । कवि ने बड़े स्पष्ट शब्दों में कह 
दिया है कि सुख मानस चस्तु है। 
यात्री दल ने रुक देखा 
सानस का इश्य निराला; 
खग भ्रग को अति सुखदायक 
छोदा सा जगत उजाला । 


२५६ 


कान्य 


हम एक कछुदुस्प बया कर 

यात्रा. करने है जाये; 
सुन कर यह दिव्य तपोचन 

जिसमें सब जध छुट जाये। 


मनु ने कुछ कुछ सुसकक्‍्या कर 
कैलाल ओर. दिखाया 
बोले देखो कि यहाँ. पर 


कोई भी नहीं पराया। 


हम अन्य न और कछुटुम्बी 


हम केवछ एक दीं हैं, 
तुम सब मेरे जवयव ह्दो 
जिसमें कुछ नहीं कमी है। 


शापित न यहाँ है कोई 

तापित पापी न यहाँ है; 
जीवन वसुधा समतक है 

समरस है जो कि जहाँ है। 


अपने दुख-सुख से पुलुकित 
यह मूत्ते विश्व सचराचर; 


१७ २५७ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


चिति का विराट वपु संगरू 
यह सत्य सतत चिर सुन्दर । 


कचि आगे उसी मानस झील का निराछा दृश्य दिखछाता है। 
बह केवल मनुष्य को द्वी नहीं, पशु पक्षी आदि सभी को सुख- 
दायक है। 

वहाँ की भूमि ऐसी द्व्य और मनोहर है कि वहों जाने पर 
मनुष्य अपने पराये के भेद भाव को भूछ जावा है और पूरी 


वसुधा को ही अपना झट्ुंब समझने छगता है। और चारों ओर 
पूर्णता का अनुभव करता है। यहाँ न कोई शापित है और न कोई 
यहां तापित पापी है। जीवन में सभी कुछ समतल पर है। जो 
जहाँ है' वह वहीं पूर्ण और प्रसन्न है। उपनिषदों की भाषा में 
कहें तो-- 


पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णांत्‌ पूर्णमुदच्यते । 
पृर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णसेचावशिष्यते ॥ 


वह पूर्ण है, यह पूर्ण ( भरा हुआ ) है, पूर्ण से पूर्ण की सृष्टि 
होती है, पूर्ण में से पूर्ण निकलने पर भी पूर्ण ही शेष बचता है। 
इस परिपूर्णता का अर्थ है--हृदय और मन की परिपूर्णता | 
व्यवहार में कोई अम न होना चाहिए। हां) इतना परिवर्तन 
अवश्य होता है कि ऐसे परिपूर्ण हृदय वाढा महुष्य सचराचर 
विश्व को अपने सुख-दुःख से पुलकित देखता हे । वह इसे चित्‌ 


शर्५८ 


काध्य 


का विराद शरीर समझता है, जिसमें सभी भले छगते हैं, सभी- 
मंगलसय हैं । 

इस आनन्द छोक को कौन नहीं पाना चाहता। सभी तो सुख 
की खोज में मरा करते हे । 


अब मैं रह सकती नहीं मौन, 

अपराधी किन्तु यहां न कौन ? 
सुख हुख जीवन में सब सहते, 

पर केवल सुख अपना कहते ; 


भ्रधिकार म॒ सीमा में रहते, 

पावस निर्भर से वे बहते; 
रोके फिर उनको सका कौन ? 

सब को वे कहते-ा्ु हो न !? 


अद्धा इसका कारण बताती है कि जीवन में सभी दुःख 
सहते हैं, पर वे केवछ सुख को अपना कहते हैं। यह अपना 
पराये का भेद सब खेल बिगाड़ता है। इस जीवन को नियति का 
खेल समझ कर अपनी सीमा सें जितना खेल सके खेलना 
चाहिए। खुख मिले उसका रस लेना चाहिए, दुःख मिले दुःख 
का रस छेना चाहिए। रसिक बनकर सभी में रस लेना 
२०५९ 


जअलाद भऔौर उनका साहित्य 


चाहिए और रसिक खेलाड़ी के समान किसी को अपना 
जतु न कहना चाहिए। पर जो रसहीन हैं, खेल का मना 
लेना नहीं जानते; वे सभी को शत्रु कहते हैं। और दुःख से . 
दूर रहकर सुख भोगना चाहते हैं, यही उनका अपराध है। , 
यही उनकी भूल है । 

यह भूल भी दूर होती है जब मनुष्य के हृदय में 
रहने वाली श्रद्धा उस पर कृपा करती हे और अपना मधुर 
गीत सुनाती है। 


तुपुक फोलाहल करूह में 
में हृदय की यात रे मन ! 


बिक होकर नित्य चंचल , 
खोजती जब नींद के पल; 
चेतना थक सी रही तब, 
में मछयथ की वात रे मन! 


चिर विपाद विकीन मन की, 
इस व्यथा के तिमिर वन की ; 
मैं उपा सी ज्योति रेखा, 
कुसुम विकसित प्रात रे मन ! 


२६० 


जहाँ सर ज्वाला धघकती , 
चातकी कन को तरसती ; 
उन्हीं जीवन घारियों की, 
में' सरस वरसात रे सन! 


पवन की प्राचीर सें रुक, 
जछा जीवन जी रहा झुक ; 
इस झलसते विश्व दिन की, 
सैं कुसुम ऋतु रात रे मन! 


घिरः निराशा नीरधर से, 
प्रतिच्छायित अश्रु सर में; 
मधुप सुखर मरंद सुकुछित न 
मैं सजल जलजात रे मन! 


२६१ 


रे मन, इस कोछाहछ और कलरूह के जीवन में में हृदय को 
बात के समान हूँ। ( जिस प्रकार अपने हृदय की बात सुनने में. 
सजुष्य निसतब्ध हो जाता है, उसी प्रकार श्रद्धालु मनुष्य शांत और 
स्थिर हो जाता है। विज्ञान क्या है? तुमुल कोलाहल कलह है और 


श्रद्धा क्या है ? शान्त हृदय के भीतर छिपी हुई निजी बात। 
कितना बढ़ा/अन्तर है। ), .. 


प्रसाद और उनका साहित्य 


जब नित्य चंचल रहने चाढी चेतना (जीवन के कार्य 
व्यापार से ) विकल होकर नींद के पल खोजती है और थक कर 
अचेतन सी होने छगती है, उस समय मैं उसके लिए मय की 
बात बन जाती हूँ। ( नींद के लिए बिक और थके शरीर को 
जितना मादक और स्पर्शी सुख मल्यानिक के मंद मोके से 
मिलता है; उत्तना ही सुख चेतना को श्रद्धा की थपकी से 
मिलता | चैतन्य ही तो जड़ जगत के सुख-दुःख का अनुभव 
करता है। यदि उसे श्रद्धा का सहारा मिल जाता है. तो उसकी 
विकलता दूर हो जाती है, उसे आनन्द का रस मिलता है | ) 

जो मन चिरविषाद में बिलीन है; व्यथा का अन्धकार बन 
बना हुआ है, मैं उसके किए उषा सी ज्योति रेखा हैं, कुसुम के 
समान खिला हुआ ग्रात हूँ । 

( विषाद और व्यथा को दूर करने के लिए एक ही उपाय है-- 
श्रद्धा । श्रद्धा में वह टटकापन है; वह ताजगी है, वह अरुण आभा 
है; जो उषा और प्रभात में ही मिलती है। इस जीवन भें जब 
भवुष्य विपाद और व्यथा ही चारो ओर देखता है, उस समय 
श्रद्धा ही उस अंधेरी रात को दूर करने का उपाय बताती है। यह 
सोलहो आने सत्य है कि श्रद्धा में, दृह मनुष्य कभी संसार को 
डुःखमय नहीं समझता । उसे दुःख में भी सुख की अरुण किरणें 
फूटती देख पढ़ती हैं ) ह 

जहां सरुभूमि की ज्वाछा धधकती है और चातकी जछ के 


२६२ 


काब्प 


कण को तससती है; उन्हीं जीवन घाटियों में में सरस वस्सात 
वन जाती हैं। ( जिन छोगों का जीवन मरुस्थल की सूखी घाटी 
के समान दुर्गम, विपम और ज्वालामय हो गया है, जहाँ चित्त 
चातकी को एक कण भी सुख जल का नहीं मिलता, उन लोगो 
को यदि कही श्रद्धा मिल गई तो जीवन में रस की वर्षा होने लगती 
है। अथीत्‌ मरुस्थल की वो में जो परम सुख का स्वाद दै, वही 
श्रद्धामय जीवन सें हैं । ) ह 

जला जीवन ( अभागा मानव जीवन ) पवन की परिधि में 
रुका हुआ है, किसी प्रकार सिर झुकाए जी रहा है, इस प्रकार 
जिनका विश्व झुलस रहा है, उनके बुरे दिन के लिए मैं वसंत की 
रात (के समान) हूँ। (जिन्हें इस जीवन ने झुलसा डाला है और 
जिन्हें संसार की अग्नि से भागने का भी कोई उपाय नहीं हे, ऐसे 
दुःखदग्ध छोगों को श्रद्धा चसन्‍्त की रात के समान सुख देती है । 
उनके झुलसे मन को हरा वना कर फूल सा खिला देती है । ) 

ओंसुओं का सरोवर है, उसमें चिरनिराशा रूपी बादलों की 
छाया पड़ रही है, ( वो नहीं हो रही है ) उस ( हाह्माकार के ) 
सरोवर में मैं ऐसा सजल कमल हूँ जिस पर भौरे मढ़राते हों 
और जो मकरन्द से परिपूर्ण हों। ( निराशा और आऑसुओं के 
बीच में भी हृदयकछी को खिलाने वाली शक्ति का नाम है श्रद्धा । 


वह असंभव को भी संभव कर देती है, चमत्कृत कर देती है। 
चकित करने वाला स्वप्न सद्य बना देती है । ) 


२६३ 


प्रसाद और उनका साहित्य 


श्रद्धा के इस गीत की व्याख्या की जाय तो कामायनी की 
पूरी व्याख्या हो सकती है। रबयं कवि ने इस गीत के बारे 
में कहा है-- 
उस रबर लहरी के अक्षर सब 
संजीवन रस बने घुले | 
इस गीत में गीतिकाव्य के--लिरिक कहे जाने वाले काव्य 
प्रकार के सभी गुण हैं, हृदय की अनुभूति, संगीत मधुरिमा, कछा 
की विदग्धता इत्यादि । 
थोड़े में अभी तक जो कुछ हमने देखा है; वह है कामायनी 
का आध्यात्मिक और दाशनिक दृष्टिकोण--इसे ही कहते हैं कवि 
की बुद्धि और जीवन दर्शन की निपुणता। इसके बिना किसी 
भी कृति का सच्चा मूल्य ही नहीं मालूम दोता। पर इससे भी 
अधिक महत्व है, उस अध्ययन का जो कामायनी की सीधी 
सादी कहानी पढ़ता है ओर उसकी अखण्ड रस धारा में स्नान 
करता है। कासायनी की कहानी इतनी सजीव और सानवता- 
मय है कि उसे रूपक अथवा एछीगरी नहीं कह सकते | 
रूपक उसी कहानी को कह सकते हैं, जिसमें आदि से अन्त 
तक उन प्रतीकों का निवीाह हुआ हो और स्वाभाविक इति- 
हास अथवा कह्दानी का रस न मिले । पर कामायनी की कहानी 
में तो कहानी का रस है, कोरे रूपक की ऋत्रिमता नहीं है। 
कवि की बुद्धि और कहानी की अ्रवन्धता का मर्मे समझ लेने 


२६४ 


फाच्य 


पर एक पक्ष और शेप रह जाता है वह ऐँ--काव्यकछा 
देखना | यही विचार सब से अधिक महत्व का है; क्योंकि कला से 
ही रसिक को रस मिलता है और कछा की अलोचना से ही 
कवि के कौशल का पता चलता हे | किसी भी कृति का अध्ययन 
अधूरा माना जाता है, जब तक उसकी निणेयात्मक आलोचना 
न हो जाय। इस संबंध सें हम स्थान और समय के अभाव 
से अधिक न लिख सकेंगे और इतना ही कहेंगे कि इसमें महा- 
काव्य के मुख्य सभी लक्षण घटते हैं. और रामचरित मानस के 
बाद यही एक ऐसा महाकाव्य है जो हिन्दी को विश्व-साहिद् में 
स्थान दिला सकता है । होमर, मिल्टन, वाल्मीकि और कालिदास 
से तुलना करके भी इसका गुण दोष देखा जाय--इतनी योग्यता 
इस कलाक्ृति में हैं। भाषा और भाव दोनो का ऐसा योग 
हुआ है कि कोई भी सहृदय इसे प्रसाद की पूर्ण ऋृति मान छेगा । 


२६५ 


कामायनी का कथानक 





फामायनी पन्‍्द्रह सर्गों का भहाकाव्य है। प्रत्येक सर्ग का 
शीषक देकर कथा को विभाजित किया गया है--१-चिन्ता 
३-आशा ३-श्रद्धा ७-काम ५-बासना ६-छज्जा ७-कर्म ८-ईषो 
९-इड़ा १०-स्वप्त १९-संघ्ष १२-तनिर्वेद १३-दशेन १४-रहसस 
१५-आनन्द | 

प्रकय के बाद नवनिर्माण कर्तों मनु को भारस्भ से लेकर 
अन्त तक जिन भावनाओं के कारण जीवन संघर्षों में कठिनाइयों 
और अन्त में आनन्द छोक सें अनन्त शान्ति की श्राप्ति होती है, 
वही सब कामायनी महाकाव्य की आत्मा है। मनुष्य के मानसिक 
इन्द्र, अतृप्ति और मिन्न-मिन्न भावनाओं का मार्सिक चित्रण 
इस महाकाव्य में सहाकषि ने किया है। सानव समाज की 
उत्पत्ति से छेकर आज तक सलुष्य की मानसिक सनोवृत्तियों एक 
सी ही रही हैं। कामायनी मनुष्य जीवन का सम्पूर्ण इतिहास है। 
मलुष्य जितनी भावनाओं से पूर्ण होता है, कामायनी में उतने ही 
सर्ग हैं। 


२६६ 


कामायनी का कधानक 


प्रढ्य का भीषण दृश्य है। मनु हिमालय के एक ऊँचे शिखर 
पर भीगीं आँखों से जरू-प्लावन देख रहे हैं। धीरे-धीरे पानी 
* घट रहा है। प्रथ्वी निकल रही है। पहली वार मनु को चिन्ता 
अपने आवरण में ढँकती है। वह सोचने लगते हैँ कि देव पुरुषों 
को तो कभी इसका सामना करना नहीं पड़ा था। यह क्‍या है 
वह मनु की पहली अनुभूति थी । 

सम्पूर्ण ऐश्वय और विभूतियों के नष्ट हो जाने पर, मनु पूर्व 
स्वरति के कारण चिन्ता से व्यम्न होते हैँ। चिन्ता के कारण ही 
मनु के मन में अभाव और दुख की रेखाएँ अंकित हुई । 

प्रठय का दृश्य समाप्त हो जाने पर मनु का मन सजग होता 
है। नवीन आशा का संचार होता है। मनु एक गुहा खोज छेते 
हैं और वहीं अग्रिहोत्र और तप में. संलम्न होते हैं। देव यज्ञ का 
प्राचीन रूप फिर से उपस्थित द्ोता है | दिन बीतने गे और एक 
दिन श्रद्धा से मन्ठु का सामना होता है। मनु कहते हैं--पथ भ्रष्ट 
उल्का के समान मैं असहाय घूम रहा हूँ और तुम कौन हो ? श्रद्धा 
उत्तर देती है--बलि का अन्न और मनुष्य देख कर मैं यहाँ रुक 
गई हूँ। 

मंतु और श्रद्धा में काम और वासना के भाव जागृत होते हैं। 

दोनों उस अवाह मे बहने छगते हैं। श्रद्धा का नारी सुुम 
सहचरी छज्जा से परिचय होता हे । कुछ समय बाद मनु फिर 
कर्म की ओर अग्रसर होते हैँ । यज्ञ-यश की पुकार के कारण वह 


२६७ 


असाद और उनका साहित्य 


स्थिर नहीं रह सकते । कानों में काम की कही हुई बातें गूँजा 
करतीं हैं। मन में आशा और अभिलाषाओं का ज्वारसाटा उठा 
करता है। श्रद्धा के उत्साह पूण वचन और काम की प्रेरणा से 
चह कुछ का कुछ अर्थ करने छगते हैं। 
जल-्लावन से दो असुर पुरोहित किछात और जआकुली बचे 
हुए थे। मनु के आश्रम में बँघे हुए पशुओं को देख, दोनों की 
रसनो चंचछ हो उठती है। वह आपस में मन्त्रणा करके मल के 
आश्रम के द्रवाजे पर आते हैं। मनु क्म-यज्ञ के लिये पुरोहित 
न मिलने से चिन्तित रहते हैं । इतने में दोनों असुर पुरोहित 
आकर कहते हैं--जिनके लिये यज्ञ होगा हम उनके भेजे हुए आये 
है। कया तुम यज्ञ करोगे ९ 
यज्ञ में पञ्ु बलि के घृणित दृश्य को देख कर श्रद्धा उठ कर 
अपनी शुद्दा में चली जाती है । सु सोमपान में रत होते हैं । 
सोसपान से उत्पन्न कामना के वशीभूत होकर मनु श्रद्धा की गुहा 
में आते हैं। दोनों में कभी कर्म तत्व पर कुछ बादविवाद होता 
है। श्रद्धा उत्तेजित होती है। पर सु अवसर समझ कर श्रद्धा 
से सोमपान का आग्रह करते हैं। अनुनय विनय से श्रद्धा का 
हृदय उद्देलित होता है। मु श्रद्धा के अधरों से सोम पात्र छगा 
देते हैं। अब मनु को अभ्देव के अतिरिक्त और कोई काम नहीं 
रह जाता। उनके मुँह में खून छगा जाता है। जाग्रत लालसाएं 
केबल श्रद्धा के सर विनोद से नहीं शान्त होतीं। श्रद्धा आखेट 


श६८ 


काम्रायनो का कथानक- 


और हिंसा से घृणा करती है। बह उन पश्ञुओं को मारने के 
बदले पालना चाहती है । इसी वात को लेकर मनु से तक वितरक 
करती है। मनु इससे झुँझला कर श्रद्धा को छोड़कर चले जाते हैं । 

मनु सरस्वतीन्‍्तट के एक उजड़े हुए नगर में आते हैं। वह 
सरस्वती-वट पर बैठ कर सुर-असुरों के विगत कार्यों की प्रशंसा 
करते हैं। उसी समय वहाँ एक सुन्दर चाला आती है। मु कहते 
हैं--अरे, आलोक से भरी चेतना सी यह देमवती छाया कहाँ से 
आई ? वह वोली--मैं इड़ा हूँ । मेरा यह सारस्वत प्रदेश भौतिक 
हलूचल से चंचल हो उठा था। मैं इसमें इसी आशा से पड़ी हूँ 
कि कभी मेरा भी दिन फिरेगा। 

उधर श्रद्धा मु के लौट आने की राह देखती हे। अन्त में 
वह निराश ही होती हे । उसे एक पुत्र भी उत्पन्न हो गया है। 

इड़ा सनु की पथअदशिका बनती है। आश्रम की भूखी जनता 
भी खूब श्रम करती है । सुन्दर नगर वनता है। खेती होती है । 
धातुओं को गा कर नये नये अस्च और आभूषण बनते हैं। 
वसुधा के गर्भ में जो कुछ है, वह मानव प्रयत्न से ऊपर आने 
लगता है। श्रद्धा उस आशख्य भरी दुनियां में मलय बालिका सी 
चलती हुई सिह-द्वार के भीतर पहुँचती है । वह आश्रेय चकित 
होती है । इतने मे कर में चपक लिये मनु सम्मुख दिखिकाई पड़ते 
हैं और इड़ा सामने बैठी आसव ढाछ रही है। सानव के अन्तर 
में जो पशुस्व है चह हुँकार उठता हे। मनु इड़ा पर आसक्त 


२६९ 


प्रसाद और उनका सादित्य 


होते हैं। इससे देवता गण रुष्ट होते हैँ । इतने में श्रद्धा की आँख 
खुल जाती है । 

श्रद्धा का जो स्वप्त था वह सत्य बन गया था। इड़ा में क्षोम 
था और श्रजा संकुचित थी । भौतिक विप्छव से त्रस्त होकर छोग 
आश्रय के लिये आते हैं। किन्तु वहाँ अपमान ही मिलता है। 
अनु इड़ा पर पूर्ण स्वामित्व पाना चाहते हैं। वह मना करती है। 
पर सनु उसे अपनी सुजाओं में कस छेते हैं | प्रजा इससे बिगड़ 
उठती है। फलस्वरूप मनु और प्रजा में युद्ध होता है । इस युद्ध 
में अछुर पुरोहित आकुछी और किछात भी प्रजा को भड़काते हैं। 
भयंकर युद्ध के बाद सनु घायल होकर मूर्छित हो जाते हैं । 

इडा बैठी हुई सोचती है कि उस दिन आया हुआ परदेशी 
कितना दुखी था । उसके चारों और सूनापन छाया हुआ था। 
चही शासन का सूत्रधार और नियसन का आधार बना और 
अपने ही बनाये नवविधान का स्वयं साकार दण्ड रहा है। इतने 
में उसे सुनाई देता है कि कोई किसी को खोज रहा है। इड़ा 
उनके पास पहुँच कर पूछती है--किसे खोजती हो ? जरा देर 
यहाँ विश्राम करो । वह सब प्रकाश के सामने आते हैं । आलोक 
में श्रद्धा देखती है कि सनु घायल होकर पड़े हैं। श्रद्धा मनु को 
सहलाने छगती है। मनु की मूछो हट जाती है। दोनों की चार 
आँखें होती हैं और कुछ ओऑसू की बूदें भूमि को तर कर देती हैं । 

सनु क्षोभ के कारण सूर्योदय के पहले ही कहीं चछ देते हैं। 


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काम्रायनी का कथावक 


इससे सब उद्ठिम्न होते हैं। श्रद्धा अपने लड़के सौम्य और इड़ा को 
एक सूत्र में बांध कर मनु को खोजने निकलती है। सरस्वती-तट 
पर छताबृत गुफा में किसी के सांस छेने की आहट पाकर 
श्रद्धा देखती है तो दो आँखें चमकती हुईं दिखाई देती हैं। वह 
भनु ही थे। 

आगे-आगे श्रद्धा और पीछे-पीछे मनु ऊचे-ऊने पहाड़ों को 
डॉकते हुए और भी ऊचे चढ़े जा रहे हैं। मनु ने पूछा-अद्धा मुझे 
बताओ, यह नये म्रह कौन है मैं किस दुनियाँ में पहुँच गया ? 
श्रद्धा उत्तर देती है--इस त्रिकोणके बीच शक्ति और बिपुर क्षमता 
वाले बिंदुओं में से एक एक को तुम स्थिर होकर देखो। यह 
इच्छा, ज्ञान और क्रिया के बिन्दु हैं। श्रद्धा क्रमशः झान और 
योग की भूमिकाओं से मन्नु का परिचय कराती हुई आगे छे 
जाती है । 

सरिता के रम्य पुलिन में यात्रियों का एक दल धीरे-धीरे 
चल रहा था। युवकों का उल्लास, बाढकों की किकारी और 
स्त्रियों के मंगल गान से दुल मुखरित था । बालक पूछता-मां ! 
हम कहां चल रहे हैं ? माता उत्तर देती है--हम जहां जा रहे हैं, 
वह संसार का पवित्र शीतछ और शान्त तपोवन है । 

सानस-तट पर मनु ध्यान मग्न बेठे हैं । पास ही फूलों की 
अंजछी भरे भ्रद्धा खड़ी है। इड़ा के पीछे मानव भी डग मारता 
चल रहा था। चिरलर्न प्रकृति से पुछकित वह चेतल पुरुष पुरा- 


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प्रसाद और उनका साहित्य 


तन आनन्द के सागर में अपनी शक्ति से तरंगायित था। मान॥ 
उसे देंख कर श्रद्धा की गोद में लिपट गया। इड़ा ने चरणों प॑ 
शीश रख कर कहा--मैं यहाँ आने से धन्य हो गई। हे देवि 
बस तुम्हारी ममता मुझे यहा तक खींच छाई । भगवति | : 
समझ गईं कि मुझे कुछ भी समझ नहीं थी। मैं केवछ सब व 
अम में रख रही थी। हम केवछ एक कुठुम्ब बनाकर इस तप 
बन की यात्रा करने आये हैं । क्योंकि हमने सुना था कि इस 
दिव्य तपोवन मैं सत्र पाप छूट जाता है। मनु ने मुस्कराते हु! 
केलास की तरफ दिखलाकर कहा--देखो यहाँ कोई भी पराय 
नहीं है। सब एक हैं। अपने दुःख-सुख से पुलुकित यह सच 
राचर मूर्त विश्व चिति की विराट पर मंगलकारी शरीर है। य| 
सतत सत्य है, यह चिर सुन्दर है ! 


म्न्च्च्च्य्क्ष्द््क्ता भा 


ली हे मील + नल 2 अमल अप दिक्कत रन 
मुदक--वी० के० शास्त्री; ज्योतिष प्रकाश प्रेस, विश्वेश्वर्गंज, काशी